No- 394. अंत तक तुझे लड़ना होगा!
एक ओजस्वी मंचीय कविता — राकेश मिश्रा की कलम से
जब सच पर पहरे हों, जब झूठ के चेहरे हों, जब प्रश्न उठाने वालों के रास्तों में अँधेरे हों—
तब कलम उठानी होगी, हर परत हटानी होगी। सवाल उठाया है तो, उत्तर तक जाना होगा, सत्य की राह चुनी है तो, अंत तक निभाना होगा!
ताजमहल की सुंदरता पर किसको भला इनकार है? पर उसके इतिहास को जानना क्या कोई अपराध है?
इमारत भी अपनी विरासत, उसका इतिहास भी जानें, पत्थरों की ख़ामोशी में दफ़्न प्रश्न भी पहचानें।
न सुंदरता कम हो सच से, न सच पर पर्दा डाला जाए, जो तथ्य मिले, वह लिखा जाए, जो अज्ञात हो, खोजा जाए।
इतिहास न बिकने वाली वस्तु, न सत्ता का गुणगान बने, इतिहास वही इतिहास रहे, जो प्रमाणों की पहचान बने!
सच को सजाना मत, सच को छिपाना मत, प्रश्नों से डरकर नज़रें चुराना मत!
नालंदा की राख से पूछो, ज्ञान का कितना नुकसान हुआ, जिन कक्षों में विद्या बसती थी, वहाँ कितना अँधियारा हुआ।
कितनी पांडुलिपियाँ खोईं, कितने विचार बिखर गए, मानवता के ज्ञान-सरोवर के कितने उजले तट उजड़ गए।
किसने आग लगाई थी? क्या-क्या नष्ट हुआ था? इतिहास के उन कठिन सवालों का प्रमाण कहाँ उपलब्ध हुआ था?
न अनुमान को प्रमाण कहें, न अफ़वाहों को ज्ञान कहें, जो सच है, उसको सच लिखें, तथ्यों का पूरा मान रखें।
हर तथ्य की जाँच करो, हर दावे का प्रमाण माँग, इतिहास की अदालत में सत्य का सम्मान माँग!
अंग्रेज़ों के शासन ने भारत को घाव अनेक दिए, कितने संघर्षों ने अपने प्राणों के उपहार दिए।
उन अत्याचारों को जानें, उन बलिदानों को पहचानें, पर इतिहास के दूसरे पन्नों को भी निष्पक्ष होकर छानें।
किसने मंदिर तोड़े थे? किसने ज्ञान मिटाया था? किसने अपने शासन में जनता को क्या-क्या सताया था?
हर शासक का लेखा हो, हर घटना का आधार हो, न किसी नाम को छूट मिले, न किसी पर झूठा प्रहार हो।
न सत्ता से इतिहास लिखे, न नफ़रत से कलम चले, प्रमाणों की रोशनी में हर प्रश्न का उत्तर मिले।
न झूठ का जयकार चाहिए, न सच पर कोई वार चाहिए, भारत के इतिहास को सत्य का आधार चाहिए!
राम के आदर्शों को समझो, कृष्ण के संदेश को जानो, अपनी संस्कृति की गहराई विवेक के दीप से पहचानो।
आस्था का सम्मान रहे, प्रमाणों का भी मान रहे, ज्ञान, करुणा, कर्म और धर्म से भारत की पहचान रहे।
सनातन केवल रीति नहीं, जीवन का विस्तार भी है, प्रश्नों से संवाद करना ज्ञान का संस्कार भी है।
अपनी जड़ों पर गर्व करो, अपनी विरासत सँभालो, पर सत्य की खोज में साथी, विवेक का दीप जला लो।
अपनी संस्कृति से प्रेम करो, पर घृणा को स्थान न दो, न्याय की खातिर खड़े रहो, निर्दोष को अपमान न दो।
विरासत पर गर्व करो, पर विवेक को मत खोना, सत्य की खोज में साथी, कभी अधूरा मत होना!
कहते हैं, मौन में अक्सर समझदारी का वास है, लेकिन अन्याय पर चुप रहना कैसा यह विश्वास है?
जब सच को दबाया जाए, जब प्रश्नों को ठुकराया जाए, जब झूठ को सिंहासन देकर सच को दंड सुनाया जाए—
तब आवाज़ उठानी होगी, सोई चेतना जगानी होगी, भय के घने अँधेरों में सत्य की लौ जलानी होगी।
पर याद रहे, ऐ साथी, क्रोध नहीं, विवेक चाहिए, केवल आरोप नहीं, हर आरोप का प्रमाण चाहिए।
लड़ना है तो झूठ से लड़, अन्याय के प्रतिकार के लिए, कलम उठे तो उठे हमेशा जनहित और सत्य के लिए।
कलम बिकेगी नहीं, सच रुकेगा नहीं, प्रश्न उठेंगे तो विवेक झुकेगा नहीं!
राह में काँटे मिलेंगे, अपने भी मुँह मोड़ेंगे, कुछ तेरे शब्दों को तोड़ेंगे, कुछ तेरे हौसले को तोड़ेंगे।
कभी अकेला रह जाएगा, कभी मन भी घबराएगा, पर सत्य का पथ चुनने वाला धैर्य नहीं गँवाएगा।
सवाल उठाकर छोड़ न देना, उत्तर खोजना भी होगा, जो सच कहने का साहस है, तो प्रमाणों पर टिकना होगा।
भीड़ के पीछे मत चलना, अपने विवेक से काम लेना, अपनी भूल दिखे तो साथी, उसे स्वीकार कर बदल लेना।
यही कलम की शक्ति है, यही विचारों की जीत है, सत्य के प्रति ईमानदारी सबसे बड़ी अपनी रीत है।
तू किसी को हराने नहीं, सत्य को जिताने निकल, इतिहास के बंद दरवाज़ों पर ज्ञान के दीप जलाने निकल!
इतिहास केवल अतीत नहीं, भविष्य की बुनियाद है, जिसकी नींव में सत्य नहीं, वह इमारत कमज़ोर है।
जो पीढ़ी प्रश्न उठाती है, वही नई राह बनाती है, जो अपने अतीत को समझे, वही भविष्य सजाती है।
नफ़रत की दीवारें तोड़ो, ज्ञान के नए द्वार खोलो, झूठ के हर अँधेरे में सत्य के दीपक खोलो।
भारत का गौरव बढ़ाना है, भारत का मान बढ़ाना है, केवल जयघोषों से नहीं, अपने कर्मों से दिखाना है।
ऐ नौजवान! तू याद रख, तेरे कंधों पर कल है, तेरी सोच और तेरे कर्मों में भारत का आने वाला पल है।
तू पढ़, समझ, परख और लिख, हर तथ्य को पहचान, अपने देश के इतिहास के प्रति रख निष्पक्ष दृष्टि और सम्मान।
### अंतिम हुंकार
अब बहुत हुआ मौन का दौर, अब सत्य की आवाज़ उठेगी, झूठ की चाहे ऊँची दीवार, प्रश्नों से उसकी परत खुलेगी।
न डर के आगे झुकना है, न क्रोध में बह जाना है, सत्य, विवेक और साहस लेकर भारत का कल बनाना है।
याद रख, ऐ कलम के सिपाही, तेरी कलम की पहचान यही— तू सच के साथ खड़ा रहेगा, चाहे राह आसान नहीं!
तूफ़ान उठें तो उठने दे, आँधी आए तो आने दे, सत्य की राह कठिन सही, अपने कदम बढ़ाने दे।
जब तक झूठ के सामने सच का दीप जलाना होगा, जब तक इतिहास के पन्नों पर निष्पक्ष सत्य लाना होगा—
सवाल उठाया है तो उत्तर तक जाना होगा, सत्य की राह चुनी है तो अंत तक निभाना होगा!
न सत्ता से डरना होगा, न भीड़ से घबराना होगा, तथ्यों की मशाल लेकर हर भ्रम को दूर भगाना होगा।
इतिहास किसी की जागीर नहीं, सत्य किसी का ग़ुलाम नहीं। जो प्रश्नों से डरकर चुप हो जाए, वह जागृत इंसान नहीं!
भारत की अस्मिता का मान रहे, सत्य का ऊँचा स्थान रहे, कलम में साहस, मन में विवेक, और कर्मों में हिंदुस्तान रहे!
अंत तक तुझे लड़ना होगा! सत्य के लिए अडिग रहना होगा! सवाल अगर तूने उठाया है— तो उत्तर तक जाना होगा!
— राकेश मिश्रा की कलम से
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें