No- 367. मृत्यु अंत नहीं, अगले पड़ाव की शुरुआत है
मृत्यु अंत नहीं, अगले पड़ाव की शुरुआत है, यह प्रकृति का सनातन सत्य, ईश्वर की सौगात है। जो जन्मा है, वह एक दिन अवश्य विदा होगा, अपने कर्मों का लेखा लेकर आगे बढ़ा होगा। यह शरीर तो पंचतत्त्व का एक सुंदर आवरण है, आत्मा अनंत, अजर-अमर, परमात्मा का ही कण है। वस्त्र बदलने जैसा केवल तन का परिवर्तन होता है, जीवन का दीपक बुझता नहीं, बस नया सवेरा होता है। कल जो अपना था, आज स्मृति बनकर मुस्काता है, हर बिछड़ना हमें जीवन का अर्थ समझाता है। रोना स्वाभाविक है, आँसू भी श्रद्धा बन जाते हैं, पर अति शोक के अंधियारे में सत्य कहीं खो जाते हैं। जो चला गया, वह समाप्त नहीं, बस आँखों से ओझल हुआ है। समय के इस विराट प्रवाह में, वह अगले सफ़र पर निकला है। जीवन एक अवसर है—प्रेम का, सेवा का, त्याग का, हर पल सद्कर्म करने का, मानवता के अनुराग का। धन, वैभव, पद और प्रतिष्ठा यहीं धरे रह जाते हैं, साथ हमारे केवल अच्छे कर्म ही आगे जाते हैं। इसलिए ऐसा जीवन जियो कि मृत्यु भी मुस्काए, तुम्हारे सत्कर्मों की सुगंध युगों-युगों तक फैल जाए। जब अंतिम क्षण का दीप जले, भय मन में न आने पाए, विश्वास रहे—यह अंत नही...