संदेश

No- 397 तेरे दर से रूठकर जाऊँ कहाँ... राकेश मिश्रा की कलम से

(मुखड़ा) तुझसे रूठूँ, तो जाऊँ कहाँ, तेरे सिवा है मेरा कहाँ? आँखों में दरिया, लब पे दुआ, तू ही बता, अब कहूँ क्या? तूने ही रुलाया, तू ही मना ले, टूटे हुए दिल को फिर से उठा ले। तेरे ही दर पे बिखरा पड़ा हूँ, चाहे सज़ा दे, चाहे लगा ले॥ (अंतरा – 1) जिनको मेरी दुआओं ने माँगा, क्यों उनको ही वक्त ने छीना? जिनके लिए खुद को भुलाया, क्यों उनसे ही दर्द है पाया? क्या मेरी चाहत में खता थी? क्या मेरी किस्मत ही सज़ा थी? तू सामने होकर भी चुप क्यों, क्या मेरी आवाज़ अनसुनी थी? (मुखड़ा) तुझसे रूठूँ, तो जाऊँ कहाँ, तेरे सिवा है मेरा कहाँ? आँखों में दरिया, लब पे दुआ, तू ही बता, अब कहूँ क्या? (अंतरा – 2) हँसी का मुखौटा पहने हुए, फिरता हूँ दर्द को सीने हुए। महफ़िल में सबको हँसाता हूँ, तन्हाई में खुद को रुलाता हूँ। तकिये ने रातों का हाल सुना, आँखों ने कितने सवाल बुने। जिस दर्द को दुनिया पढ़ न सकी, वो दर्द तेरे दर पर रख दिया। (अंतरा – 3) माथे की धूल तिलक हुई, आँसू की बूँद अभिषेक हुई। जिस 'मैं' को सीने से बाँधा था, वो तेरी चौखट पर राख हुई। अब जीत का कोई मान नहीं, अब ह...

No- 396. जब तक घर नहीं छोड़ोगे, तब तक कहीं नहीं पहुँचोगे!

अपनी सीमाओं से बाहर निकलने, संभावनाओं को पहचानने और स्वयं अपनी पहचान बनाने का जीवन-दर्शन मनुष्य का जीवन संभावनाओं से भरा होता है। हर व्यक्ति के भीतर कुछ बड़ा करने, अपनी अलग पहचान बनाने, परिवार का नाम रोशन करने और समाज में अपना योगदान देने की इच्छा होती है। कोई वैज्ञानिक बनना चाहता है, कोई उद्यमी, कोई खिलाड़ी, कोई लेखक, कोई कलाकार तो कोई देश और समाज के लिए कुछ असाधारण करना चाहता है। लेकिन एक सवाल है—क्या केवल सपने देखने से कोई व्यक्ति अपनी मंजिल तक पहुँच सकता है? क्या प्रतिभा, शिक्षा और संसाधन ही सफलता के लिए पर्याप्त हैं? यदि ऐसा होता तो दुनिया में हर प्रतिभाशाली व्यक्ति सफल होता और हर शिक्षित व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुरूप ऊँचाई प्राप्त कर चुका होता। वास्तविकता इससे अलग है। अक्सर हमारी सबसे बड़ी बाधा परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि वे सीमाएँ होती हैं जिन्हें हमने स्वयं अपने चारों ओर बना लिया है। हम बदलाव चाहते हैं, लेकिन अपनी आदतें बदलना नहीं चाहते। हम सफलता चाहते हैं, लेकिन असफलता का जोखिम नहीं उठाना चाहते। हम नई पहचान चाहते हैं, लेकिन पुराने परिचित दायरे से बाहर निकलने का साहस नहीं जुट...

No- 395. कमबख़्त दिल, भरोसे की आदत लयबद्ध भाव-कविता | तालियों और तबले की संगत

🎵 मुखड़ा बार-बार विश्वास है टूटा, फिर भी दिल ये मानता नहीं, दुनिया ने तो लाख सिखाया, दिल को मगर समझ आता नहीं। कमबख़्त मेरा दिल है ऐसा, भरोसा करना छोड़ता नहीं! लाख दफ़ा ये टूट चुका है, फिर भी किसी से रूठता नहीं! १. बचपन का भरोसा बचपन में जिनको अपना माना, उनसे ही धोखा खाया था, भोले मन को राह दिखाएँगे, सोच के हाथ बढ़ाया था। जिन हाथों को थाम के चलना, उनसे ही ठोकर खाई थी, जिस उम्र में सपने थे सजते, उस उम्र में चोट पराई थी। बार-बार विश्वास है टूटा, फिर भी दिल ये मानता नहीं, कमबख़्त मेरा दिल है ऐसा, भरोसा करना छोड़ता नहीं! २. दोस्ती के दिन उम्र बढ़ी तो दोस्त मिले कुछ, कुछ अपने कहलाने आए, दिल की बातें दिल से बाँटीं, सपने नए सजाने आए। जिनको अपना राज़ बताया, कुछ ने वही उछाला था, जिन पर सबसे ज़्यादा यक़ीं था, उनसे ही दिल हारा था। फिर भी दिल ने आस लगाई, सबका मन तो काला नहीं, एक ने धोखा दिया अगर तो, हर इंसान निराला नहीं! बार-बार विश्वास है टूटा, फिर भी दिल ये मानता नहीं, कमबख़्त मेरा दिल है ऐसा, भरोसा करना छोड़ता नहीं! ३. मोहब्बत का फ़साना चार लफ़्ज़ मोहब्ब...

No- 394. अंत तक तुझे लड़ना होगा!

एक ओजस्वी मंचीय कविता — राकेश मिश्रा की कलम से जब सच पर पहरे हों, जब झूठ के चेहरे हों, जब प्रश्न उठाने वालों के रास्तों में अँधेरे हों— तब कलम उठानी होगी, हर परत हटानी होगी। सवाल उठाया है तो, उत्तर तक जाना होगा, सत्य की राह चुनी है तो, अंत तक निभाना होगा! ताजमहल की सुंदरता पर किसको भला इनकार है? पर उसके इतिहास को जानना क्या कोई अपराध है? इमारत भी अपनी विरासत, उसका इतिहास भी जानें, पत्थरों की ख़ामोशी में दफ़्न प्रश्न भी पहचानें। न सुंदरता कम हो सच से, न सच पर पर्दा डाला जाए, जो तथ्य मिले, वह लिखा जाए, जो अज्ञात हो, खोजा जाए। इतिहास न बिकने वाली वस्तु, न सत्ता का गुणगान बने, इतिहास वही इतिहास रहे, जो प्रमाणों की पहचान बने! सच को सजाना मत, सच को छिपाना मत, प्रश्नों से डरकर नज़रें चुराना मत! नालंदा की राख से पूछो, ज्ञान का कितना नुकसान हुआ, जिन कक्षों में विद्या बसती थी, वहाँ कितना अँधियारा हुआ। कितनी पांडुलिपियाँ खोईं, कितने विचार बिखर गए, मानवता के ज्ञान-सरोवर के कितने उजले तट उजड़ गए। किसने आग लगाई थी? क्या-क्या नष्ट हुआ था? इतिहास के उन कठिन सवालों का प्रमाण कहाँ उपलब्ध हुआ था? न अनुमा...

No- 393. तूफ़ान को तूफ़ान रहने दो!

  रचनाकार: राकेश मिश्रा जब भारत के वीरों ने, रण में हुंकार लगाई थी, तब दुनिया को भारत की, शक्ति समझ में आई थी। तोपों की गर्जन गूँजी थी, धरती भी थर्राई थी, वीरों के अदम्य साहस ने, विजय पताका फहराई थी। तोपों की गर्जन कम न हो, वीरों का साहस कम न हो। कलम की धार कभी थमे नहीं, युवा की रफ़्तार कभी थमे नहीं। कहते हैं, तूफ़ान को, इक दिन शांत हो जाना है, गरजते बादल को भी आख़िर, ख़ामोशी में खो जाना है। लेकिन मैंने ठान लिया है, अपना मत बतलाना है, हर तूफ़ान को हर क़ीमत पर, शांत नहीं हो जाना है। जब तक अन्याय ज़िंदा है, हुंकार ज़िंदा रहनी है, जब तक सत्य अकेला है, ललकार ज़िंदा रहनी है। कलम चले, कविता गूँजे, युवा शक्ति लहराए, भारत माँ के गौरव का, परचम ऊँचा लहराए। कलम रुकी तो सच हारेगा, कौन सवाल उठाएगा? कवि चुप हुआ तो जन-मन को, कौन जगाने आएगा? युवा जोश यदि थम जाएगा, कौन नया इतिहास रचाएगा? सज्जन जब ख़ामोश रहेंगे, दुष्टों का तांडव छाएगा। कलम नहीं रुकने पाएगी, कविता नहीं दबेगी, सच की आवाज़ समय के सीने पर, अमिट छाप लिखेगी। युवा लहू की रवानी से, हर मंज़िल मुस्काएगी, भारत की नवशक्...

No- 392. ऊँचाइयों का मूल्य: आलोचना, विरोध और संघर्ष

एक प्रेरक एवं विचारपरक आलेख जितना ऊँचा उठेंगे, उतनी अधिक निगाहें आप पर होंगी। जितनी बड़ी जिम्मेदारी निभाएँगे, उतने अधिक सवालों का सामना करेंगे। लेकिन आपकी वास्तविक परीक्षा इस बात में है कि आप आलोचना से सीखते हैं, विरोध के बीच विवेक बनाए रखते हैं और कठिन परिस्थितियों में भी अपने उचित लक्ष्य से पीछे नहीं हटते। जीवन एक ऐसी यात्रा है, जिसमें सफलता के साथ चुनौतियाँ भी बढ़ती हैं। जब व्यक्ति साधारण जीवन जी रहा होता है, तब उसके निर्णयों, विचारों और कार्यों पर बहुत कम लोगों का ध्यान जाता है। लेकिन जैसे ही वह अपनी योग्यता, परिश्रम और संकल्प से आगे बढ़ने लगता है, उसकी पहचान का दायरा विस्तृत होने लगता है। उसके कार्यों की चर्चा होती है, निर्णयों की समीक्षा होती है और उसकी क्षमताओं के साथ-साथ उसकी कमियों पर भी लोगों की नजर पड़ने लगती है। यहीं से जीवन की एक नई परीक्षा शुरू होती है। कुछ लोग आपकी सफलता से प्रेरित होंगे, कुछ आपका समर्थन करेंगे और कुछ आपके विचारों से असहमत होंगे। कुछ लोग आपकी कमियाँ बताएँगे, जिनसे आपको सीखने का अवसर मिलेगा। वहीं, कभी-कभी आपको ऐसी आलोचना भी सुननी पड़ सकती है, जिसका उद्देश...

No- 391. आज का कुरुक्षेत्र हमारे भीतर है

आधुनिक मनुष्य, स्थिर मन और श्रीमद्भगवद्गीता हमने दुनिया को बदलने के लिए विज्ञान बनाया, दूरी मिटाने के लिए तकनीक बनाई, समय बचाने के लिए मशीनें बनाईं, और संवाद को तेज करने के लिए सोशल मीडिया बना लिया। लेकिन एक प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है— क्या हमने अपने मन को समझने और उसे स्थिर रखने की क्षमता भी उसी गति से विकसित की है? आज सूचना पहले से अधिक है, लेकिन विवेक उतना ही बढ़ा है—यह आवश्यक नहीं। हमारे पास संवाद के साधन पहले से अधिक हैं, लेकिन संवाद की गुणवत्ता क्या उतनी ही बढ़ी है? हम हजारों लोगों से डिजिटल रूप से जुड़े हैं, लेकिन क्या अपने परिवार, अपने समाज और सबसे बढ़कर— अपने आप से हमारा संवाद मजबूत हुआ है? समाज में असहिष्णुता, आक्रोश, नशा, अपराध, हिंसा, अवसाद, रिश्तों में कटाव, विश्वास की कमी, दिखावे की संस्कृति और लगातार बढ़ती तुलना जैसे अनेक प्रश्न दिखाई देते हैं। सत्ता, धन और प्रतिष्ठा के प्रति आसक्ति भी अनेक स्तरों पर दिखाई देती है। इन सबके कारण अलग-अलग हो सकते हैं। इन्हें केवल सोशल मीडिया के खाते में डाल देना समस्या को बहुत सरल बना देना होगा। लेकिन सोशल मीडिया ने एक क...