ज़िंदगी की किताब ख़ुद लिखो
मनुष्य जब इस संसार में जन्म लेता है, वह एक जीवित पुस्तक की तरह आता है। उसके जीवन का पहला पन्ना उसके हाथ में नहीं होता। उस पर उसका नाम लिखा होता है, उसका परिवार लिखा होता है, उसकी जन्मभूमि लिखी होती है, उसकी परिस्थितियाँ लिखी होती हैं। यह सब भूमिका है, प्रस्तावना है — लेकिन कहानी नहीं। कहानी वहाँ से शुरू होती है जहाँ खाली पन्ने शुरू होते हैं। यही खाली पन्ने जीवन का सबसे बड़ा रहस्य हैं। ईश्वर हमें जीवन देता है, पर जीवन की कहानी लिखने का अधिकार हमें सौंप देता है। वह हमें कलम देता है — निर्णय की। स्याही देता है — कर्म की। कागज़ देता है — समय का। फिर देखता है कि हम अपनी कहानी कैसे लिखते हैं। लेकिन विडंबना देखिए — अधिकांश लोग कलम हाथ में होते हुए भी लेखक नहीं बनते। वे अपनी किताब दूसरों को सौंप देते हैं। समाज लिखता है — “तुमसे नहीं होगा।” रिश्तेदार लिखते हैं — “इतना ही काफी है।” परिस्थितियाँ लिखती हैं — “सीमा यहीं तक है।” डर लिखता है — “जोखिम मत लो।” असफलता लिखती है — “अब रुक जाओ।” धीरे-धीरे उनकी जिंदगी एक ऐसी किताब बन जाती है जिसका लेखक कोई और होता है, और जिसे पढ़ने में किसी को प्रेरणा...