संदेश

“जितने का चांस अगर 1% भी है, तो भी वहाँ 100% कोशिश करो”

जीवन एक युद्धभूमि है। यहाँ हर दिन हमें छोटे-छोटे और बड़े-बड़े निर्णय लेने होते हैं। कभी परिस्थिति अनुकूल होती है, तो कभी प्रतिकूल। कभी संसाधन भरपूर होते हैं, तो कभी सीमित। कभी लोग साथ खड़े होते हैं, तो कभी हम बिल्कुल अकेले महसूस करते हैं। ऐसे समय में मन एक प्रश्न पूछता है — “क्या इसमें जीतने का कोई चांस है?” यदि उत्तर मिलता है — “हाँ, थोड़ा बहुत है” तो हम आगे बढ़ते हैं। लेकिन यदि उत्तर मिलता है — “बस 1% ही संभावना है” तो अधिकतर लोग पीछे हट जाते हैं। यही वह क्षण है जहाँ साधारण और असाधारण लोगों के बीच अंतर पैदा होता है। साधारण व्यक्ति संभावना का हिसाब लगाता है। असाधारण व्यक्ति संकल्प का। 1% संभावना का अर्थ है — दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। आकाश पूरी तरह अंधकारमय नहीं हुआ है। रास्ता पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और जब तक रास्ता पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, तब तक प्रयास भी समाप्त नहीं होना चाहिए। जीवन का यह सिद्धांत केवल प्रेरक वाक्य नहीं है, यह चरित्र निर्माण की आधारशिला है। यह नेतृत्व का मूल मंत्र है। यह व्यवसाय, शिक्षा, खेल, समाज और आध्यात्म — हर क्षेत्र में लागू होता है। किसी भी बड़...

जीवन के तीन शाश्वत प्रश्न. (लक्ष्य, स्थान और कर्म का समन्वित जीवन-दर्शन)

प्रस्तावना : निर्णय ही जीवन की दिशा है मनुष्य का जीवन घटनाओं का परिणाम नहीं है; वह निर्णयों का परिणाम है। परिस्थितियाँ सबके जीवन में आती हैं। परंतु परिस्थितियाँ किसे कहाँ तक ले जाएँगी — यह व्यक्ति के निर्णय तय करते हैं। निर्णय तभी परिपक्व होते हैं जब मन स्पष्ट हो। और मन तभी स्पष्ट होता है जब व्यक्ति स्वयं से सही प्रश्न पूछता है। बड़े लक्ष्य रखने वाला व्यक्ति सामान्य जीवन नहीं जी सकता। उसे स्वयं से गहरे प्रश्न पूछने ही पड़ते हैं। ऐसे तीन प्रश्न हैं, जो किसी भी महत्वाकांक्षी, संवेदनशील और दूरदर्शी व्यक्ति के लिए अनिवार्य हैं: मैं क्या सीखना चाहता हूँ और क्यों? मैं कहाँ रहना चाहता हूँ और क्यों? मैं क्या करना चाहता हूँ और क्यों? ये प्रश्न केवल वाक्य नहीं हैं — ये जीवन की धुरी हैं। भाग 1 पहला प्रश्न: मैं क्या सीखना चाहता हूँ और क्यों? 1.1 सीखना केवल शिक्षा नहीं, दिशा है बहुत लोग पढ़ते हैं। बहुत लोग डिग्रियाँ लेते हैं। बहुत लोग कोर्स करते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि वे सीख क्यों रहे हैं। यदि सीखना उद्देश्य से जुड़ा नहीं है, तो वह जानकारी है। यदि सीखना उद्देश्य से जुड़ा है, तो वह शक्त...

खुद का डर हटाने के लिए, दूसरे को साहस दीजिए. (वीर रस कविता)

भय के बादल मन में छाए, कदम रुके, विश्वास थमाए। तन कांपे, दृष्टि डगमगाए, पर भीतर एक दीप जगाए। उठो! किसी का हाथ थाम लो, उसके मन में ज्योति जला दो। जो दीप जलाओगे तुम उसमें, वह प्रकाश, स्वयं में पा लो। डर है केवल तम का घेरा, साहस है उगता सवेरा। जो औरों के हित दीपक बने, उसका जीवन न होगा अँधेरा। जो गिरते को तुम सहारा दो, जो रोते को तुम हँसाओ। उसकी आँखों में विश्वास देखो, वह शक्ति तुम्हारे भीतर आए।  मत डर तू अपने संकट से, मत झुक तू अपने शोक से। जब थामेगा हाथ किसी का, बच जाएगा हर आघात से। डर कायरता का बंधन है, साहस वीरों का आभूषण। जो जन-जन में जोश जगा दे, वही धारण करे सिंहासन। गिरते को यदि तू उठा दे, रोते को यदि हँसा दे। उसकी आँखों का जो विश्वास, तेरे भीतर अग्नि जगा दे। सेवा से साहस उपजता, निस्वार्थ हृदय बल रचता। जो औरों के लिए खड़ा हो, वह स्वयं भी निर्भीक सजता। उठ, बढ़, ललकार स्वयं को, टूट पड़े हर अवरोध पर। जो साहस का शंख बजाए, विजय लिखे वह हर मोड़ पर। जो दीप जलाए तूफानों में, वह अडिग रहे मैदानों में। जो औरों को निर्भय करता, वह विजयी हर अभियान में। खुद का डर हटाना है यदि, जग में ज्वाला प्...

अच्छी आदत, बुरी आदत और चरित्र निर्माण

जीवन को नरक से स्वर्ग बनाने की संपूर्ण साधना “जीवन में एक गलत निर्णय, एक गलत संगति, एक गलत आदत आपकी जिंदगी को नरक बना देती है; और एक अच्छी आदत, अच्छी संगति, अच्छे विचार और अच्छा चरित्र आपकी जिंदगी को स्वर्ग बना देते हैं।” मनुष्य का जीवन किसी एक बड़े अवसर से नहीं बदलता। जीवन बदलता है — रोज़ की छोटी-छोटी आदतों से। हम जैसा रोज़ करते हैं, वैसा ही बन जाते हैं। और हम जैसे बन जाते हैं, वैसा ही हमारा भाग्य बन जाता है। भाग 1 : आदत से चरित्र और चरित्र से भाग्य आदतें केवल क्रियाएँ नहीं हैं — वे चरित्र की निर्माता हैं। विचार → व्यवहार बनते हैं व्यवहार → आदत बनते हैं आदत → चरित्र बनती है चरित्र → भाग्य बनता है इसलिए यदि भाग्य बदलना है, तो आदत बदलनी होगी। और यदि आदत बदलनी है, तो आत्मसंयम जगाना होगा। भाग 2 : असली जीवन – जब आप अकेले होते हैं बड़ी बात यह नहीं है कि आप समाज में कितने सज्जन दिखते हैं। बड़ी बात यह है कि जब आप अकेले होते हैं  तब आप क्या सोचते हैं आप अपना समय कैसे बिताते हैं आपकी ऊर्जा किस दिशा में जाती है आप अपने जीवन के उद्देश्य के प्रति कितने निष्ठावान हैं दुनिया के सामने अच्छा ...

सपने स्वेटर की तरह होते हैं — उन्हें खुद बुनना पड़ता हैएक विस्तृत प्रेरक जीवन-दर्शन

मनुष्य का जीवन केवल जन्म और मृत्यु के बीच की दूरी नहीं है। यह एक यात्रा है — उद्देश्य की, संघर्ष की, आत्म-खोज की और निर्माण की। इस यात्रा में यदि कोई शक्ति हमें आगे बढ़ाती है, तो वह है — सपना। सपना ही वह बीज है, जो भविष्य का वृक्ष बनता है। सपना ही वह विचार है, जो समय के साथ उपलब्धि में बदलता है। लेकिन एक गहरी सच्चाई यह भी है कि सपने अपने आप पूरे नहीं होते। वे किसी जादू से साकार नहीं होते। उन्हें बनाना पड़ता है, गढ़ना पड़ता है, बुनना पड़ता है। इसीलिए कहा गया है — “सपने स्वेटर की तरह होते हैं — उन्हें खुद बुनना पड़ता है।” यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि जीवन का सिद्धांत है। आइए इस विचार को गहराई से समझें। 1. स्वेटर और सपना — एक गहरा रूपक स्वेटर जब तक ऊन के गोले में है, वह केवल संभावना है। जब तक ऊन सुई पर नहीं चढ़ती, तब तक वह केवल सामग्री है। जब तक धैर्य और श्रम नहीं जुड़ते, तब तक वह स्वेटर नहीं बनता। ठीक उसी प्रकार: सपना जब तक मन में है, वह केवल कल्पना है। जब तक उस पर कार्य नहीं होता, वह केवल इच्छा है। जब तक त्याग, अनुशासन और परिश्रम नहीं जुड़ते, वह उपलब्धि नहीं बनता। स्वेटर बुनते समय एक-ए...

परिस्थितियाँ बदलने का दम रखो — क्योंकि समस्याएँ खत्म होने के लिए नहीं, तुम्हें मजबूत बनाने के लिए आती हैं

रात के 2 बजे थे। चारों तरफ़ सन्नाटा। एक छोटा सा कमरा। टूटी कुर्सी, मेज़ पर बिखरी किताबें, और एक लड़का — सिर पकड़कर बैठा हुआ। उसके दिमाग में सिर्फ एक सवाल घूम रहा था — “भगवान… मेरे साथ ही क्यों?” पैसों की कमी, घर की जिम्मेदारी, परीक्षा का डर, लोगों की बातें… सब एक साथ उस पर टूट पड़े थे। उसे लग रहा था कि बस — अब और नहीं। लेकिन उसी रात, खिड़की से आती ठंडी हवा ने जैसे उसके अंदर एक आवाज़ जगाई — “समस्याएँ खत्म नहीं होंगी… लेकिन तू खत्म होने के लिए पैदा नहीं हुआ है।” यहीं से कहानी बदलती है। और यही से हर विजेता की कहानी शुरू होती है। जीवन कोई गार्डन नहीं, युद्धभूमि है हम सब सोचते हैं — “बस यह परेशानी खत्म हो जाए, फिर चैन से जीएँगे।” पर सच्चाई यह है — जीवन ने कभी किसी से वादा नहीं किया कि रास्ता आसान होगा। बच्चा है — तो पढ़ाई का दबाव जवान है — तो करियर का संघर्ष परिवार है — तो जिम्मेदारियाँ उम्र बढ़ी — तो स्वास्थ्य की चिंता समस्या नहीं होगी तो विकास भी नहीं होगा। तलवार घिसने से चमकती है, फूल नहीं। समस्या दर्द नहीं देती, सोच देती है दो लोग एक ही हालात में होते हैं। एक कहता है — “मेरी किस्मत खराब...

परिवार: आर्थिक एकता से पीढ़ियों की समृद्धि तक

जब घर बनाते हैं तो भविष्य सोचते हैं, फिर व्यवसाय में भविष्य क्यों नहीं सोचते? जब कोई व्यक्ति मकान बनाता है, वह केवल वर्तमान के लिए नहीं बनाता। वह सोचता है: बच्चों के लिए अलग अध्ययन कक्ष पूजा घर अलग बुज़ुर्गों के लिए आरामदायक कमरा रसोई ऐसी जहाँ पूरा परिवार साथ बैठे जब कपड़े खरीदता है — परिवार को ध्यान में रखता है। जब भोजन खरीदता है — परिवार की सेहत सोचता है। लेकिन जब आय, व्यवसाय और रोज़गार की बात आती है — वह अकेले निर्णय लेने लगता है। यहीं से परिवार की आर्थिक यात्रा बिखरने लगती है। भाग 1 परिवार: सबसे बड़ी अनदेखी आर्थिक संस्था हर परिवार वास्तव में एक “आर्थिक संस्था” है। इस संस्था में: वरिष्ठ सदस्य = मार्गदर्शक कमाने वाले सदस्य = प्रबंधक महिलाएँ = संचालन और संस्कृति प्रमुख बच्चे = भविष्य की पूंजी यदि यह संस्था संगठित हो जाए — तो यह एक कंपनी से अधिक शक्तिशाली हो सकती है। भाग 2 मूल उदाहरण – आर्थिक तुलना प्रारंभिक स्थिति: कमाने वाले सदस्य: 3 कुल मासिक आय: ₹1,00,000 कुल सदस्य: 12 महिलाएँ: 4 बच्चे: 5 मॉडल 1: संयुक्त परिवार मासिक खर्च (यथार्थवादी अनुमान) मद.          ...