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समय की चाल : जागरण-गाथा

समय की चाल प्रचंड है, न कोमल है, न मंद है, यह न्याय-अग्नि का दंड है, यह सृष्टि का अनुबंध है। न राजा रुकता, न रंक ठहरता, न विजय-नाद यहाँ ठहरता, जो आज गगन पर चढ़ता है, कल धूलि में ही बिखरता। इतिहास के पन्ने बोल उठे — “कहाँ गया वह अभिमान?” क्षण भर जिसने गर्जन किया, फिर खो बैठा पहचान। अधर्म जला क्षणिक दीप-सा, अहंकार गिरा निपात-सा, समय की धारा जब बही, सब बह गया प्रभात-सा। जो सत्य-पथिक अडिग रहा, उसका ही दीप जला सदा, ग्रंथों की वाणी गूँज उठी — “सत्य अमर है, बाकी क्षणभंगुर सदा।” जीवन है श्वासों की माला, हर मोती में भाग्य का जाला, पाप-पुण्य का सूक्ष्म लेखा, समय रखे हर इक पाला। सुख आया — तो संयम धर, दुःख आया — तो मत तू डर, दोनों क्षणिक अतिथि जग में, दोनों ही शिक्षक अमर। यश मिला — विनम्र रहो, अपयश मिला — तो स्थिर रहो, आज जिसे जयकार मिली, कल उसको भी धिक्कार सहो। परिस्थिति जब वज्र बने, संघर्ष अग्नि-सम प्रखर बने, तब मत झुक, मत टूट मनुज, तू ही अपना शंकर बने। बीज दबा जब अंध तले, तभी वटवृक्ष निकलता है, मानव जब तपता विपदा में, तभी चरित्र सँभलता है। जो विपत्ति से भाग गया, वह समय से हार गया, जो विपत्ति से...

“भारत माता की शपथ – युगों की अमर गाथा” 🇮🇳

🔱 १. आध्यात्मिक एवं प्राचीन भारत जब करुणा का प्रथम दीप जला, जग में मानवता का ज्ञान हुआ, जब मध्यम मार्ग का संदेश मिला— गौतम बुद्ध से विश्व महान हुआ। जब अहिंसा का व्रत अमर बना, संयम का पावन पथ साकार, महावीर ने जग को सिखलाया— आत्मविजय ही है असली सार। जब अद्वैत की ज्योति प्रज्वलित हुई, ज्ञान बना जीवन का आधार, आदि शंकराचार्य ने जोड़ा भारत— एक सूत्र, एक संस्कार। जब मौर्य ध्वजा लहराई नभ में, अखंड भारत का स्वप्न साकार, सिंहासन पर विराजित थे चंद्रगुप्त मौर्य अपार। जब कलिंग के रण से बदल गया एक सम्राट का अंतर्मन, शस्त्र त्याग धर्म अपनाया— अशोक बना शांति का वंदन। ⚔️ २. मध्यकालीन शौर्य जब अरावली की शपथ लिए वन-वन अडिग रहे प्रताप, स्वाभिमान का अर्थ सिखाया महाराणा प्रताप ने आप। जब सह्याद्रि की गूँज बनी हिंदवी स्वराज की पुकार, शिवाजी ने गढ़ा स्वाभिमान— जन-जन का अधिकार। जब खालसा की गरज सुनाई दी, धर्म-रक्षा का लिया प्रण महान, गुरु गोविंद सिंह ने गढ़ दिए सिंह समान बलिदानी जवान। 🔥 ३. स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला जब प्रथम चिंगारी दहकी थी मंगल पांडे के शौर्य-विचार, तब क्रांति की नींव रखी गई— अन्याय हुआ लाच...

“अभिमन्यु: जो हर युग में जन्म लेता है”

(4/4 ताल, हर पंक्ति में )  ढोल गरजा! रण दहका! काँपी धरती लाल! बीच व्यूह में खड़ा अकेला—धर्मपुत्र विक्राल! एक ओर थे कुटिल कौरव— छल का काला जाल, एक ओर था सत्य अकेला— तेजस्वी, निष्कल, निष्काल। धनुष उठाया बालक ने तो काँपा अधर्म-व्यूह, तीरों की ज्वाला में जलता कौरव-गर्व-वृक्ष। पर जब टूटा धनुष अचानक— टूट गया रथ-चक्र, काल ठिठक कर देखने आया— कैसा यह प्रहर! निरस्त्र खड़ा वह रक्त-स्नात, फिर भी दृष्टि प्रखर, मानो अग्नि देह में धधके, मानो सूर्य अमर। एक नहीं थे सामने उसके— सातों एकसाथ! धर्म भुलाकर टूट पड़े वे— त्याग नियम की राह! पहला वार पड़ा जब उस पर— धरती करुण पुकार, दूजा वार पड़ा तो रोया— नीला अम्बर पार। तीजा वार—काँपा इतिहास! चौथा—लज्जित काल! पाँचवाँ वार पड़ा तो जैसे फट गया अंतर्मन जाल। छठा वार—माँ सुभद्रा का काँप उठा हृदय, सातवाँ वार लगा तो रोई स्वयं विजय की नय। रक्त बही तो लगा मानो गंगा उलटी बहती, हर बूँद कहती— “देखो जग! वीरता यूँ ही रहती!” न ढाल रही, न शस्त्र शेष, न रथ, न सारथी पास, फिर भी मुख पर ज्वाला ऐसी— जग से ऊँचा प्रकाश। गिरते-गिरते गरजा वह— स्वर में बिजली धार, “मारो तन को, धर्म अज...

आदर्श कार्य-संस्कृति : उत्पादकता, विकास और संतुलित जीवन की समन्वित व्यवस्था

किसी भी राष्ट्र, संगठन या उद्योग की वास्तविक शक्ति केवल उसकी पूँजी या मशीनें नहीं होतीं, बल्कि उसकी कार्य-संस्कृति (Work Culture) होती है। कार्य-संस्कृति ही तय करती है कि वहाँ काम करने वाले लोग केवल नौकरी कर रहे हैं या किसी बड़े उद्देश्य का हिस्सा हैं। जब कार्य-संस्कृति में अनुशासन, संवेदनशीलता, समानता, उत्पादकता और मानवीय मूल्यों का संतुलन होता है, तभी संगठन दीर्घकालीन विकास की ओर बढ़ता है। आज के युग में जहाँ तकनीक तेज़ी से बदल रही है, वहीं जीवन की गति भी अत्यधिक तीव्र हो गई है। ऐसे में उत्पादकता (Productivity) और Work-Life Balance के बीच संतुलन बनाना अत्यंत आवश्यक है। विशेष रूप से महिलाओं और पुरुषों की भूमिकाओं को ध्यान में रखते हुए एक ऐसी आदर्श पद्धति विकसित करनी होगी, जो न्यायपूर्ण, व्यावहारिक और संवेदनशील हो। 1. कार्य-संस्कृति का मूल दर्शन आदर्श कार्य-संस्कृति का आधार निम्न पाँच स्तंभों पर होना चाहिए: - कर्तव्यबोध और अनुशासन - सम्मान और समान अवसर - मानवीय संवेदना - उत्पादकता और गुणवत्ता -जीवन संतुलन और परिवार का सम्मान कार्य-संस्कृति केवल नियमों से नहीं बनती; वह नेतृत्व के आचरण से...

एक-एक बूंद का जीवन-दर्शन

प्रस्तावना : सूक्ष्म ही मूल है संसार में जो कुछ भी विराट दिखाई देता है, उसका आरंभ अदृश्य और सूक्ष्म होता है। बीज धरती में दबा होता है, पर उसी में वटवृक्ष छिपा रहता है। विचार दिखाई नहीं देता, पर वही सभ्यताओं को जन्म देता है। सागर बूंदों से बनता है। पर्वत कणों से बनते हैं। और चरित्र — क्षण-क्षण के निर्णयों से बनता है। मनुष्य की भूल यही है कि वह परिणाम चाहता है, प्रक्रिया नहीं; वह ऊँचाई चाहता है, पर सीढ़ियाँ नहीं चढ़ना चाहता। संसार का हर महान परिवर्तन किसी विशाल विस्फोट से नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म बिंदु से आरंभ होता है। सागर बूंदों से बनता है, पर्वत कणों से बनते हैं, और चरित्र छोटे-छोटे कर्मों से बनता है। मनुष्य अक्सर बड़े अवसर, बड़े साधन और बड़े मंच की प्रतीक्षा करता है; परंतु जीवन का सत्य यह है कि बड़ा कभी अचानक नहीं बनता — वह बूंद-बूंद संचय से बनता है। पर जीवन का अटल नियम है — बड़ा कभी अचानक नहीं बनता; वह निरंतर संचय से बनता है। 1️⃣ सृजन का सिद्धांत : संभावना की परिपक्वता जब वर्षा की एक बूंद सीप में गिरती है, वही मोती बन जाती है। पर वही बूंद यदि पत्थर पर गिरे, तो केवल सूख जाती है। इसका अ...

एक बूंद

🌊 (१) सृजन का प्रारंभ १ बूंद गिरी जब सीप में, बनती निर्मल मोत। लघु कण पाता मान तब, जग में अमरित ज्योत॥ २ बूंद जली प्यासे अधर, जागे जीवन-श्वास। सूखा वन हरषाय फिर, फूटे नव विश्वास॥ ३ एक किरन तम हर सके, खोल प्रकाश-द्वार। नन्हा दीपक जीत ले, घनघोर अंधकार॥ ४ स्याही की इक बूंद से, लिखे समय इतिहास। अंतिम पन्ना बोल उठे, जीवन का प्रकाश॥ ५ रक्त-बिंदु दानार्थ जब, बहता पावन भाव। मृतप्राय देहों में जगे, नव जीवन की छाव॥ ६ शक्ति-बिंदु नारी धरे, बनती जग की माँ। ममता से पोषित करे, धरती और गगन॥ ७ रुपया एक लगन से, पूरा करे संकल्प। बूंद-बूंद से पर्वत ढहे, मिटे कठिन विकल्प॥ 📖 (२) ग्रंथ-साक्षी – इतिहास का प्रमाण ८ मानस में इक नाम से, पत्थर तरि गए तात। राम-नाम की बूंद से, मिटे भवसिंधु-त्रात॥ ९ गीता का इक श्लोक जब, उतरा अर्जुन-प्राण। संशय-बूंद विलीन हुई, जागा दिव्य विधान॥ १० कुरु सभा में एक छल, पासे की वह चाल। शकुनि बुद्धि की बूंद से, जल उठा महाभार॥ ११ एक स्मित माधव का, बदला रण का रूप। श्रीकृष्ण नीति की इक रेख से, जीता धर्म-स्वरूप॥ १२ श्रद्धा की इक बूंद से, पूजित हो भगवान। भगवान शंकर प्रसन्न तब हो उठें, दें ...

सुनो, सीखो, लिखो और जियो : ज्ञान को जीवन में उतारने की साधना

प्रस्तावना : ज्ञान का संग्रह नहीं, ज्ञान का संस्कार मनुष्य का जीवन केवल समय बिताने के लिए नहीं है; यह आत्म-विकास, आत्म-निर्माण और आत्म-उत्कर्ष की यात्रा है। हम प्रतिदिन अनेक बातें सुनते हैं, अनेक दृश्य देखते हैं और अनेक अनुभवों से सीखते हैं। संसार एक विशाल विश्वविद्यालय है और हर दिन उसका नया पाठ है। किन्तु प्रश्न यह है कि— क्या हम उस पाठ को केवल सुनकर आगे बढ़ जाते हैं? क्या हम उस प्रेरणा को केवल उस क्षण तक सीमित रख देते हैं? सच्चाई यह है कि जो ज्ञान जीवन में उतरता नहीं, वह धीरे-धीरे स्मृति से मिट जाता है। इसलिए आवश्यक है कि जो भी अच्छा सुनें, अच्छा देखें, अच्छा सीखें—उसे केवल मन में न रखें, बल्कि उसे लिखें, पढ़ें और जिएँ। अच्छा सुनना : विवेकपूर्ण श्रवण की कला सुनना एक साधना है। कानों से सुनना सरल है, पर हृदय से सुनना दुर्लभ है। आज सूचना का विस्फोट है। हर क्षण मोबाइल, समाचार, सोशल मीडिया और चर्चाएँ हमारे सामने हैं। परंतु हर बात ज्ञान नहीं होती। इसलिए पहला चरण है—विवेकपूर्ण चयन। जो बातें हमारे चरित्र को ऊँचा उठाएँ, जो प्रेरणा दें, जो जीवन को दिशा दें—उन्हें ग्रहण करें। अच्छे प्रवचन, प्रे...