No- 369. खुद खींचो किस्मत की लकीर
हाथ की लकीरें पढ़कर, कब तक सपने देखोगे? किस्मत के भरोसे बैठकर, कब तक खुद को रोकोगे? जो कल नहीं मिला तुमको, उसका आज इंतज़ार न कर, मेहनत को अपना साथी कर, अपने सपनों से प्यार कर। माना राह कठिन होगी, माना काँटे आएँगे, जो कदम बढ़ाते जाएँगे, वही मंजिल पाएँगे। किस्मत कहे—“मैं रूठी हूँ,” तुम कहना—“मैं तैयार हूँ।” रास्ता चाहे बंद मिले, मैं खुद उसका द्वार हूँ। गिरना हो तो गिर जाना, लेकिन वहीं न रुक जाना, हार मिले तो सीख लेना, फिर से कदम बढ़ाना। मेहनत की स्याही भर लेना, हौसलों की कलम उठाना, हाथ में जो लकीर नहीं है, उसको खुद लिखते जाना। लोग कहेंगे—“भाग्य यही है,” तुम कहना—“भाग्य बदलता है।” जिसके भीतर आग जले, उसका सूरज भी निकलता है। हथेली की लकीरें क्या हैं? कुछ रेखाएँ, कुछ निशान। असल कहानी लिखता है इंसान का कर्म, उसका मान। तो बैठकर मत देखो अपनी किस्मत की तस्वीर, जहाँ लकीर खत्म हो जाए— वहीं से खींचो नई लकीर। कल पूछेगा यह जमाना— “कैसे बदली अपनी तकदीर?” मुस्कुराकर कहना— “हाथ नहीं बदले थे मैंने, बस कर्मों से बदल दी अपनी किस्मत की लकीर।”