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No- 382. घर और बाहर

दुनिया जीतते-जीतते कहीं अपना घर तो नहीं हार रहे? एक ऐसा सवाल, जिसका जवाब शायद हमें अपने भीतर तलाशना चाहिए मैं यह लेख किसी को समझाने के लिए नहीं लिख रहा हूँ। न किसी परिवार को आदर्श बताने के लिए, न किसी परिवार को गलत साबित करने के लिए। मैं यह लेख इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि पिछले कुछ समय से मेरे मन में एक सवाल बार-बार उठता है— हम अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए आखिर क्या-क्या कर रहे हैं, और उस बेहतर जीवन को जीने के लिए हमारे पास बच क्या रहा है? हम पढ़ रहे हैं। कमाई बढ़ा रहे हैं। नौकरी बदल रहे हैं। व्यवसाय कर रहे हैं। शहर बदल रहे हैं। बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। घर खरीद रहे हैं। गाड़ी खरीद रहे हैं। SIP कर रहे हैं। Insurance ले रहे हैं। Retirement Planning कर रहे हैं। बच्चों के भविष्य के लिए पैसा जोड़ रहे हैं। दुनिया घूम रहे हैं। अपने लिए एक बेहतर जीवन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इनमें से कुछ भी गलत नहीं है। बल्कि यह सब जरूरी है। लेकिन इसी दौड़ के बीच कभी-कभी मन पूछता है— जिस जीवन को बेहतर बनाने के लिए हम इतनी मेहनत कर रहे हैं, क्या उस जीवन में हमारे अपने...

No- 381. घर कब घर नहीं रहता?

जब बाहर की दुनिया अच्छी और अपने लोग अजनबी लगने लगते हैं मैं इस प्रश्न का उत्तर किसी सिद्धांत से नहीं देना चाहता। न समाजशास्त्र की किताब से, न मनोविज्ञान की किसी परिभाषा से, न किसी उपदेश से। मैं इसे जीवन के उन छोटे-छोटे दृश्यों में देखना चाहता हूं, जिनके बीच हम रोज जीते हैं, लेकिन जिनका अर्थ बहुत देर से समझ में आता है। एक बच्चा अपने पिता की उंगली पकड़कर बाजार जाता है। वह किसी चीज के लिए जिद करता है। पिता अपनी जेब टटोलता है। बच्चे की इच्छा पूरी करने लायक पैसे नहीं हैं। लेकिन पिता बच्चे को यह महसूस नहीं होने देता कि उसके पास पैसे कम हैं। वह कोई दूसरा रास्ता निकालता है। बच्चा खुश हो जाता है। घर लौटकर मां को बताता है— “पापा ने मुझे यह खिलाया था। बहुत अच्छा था।” मां पति की जेब जानती है। वह समझती है कि उस दिन क्या हुआ था। लेकिन वह भी उस छोटी-सी खुशी को टूटने नहीं देती। तीनों अपनी-अपनी जगह उस घटना को जीते हैं। किसी ने गरीबी का नाम नहीं लिया। किसी ने त्याग का हिसाब नहीं रखा। किसी ने यह नहीं कहा— “मैंने तुम्हारे लिए इतना किया।” फिर भी उस दिन परिवार थोड़ा और जुड़ गया। यही...

No- 380. राकेश मिश्रा — 100 शायरियाँ

जिंदगी, रिश्ते, संघर्ष, प्रेम, स्वाभिमान और इंसानियत के रंग 1. सफर चल पड़ा हूँ तो रास्ते खुद बनेंगे, आज काँटे हैं तो कल फूल भी खिलेंगे। मंज़िल की चिंता नहीं, कदमों पर भरोसा है, जो मेरे साथ चले, वही मेरा कारवाँ है। 2. संघर्ष धूप ने पूछा—कितना और जलोगे? मैंने हँसकर कहा—जब तक निखर न जाऊँ। मुश्किलों ने पूछा—कब तक लड़ोगे? मैंने कहा—जब तक खुद से न जीत जाऊँ। 3. वक्त वक्त ने बड़ी खामोशी से सबक सिखाया, जिसे अपना समझा, उसका असली चेहरा दिखाया। कुछ रिश्ते टूटे तो कुछ मजबूत हुए, हम भी कल से थोड़ा ज्यादा समझदार हुए। 4. ठोकर ठोकर लगी तो रास्ता बदलने की सोची, फिर देखा—मंज़िल तो सामने ही खड़ी थी। बस नजर में थोड़ा धैर्य कम था, और कदमों में थोड़ा भरोसा कम था। 5. हौसला आंधियाँ आईं तो दीये को हाथों में ले लिया, रात लंबी थी तो खुद को संभाल लिया। किसी से रोशनी माँगने की आदत नहीं थी, सो अपने भीतर ही एक सूरज पाल लिया। 6. स्वाभिमान झुकना सीखा है मैंने रिश्तों के सम्मान में, मगर बिकना नहीं सीखा किसी के अभिमान में। जो देना हो इज्जत से दो, स्वीकार कर लूँगा, पर अपनी आत्मा का सौदा कभी ...

No- 379. राकेश मिश्रा के 200 शेर और शायरियाँ

दिल भी रहे, तेवर भी रहे और बात दिल तक भी पहुँचे खंड 1 — जिंदगी और संघर्ष 1. हालातों ने सिखाया है हालातों से लड़ना, गिरना कोई हार नहीं, फिर उठकर आगे बढ़ना। 2. ठोकरों ने मेरे कदमों को कमजोर नहीं किया, हर गिरावट ने मुझे पहले से बेहतर किया। 3. रास्ते मुश्किल थे तो हौसला बढ़ता गया, मैं चलता रहा और रास्ता बनता गया। 4. किस्मत के भरोसे बैठना मुझे आया नहीं, जो चाहिए था, उसे मेहनत से पाया सही। 5. वक्त ने कई बार मेरी परीक्षा ली, हर बार मैंने जिंदगी की नई किताब पढ़ी। 6. जो दर्द मिला उसे मुस्कान में ढाल दिया, जिंदगी ने जो दिया, उसे कमाल में ढाल दिया। 7. मैं थका जरूर हूँ, मगर रुका नहीं हूँ, अभी सफर बाकी है, मैं झुका नहीं हूँ। 8. कुछ सपने टूटे, कुछ नए बन गए, हम जिंदगी के साथ-साथ खुद भी बदल गए। 9. मुश्किलें आईं तो डरने की बजाय सोचने लगा, रास्ता बंद मिला तो रास्ता खोजने लगा। 10. मेरी कहानी आसान नहीं, मगर मेरी है, हर दर्द के पीछे कोई सीख खड़ी है। 11. मैंने अंधेरों से दोस्ती कर ली एक दिन, तभी तो उजाले की कीमत समझ आई। 12. जिंदगी ने पूछा—कितना चल सकते हो? मैंने कहा—जब...