“मैं मिट्टी का प्रहरी हूँ” 🔥
मेरे लहू का हर इक कतरा, इस मिट्टी पर वार है, तूफ़ानों की क्या औकात—मुझमें अडिग हुंकार है। मेरा लक्ष्य स्पष्ट अटल—हर झूठा मुखौटा तोड़ना, भ्रम के काले जाल से जन-जन को सच से जोड़ना। आज नहीं जो चेते हम—सब कुछ लुट जाएगा, मक्कारों का ये जाल हर आँगन तक छा जाएगा। जीवन पाया है तो अब कुछ काम में आना है, देश-धरती की खातिर खुद को आज़माना है। गरीब, मज़लूम, पीड़ित के संग सदा खड़ा रहूँ, मानव धर्म निभाते-निभाते दीप-सा जला रहूँ। समय की चाल उलटी है—अजब यहाँ व्यवहार है, जो सीधा दिखता बाहर, भीतर उसका वार है। सच की बातें करने वाला सबकी आँखें खटकता, झूठ के इस बाजार में हर सच पल-पल दबता। कई झुके हैं लालच में, कई सत्ता के घमंड में, कई बिके चाटुकार बन मीठे झूठे छंद में। पर मेरे संस्कारों ने बस एक मंत्र सिखाया है— सत्य के पथ पर चलना ही जीवन की माया है। तू है माँ भारती का लाल—तेरी रग-रग में आग है, तेरे तेज़ के आगे हर अन्याय बेहिसाब है। तेरे सिर पर महाकाल—तुझे कौन झुका पाएगा? सत्य के इस पथ से तुझको कौन हटा पाएगा? ना एक बाल बाँका होगा—जब इरादा प्रखर रहेगा, हर बंधन खुद टूटेगा—जब साहस अमर रहेगा। जो सत्ता के मद में अ...