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आदर्श कार्य-संस्कृति : उत्पादकता, विकास और संतुलित जीवन की समन्वित व्यवस्था

किसी भी राष्ट्र, संगठन या उद्योग की वास्तविक शक्ति केवल उसकी पूँजी या मशीनें नहीं होतीं, बल्कि उसकी कार्य-संस्कृति (Work Culture) होती है। कार्य-संस्कृति ही तय करती है कि वहाँ काम करने वाले लोग केवल नौकरी कर रहे हैं या किसी बड़े उद्देश्य का हिस्सा हैं। जब कार्य-संस्कृति में अनुशासन, संवेदनशीलता, समानता, उत्पादकता और मानवीय मूल्यों का संतुलन होता है, तभी संगठन दीर्घकालीन विकास की ओर बढ़ता है। आज के युग में जहाँ तकनीक तेज़ी से बदल रही है, वहीं जीवन की गति भी अत्यधिक तीव्र हो गई है। ऐसे में उत्पादकता (Productivity) और Work-Life Balance के बीच संतुलन बनाना अत्यंत आवश्यक है। विशेष रूप से महिलाओं और पुरुषों की भूमिकाओं को ध्यान में रखते हुए एक ऐसी आदर्श पद्धति विकसित करनी होगी, जो न्यायपूर्ण, व्यावहारिक और संवेदनशील हो। 1. कार्य-संस्कृति का मूल दर्शन आदर्श कार्य-संस्कृति का आधार निम्न पाँच स्तंभों पर होना चाहिए: - कर्तव्यबोध और अनुशासन - सम्मान और समान अवसर - मानवीय संवेदना - उत्पादकता और गुणवत्ता -जीवन संतुलन और परिवार का सम्मान कार्य-संस्कृति केवल नियमों से नहीं बनती; वह नेतृत्व के आचरण से...

एक-एक बूंद का जीवन-दर्शन

प्रस्तावना : सूक्ष्म ही मूल है संसार में जो कुछ भी विराट दिखाई देता है, उसका आरंभ अदृश्य और सूक्ष्म होता है। बीज धरती में दबा होता है, पर उसी में वटवृक्ष छिपा रहता है। विचार दिखाई नहीं देता, पर वही सभ्यताओं को जन्म देता है। सागर बूंदों से बनता है। पर्वत कणों से बनते हैं। और चरित्र — क्षण-क्षण के निर्णयों से बनता है। मनुष्य की भूल यही है कि वह परिणाम चाहता है, प्रक्रिया नहीं; वह ऊँचाई चाहता है, पर सीढ़ियाँ नहीं चढ़ना चाहता। संसार का हर महान परिवर्तन किसी विशाल विस्फोट से नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म बिंदु से आरंभ होता है। सागर बूंदों से बनता है, पर्वत कणों से बनते हैं, और चरित्र छोटे-छोटे कर्मों से बनता है। मनुष्य अक्सर बड़े अवसर, बड़े साधन और बड़े मंच की प्रतीक्षा करता है; परंतु जीवन का सत्य यह है कि बड़ा कभी अचानक नहीं बनता — वह बूंद-बूंद संचय से बनता है। पर जीवन का अटल नियम है — बड़ा कभी अचानक नहीं बनता; वह निरंतर संचय से बनता है। 1️⃣ सृजन का सिद्धांत : संभावना की परिपक्वता जब वर्षा की एक बूंद सीप में गिरती है, वही मोती बन जाती है। पर वही बूंद यदि पत्थर पर गिरे, तो केवल सूख जाती है। इसका अ...

एक बूंद

🌊 (१) सृजन का प्रारंभ १ बूंद गिरी जब सीप में, बनती निर्मल मोत। लघु कण पाता मान तब, जग में अमरित ज्योत॥ २ बूंद जली प्यासे अधर, जागे जीवन-श्वास। सूखा वन हरषाय फिर, फूटे नव विश्वास॥ ३ एक किरन तम हर सके, खोल प्रकाश-द्वार। नन्हा दीपक जीत ले, घनघोर अंधकार॥ ४ स्याही की इक बूंद से, लिखे समय इतिहास। अंतिम पन्ना बोल उठे, जीवन का प्रकाश॥ ५ रक्त-बिंदु दानार्थ जब, बहता पावन भाव। मृतप्राय देहों में जगे, नव जीवन की छाव॥ ६ शक्ति-बिंदु नारी धरे, बनती जग की माँ। ममता से पोषित करे, धरती और गगन॥ ७ रुपया एक लगन से, पूरा करे संकल्प। बूंद-बूंद से पर्वत ढहे, मिटे कठिन विकल्प॥ 📖 (२) ग्रंथ-साक्षी – इतिहास का प्रमाण ८ मानस में इक नाम से, पत्थर तरि गए तात। राम-नाम की बूंद से, मिटे भवसिंधु-त्रात॥ ९ गीता का इक श्लोक जब, उतरा अर्जुन-प्राण। संशय-बूंद विलीन हुई, जागा दिव्य विधान॥ १० कुरु सभा में एक छल, पासे की वह चाल। शकुनि बुद्धि की बूंद से, जल उठा महाभार॥ ११ एक स्मित माधव का, बदला रण का रूप। श्रीकृष्ण नीति की इक रेख से, जीता धर्म-स्वरूप॥ १२ श्रद्धा की इक बूंद से, पूजित हो भगवान। भगवान शंकर प्रसन्न तब हो उठें, दें ...

सुनो, सीखो, लिखो और जियो : ज्ञान को जीवन में उतारने की साधना

प्रस्तावना : ज्ञान का संग्रह नहीं, ज्ञान का संस्कार मनुष्य का जीवन केवल समय बिताने के लिए नहीं है; यह आत्म-विकास, आत्म-निर्माण और आत्म-उत्कर्ष की यात्रा है। हम प्रतिदिन अनेक बातें सुनते हैं, अनेक दृश्य देखते हैं और अनेक अनुभवों से सीखते हैं। संसार एक विशाल विश्वविद्यालय है और हर दिन उसका नया पाठ है। किन्तु प्रश्न यह है कि— क्या हम उस पाठ को केवल सुनकर आगे बढ़ जाते हैं? क्या हम उस प्रेरणा को केवल उस क्षण तक सीमित रख देते हैं? सच्चाई यह है कि जो ज्ञान जीवन में उतरता नहीं, वह धीरे-धीरे स्मृति से मिट जाता है। इसलिए आवश्यक है कि जो भी अच्छा सुनें, अच्छा देखें, अच्छा सीखें—उसे केवल मन में न रखें, बल्कि उसे लिखें, पढ़ें और जिएँ। अच्छा सुनना : विवेकपूर्ण श्रवण की कला सुनना एक साधना है। कानों से सुनना सरल है, पर हृदय से सुनना दुर्लभ है। आज सूचना का विस्फोट है। हर क्षण मोबाइल, समाचार, सोशल मीडिया और चर्चाएँ हमारे सामने हैं। परंतु हर बात ज्ञान नहीं होती। इसलिए पहला चरण है—विवेकपूर्ण चयन। जो बातें हमारे चरित्र को ऊँचा उठाएँ, जो प्रेरणा दें, जो जीवन को दिशा दें—उन्हें ग्रहण करें। अच्छे प्रवचन, प्रे...

🇮🇳 भारत-जननी राष्ट्र-वन्दना. (समूहगानार्थ संस्कृत-रूप)

🇮🇳 जयतु जयतु भारतम् 🇮🇳 🌺 मंगलाचरण (सर्वे मिलित्वा) वन्दे भारत-जननीम्। वन्दे जीवन-आधारम्॥ त्वमेव माता नः नित्यं, त्वमेव प्राण-धारिणी॥ जयतु जयतु भारतम्। जयतु संस्कृतिधारिणी॥ 🌄 प्रथम स्तोत्रम् — स्वरूप-वर्णनम् हिमालयः ते शिरोभूषणम्, सिन्धुः पादप्रक्षालकः। गङ्गा-यमुना ते नाड्यौ, जनजीवन-प्रदीपिके॥ नानाधर्म-समन्विता, नानाभाषा-विभूषिता। एकत्व-सूत्रे बद्धा त्वं, विश्वमङ्गल-कारिणी॥ (कोरस) 🌾 द्वितीय स्तोत्रम् — जीवनाधारत्वम् त्वत्क्षेत्रेषु सस्य-शोभा, त्वत्पवनः जीवनप्रदः। त्वन्मृदा गन्ध-पूर्णा नः, हृदये सदा वसति॥ कृषक-श्रम-समन्विता, विज्ञान-विकास-युक्ता। वाणिज्य-विद्या-संपन्ना, कलासंगीत-रञ्जिता॥ (कोरस) 🇮🇳 तृतीय स्तोत्रम् — तिरङ्ग-गौरवम्के सरिया त्याग-दीप्तिः, श्वेतः शान्ति-प्रकाशकः। हरितः समृद्धि-सूचकः, चक्रं धर्मस्य चिन्हकम्॥ उन्नतं ध्वजम् अस्माकं, आकाशे नित्यं विराजते। तेजसा तस्य प्रेरिताः, राष्ट्रसेवां कुर्महे॥ (कोरस ऊर्ध्वस्वरे) 🕯 चतुर्थ स्तोत्रम् — शहीद-स्मरणम् येषां रक्तं भूमौ पतितम्, स्वाधीनतायै समर्पितम्। ते वीराः अमराः सन्ति, राष्ट्रदीपाः दिवाकराः॥ न विस्मरामः तेषां त्यागम्, न...

हर दिन नया है, हर दिन अंतिम है

हर दिन नया है, हर दिन अंतिम है, जीवन क्षण-क्षण में संपूर्ण है। जो आज मिला है श्वास तुम्हें, वही प्रभु का सबसे बड़ा वरण है। मत टालो सपनों को कल पर, कल केवल एक कल्पना है, जो करना है, अभी कर डालो, यही समय की सच्ची साधना है। यदि आज अंतिम संध्या होती, क्या तुम यूँ ही मौन खड़े रहते? या साहस की ज्वाला बनकर अपने भीतर के पर्वत चढ़ते? समय न रुकता राजाओं पर, न साधारण जन पर ठहरता है, जो जाग गया इस क्षण में, वही अमर पथ पर चलता है। क्रोध त्यागो, अहंकार मिटाओ, प्रेम को अपना अस्त्र बनाओ, यदि अंतिम दिन समझ सको तो हर रिश्ते को गले लगाओ। एक प्रतिशत भी जीत की आशा हो, तो सौ प्रतिशत पुरुषार्थ करो, भाग्य नहीं, परिश्रम लिखता है, अपने कर्मों से इतिहास रचो। हर प्रभात नया अवसर है, हर साँझ आत्ममंथन है, जो हर दिन को अंतिम जी ले, वही सच्चा जीवन धन है। यदि आज ही अंतिम अवसर हो, तो क्या तुम डरकर जी पाओगे? या मुस्काकर संसार को अपना श्रेष्ठ देकर जाओगे? चलो ऐसे जियो कि हर क्षण में उद्देश्य की अग्नि प्रखर रहे, यदि मृत्यु भी आ जाए सम्मुख, तो भी मन निर्भय और निखर रहे। हर दिन नया है, हर दिन अंतिम है— इसे केवल शब्द न रहने दो,...

मानवता ही सच्चा धर्म

गौ की ममता का मान रखो, गाँवों की पहचान रखो, गंगा की पावन धारा में भारत की शान रखो। यह भूमि ऋषियों की तपोभूमि, यह त्याग-तपस्या का मर्म, सुन लो जग के मानवों — मानवता ही सच्चा धर्म। मंदिर की घंटी गूँजे तो मन भी पावन होना चाहिए, केवल शब्दों से नहीं, जीवन से धर्म होना चाहिए। कर्तव्य-पथ पर जो अडिग रहे, वही सच्चा वीर, लोभ-मोह की ज्वाला बुझाकर बने युगों का धीर। जब-जब मन में अहंकार का अंधकार छा जाता है, मानव अपने ही हाथों से अपना घर जला जाता है। जागो! भीतर दीप जलाओ, सत्य-अहिंसा धारण करो, नैतिकता की ढाल उठाकर अन्यायों का हरण करो। नशे की बेड़ी तोड़ो अब, चेतना को मुक्त करो, अपने जीवन को उज्ज्वल कर भारत को भी युक्त करो। सद्भावों की शीतल छाया हर हृदय में फैलाओ, भाईचारे की पावन गंगा घर-घर तक ले जाओ। अणुव्रत का यह दिव्य संदेश — छोटा-सा संकल्प उठाओ, पहले खुद को जीत लो फिर जग को जीत दिखाओ। चरित्र-निर्माण की नींव रखो, बनो समय की आवाज़, सत्य, संयम, सेवा से लिख दो भारत का नया इतिहास। गौ बचेगी तो करुणा बचेगी, गाँव बचेंगे तो देश बचेगा, गंगा बहेगी निर्मल जब, तब ही भारत विशेष बचेगा। मानवता का दीप जला दो हर अंत...