संदेश

No- 369. उनकी मर्ज़ी के बिना

कौन कहता है हम चलते हैं, वो ही कदम बढ़ाते हैं। हम तो केवल राह के राही, वो मंज़िल तक ले जाते हैं। हवा चले तो उनकी इच्छा, पत्ता डोले उनकी मर्ज़ी। सूरज निकले उनकी आज्ञा, चाँद खिले तो उनकी मर्ज़ी। उनकी मर्ज़ी के बिना, एक पत्ता भी नहीं हिलता। उनकी कृपा जहाँ पड़ जाए, सूखा मन भी फूल सा खिलता। बीज पड़ा हो गहरी मिट्टी में, उसमें जीवन कौन जगाता? बूँद गिरे जब सूखी धरती पर, कौन उसे हरियाली बनाता? फूल खिले तो रंग उन्हीं का, खुशबू भी उनकी देन है। पंछी के स्वर में जो संगीत, वह भी उनकी धुन है। नदिया बहती अपनी धुन में, पर सागर तक कौन पहुँचाता? दीपक जलता तेल से लेकिन, उसमें प्रकाश कौन भर जाता? हमने समझा—मैंने किया है, मैंने अपना भाग्य बनाया। पीछे देखा तो समझ आया, हर पल उसने हाथ बढ़ाया। कभी राह में फूल बिछाए, कभी काँटे दे डाले। कभी हमें ऊँचाई दी, कभी गिरने के दिन निकाले। हमने जिसको हार समझा था, वही नई शुरुआत बनी। जिस दरवाज़े को बंद समझा, वहीं दूसरी राह खुली। जिस सपने को टूटता देखा, शायद उसमें भलाई थी। जिस चीज़ के लिए रोए हम, उसमें उसकी कोई गहराई थी। हम आज को ही दे...

No- 368. ऐसा बनो

ऐसा बनो कि जीवन तुम्हारा, एक प्रार्थना बन जाए। तुम्हें देखकर जग मुस्काए, तुम्हें देखकर प्रभु रीझ जाए। न नाम की कोई चाह रहे, न यश का कोई भार रहे। जो मिला उसे बाँट सको तुम, मन में केवल प्यार रहे। ऐसा बनो, ऐसा बनो, कि मन निर्मल हो जाए। दुनिया चाहे देर से समझे, ईश्वर तुरंत समझ जाए। जब राहों में अँधियारा हो, तुम दीपक बनकर जल जाना। जब कोई अपना टूट रहा हो, चुपके से उसका बल बन जाना। जिसके हिस्से धूप ही आई, उसको थोड़ी छाँव दे देना। जिसने जीवन हार दिया हो, उसको फिर से गाँव दे देना। जिसकी आँखें नम दिख जाएँ, उनमें सपनों का रंग भरो। जिसके पाँव थककर रुक जाएँ, उसकी राह में संग चलो। मंदिर में जाकर शीश झुकाना, अच्छा है—पर इतना करना, जिसे प्रभु ने भेजा जग में, उस इंसान का मान भी करना। सत्य कठिन हो, सत्य चुनो तुम, लाभ मिले तो लोभ न करना। भीड़ गलत दिशा में जाए, तब भी अपना धर्म न बदलना। कोई देखे या न देखे, अपने कर्म सँवारते रहना। दुनिया से छिप सकता है इंसान, अपने भीतर से क्या छिपना? जब कोई न हो पास तुम्हारे, तब भी सच्चे बने रहो। ईश्वर हर पल देख रहा है, अपने मन से सच्...

No- 367. मृत्यु अंत नहीं, अगले पड़ाव की शुरुआत है

मृत्यु अंत नहीं, अगले पड़ाव की शुरुआत है, यह प्रकृति का सनातन सत्य, ईश्वर की सौगात है। जो जन्मा है, वह एक दिन अवश्य विदा होगा, अपने कर्मों का लेखा लेकर आगे बढ़ा होगा। यह शरीर तो पंचतत्त्व का एक सुंदर आवरण है, आत्मा अनंत, अजर-अमर, परमात्मा का ही कण है। वस्त्र बदलने जैसा केवल तन का परिवर्तन होता है, जीवन का दीपक बुझता नहीं, बस नया सवेरा होता है। कल जो अपना था, आज स्मृति बनकर मुस्काता है, हर बिछड़ना हमें जीवन का अर्थ समझाता है। रोना स्वाभाविक है, आँसू भी श्रद्धा बन जाते हैं, पर अति शोक के अंधियारे में सत्य कहीं खो जाते हैं। जो चला गया, वह समाप्त नहीं, बस आँखों से ओझल हुआ है। समय के इस विराट प्रवाह में, वह अगले सफ़र पर निकला है। जीवन एक अवसर है—प्रेम का, सेवा का, त्याग का, हर पल सद्कर्म करने का, मानवता के अनुराग का। धन, वैभव, पद और प्रतिष्ठा यहीं धरे रह जाते हैं, साथ हमारे केवल अच्छे कर्म ही आगे जाते हैं। इसलिए ऐसा जीवन जियो कि मृत्यु भी मुस्काए, तुम्हारे सत्कर्मों की सुगंध युगों-युगों तक फैल जाए। जब अंतिम क्षण का दीप जले, भय मन में न आने पाए, विश्वास रहे—यह अंत नही...

No- 366. जीवन एक रणभूमि है

जीवन एक रणभूमि है, तुमको बनना होगा वीर। सत्य बने संकल्प तुम्हारा, कर्म बने शमशीर।। हर प्रभात रणभेरी बजती, हर पल नई पुकार, संघर्षों की अग्नि में तपकर, होता जीवन साकार। धूप तपाए, आँधी गरजे, वर्षा बरसाए तीर, अटल हिमालय-सा जो डट जाए, वही सच्चा रणवीर।। राह कठिन हो, पाँव लहूलुहान हों, फिर भी मत रुकना, अँधियारे के बीच खड़े होकर, दीपक बनकर जलना। गिरना यदि जीवन की रीति है, उठना वीरों का धर्म, जो हर हार से सीख लेता, वही रचता नव कर्म।। सबसे बड़ा समर जगत में, अपने मन से होता, लोभ, मोह, भय, क्रोध हराकर, मानव ऊँचा होता। जिसने अपने मन को जीता, जीत लिया संसार, उसके चरणों में झुक जाता, यश, वैभव, सत्कार।। नदी नहीं पूछे पथ कैसा, बहना उसका काम, सूरज कभी नहीं थकता है, देना उसका दान। वटवृक्षों ने आँधी झेली, तब पाया सम्मान, प्रकृति सिखाती है हर पल—संघर्षों का ज्ञान।। धन, दौलत, पद, मान, प्रतिष्ठा, सब रह जाएँ यहीं, साथ चलें बस पुण्य कर्म, और चरित्र की रोशनी। सेवा जिसकी साधना हो, सत्य जिसका प्राण, ऐसे मानव के जीवन से, जग पाता सम्मान।। यह जीवन केवल अपना नहीं, युग का है उपहार, रोते चेहरे ...

No- 365. कारगिल विजय दिवस

"हिमालय का रक्त अभी जीवित है" नमन नहीं— आज रणवीरों का वंदन होगा। आज शब्द नहीं, राष्ट्र-आत्मा का स्पंदन होगा। पूछो मत हिमगिरि की चोटी से, कितने वज्र प्रहार सहे, कितनी बार हिमशिला पिघली, जब वीरों के उर विदीर्ण रहे। पर झुकना भारत ने जाना कब? यह इतिहास बताता है, जब-जब संकट घिरकर आया, भारत सिंह बन जाता है। द्रास की घाटी आज भी अपने वीरों का जयगान करे, टाइगर हिल का प्रत्येक शिखर रणभेरी का अभियान भरे। बटालिक की चट्टानों पर अब भी वह हुंकार लिखी है— "भारत की सीमा पर पहले, मृत्यु खड़ी है, फिर सैनिक है।" जिस रातों में पर्वत काँपे, नभ का साहस टूट गया, जिस क्षण अग्नि उगलती तोपों से धरती का विश्वास डिगा; उस क्षण भारत का एक जवान, वज्र-सा अडिग खड़ा बोला— "प्राण रहें या प्राण न रहें, तिरंगा किंचित् नहीं डोला।" न तलवारों ने विजय लिखी, न केवल अस्त्रों की ज्वाला ने; भारत जीता उस क्षण, जब माँ ने पुत्र कहा— "जा बेटा! यदि लौटे तो आलिंगन दूँगी, यदि न लौटे तो तुझ पर भारत को अर्पण कर दूँगी।" धन्य वह जननी, जिसने आँसू पीकर मुस्कान सजाई। धन्य वह पत्न...

No-364. "धीरे चलना स्वीकार है"

धीरे चलना स्वीकार है, लेकिन रुकना स्वीकार नहीं। मंज़िल चाहे दूर खड़ी हो, सपनों से इंकार नहीं। पहले नींव को मजबूत करेंगे, फिर ऊँची दीवार उठाएँगे। एक-एक ईंट जोड़कर हम, नया भविष्य गढ़ जाएँगे। बीज धरा में धैर्य धरता, तब बनकर वटवृक्ष खिलता है। जो हर दिन थोड़ा आगे बढ़ता, वही शिखरों तक मिलता है। आज नहीं तो कल होगा, हर श्रम अपना फल होगा। छोटा कदम भी व्यर्थ नहीं, यही सफलता का पल होगा। ज्ञान हमारा दीप बनेगा, सेवा जीवन का गीत बनेगा। सत्य, श्रम और अनुशासन से, भारत फिर से श्रेष्ठ बनेगा। ना जल्दबाज़ी, ना घबराहट, ना हारों से कोई डर। धीरे-धीरे बढ़ते जाना, यही विजेता का है सफ़र। पहले नींव, फिर संरचना, फिर विस्तार की होगी उड़ान। इसी क्रम से बनता है, हर युग का स्वर्णिम अभियान। चलो आज बस एक कदम लें, कल उससे आगे बढ़ जाएँ। हर दिन एक नई ईंट रखकर, सपनों का भारत गढ़ जाएँ। समापन धीरे चलना स्वीकार है, लेकिन रुकना स्वीकार नहीं। पहले नींव, फिर संरचना, फिर विस्तार—यही सही। यही हमारा पथ बने, यही हमारा धर्म बने। हर दिन एक छोटा प्रयास, एक दिन भारत का उत्कर्ष बने।

No - 363. सुखांत जीवन

कौन कहे—सुख अंत में होगा? कौन कहे—कल आएगा? आज जिया जो सत्य, वही तो जीवन का फल पाएगा। पग-पग पर जो स्वयं सँवरे, वही जग को सँवार सके। अपने मन का दीप जलाकर, अंधकार भी हार सके। पहला दीप—जीवनशैली। भोर जगे तो मन भी जागे, श्रम से हर दिन हो आरंभ। सादा भोजन, निर्मल चिंतन— यही स्वास्थ्य का सच्चा स्तंभ। दूसरा दीप—दृष्टिकोण। नारी केवल रूप नहीं है, जीवन की आधारशिला। जिसने उसका मान रखा है, उसने पाया सत्य मिला। हर मानव में अपना अंश है, क्यों फिर वैर-विरोध करें? प्रेम जहाँ व्यवहार बन जाए, वहीं सच्चे उत्सव भरें। तीसरा दीप—अनुशासन। मन तो चंचल पवन समान, हर क्षण दिशा बदलता है। जो अपने ही मन को साधे, वह पर्वत-सा अटल रहता है। समय न रुकता, काल न झुकता, क्षण-क्षण जीवन ढलता है। जो हर पल का मान समझ ले, वह अमरत्व को छूता है। चौथा दीप—अच्छी आदत। बूँद-बूँद से घट भरता है, कण-कण बनता पर्वत है। रोज़ किया जो शुभ अभ्यास, वही मनुष्य का व्यक्तित्व है। सत्य वचन, सेवा का संकल्प, सीखने की हर दिन प्यास। यही आदतें भाग्य लिखेंगी, यही जीवन का विश्वास। समापन चारों दीप जहाँ जलते हैं, वहा...