संकल्प से सिद्धि तक : अनुशासन और निरंतरता
भूमिका : संकल्प क्यों आवश्यक है? मनुष्य केवल जीवित रहने के लिए जन्म नहीं लेता, वह कुछ करने, कुछ बनने और कुछ बदलने के लिए जन्म लेता है। जीवन की यात्रा में हर व्यक्ति के भीतर कोई न कोई सपना अवश्य होता है— कोई समाज सुधारना चाहता है, कोई व्यवसाय खड़ा करना चाहता है, कोई राष्ट्रसेवा करना चाहता है, कोई परिवार को बेहतर जीवन देना चाहता है। परंतु केवल इच्छा या सपना पर्याप्त नहीं होता। इच्छा को संकल्प में और संकल्प को सिद्धि में बदलने के लिए आंतरिक शक्ति चाहिए। आज के युग में लोग शीघ्र परिणाम चाहते हैं। वे तुरंत सफलता, तुरंत प्रसिद्धि और तुरंत उपलब्धि की अपेक्षा रखते हैं। जब परिणाम देर से मिलता है, तो उत्साह कम हो जाता है। यहीं से असफलता आरंभ होती है। सत्य यह है कि संकल्प तभी सिद्ध होता है जब उसके साथ अनुशासन और निरंतरता जुड़ी हो। इतिहास, धर्मग्रंथ, विज्ञान, खेल और व्यवसाय — हर क्षेत्र में सफलता का यही सूत्र रहा है। भगवद्गीता में कर्मयोग का संदेश स्पष्ट है — कर्तव्य का पालन स्थिर मन और संयम के साथ करो। यही अनुशासन है। और जब वही कर्म बिना रुके, बिना थके, वर्षों तक किया जाए — वही निरंतरता है। पहला स...