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No- 387 विरासत का सवाल: पूर्वजों से हमने क्या पाया, अगली पीढ़ी को क्या देंगे?

लेखक: राकेश मिश्रा हम अपने पूर्वजों के बारे में जानना चाहते हैं—वे कौन थे, कहाँ से आए, उनका जीवन कैसा था, उन्होंने किन परिस्थितियों में संघर्ष किया और हमारे परिवार तथा समाज के लिए क्या छोड़कर गए। अपनी जड़ों को जानना केवल अतीत को जानना नहीं है। यह अपनी पहचान, अपने संस्कार और अपनी सामाजिक यात्रा को समझने का माध्यम भी है। लेकिन क्या केवल अपनी जड़ों को जान लेना पर्याप्त है? शायद नहीं। इसके साथ एक और बड़ा सवाल खड़ा होता है— “हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए क्या छोड़ा, यह जानना जरूरी है। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल है—हम आने वाली पीढ़ी के लिए क्या छोड़कर जाएंगे?” यही प्रश्न विरासत के वास्तविक अर्थ को समझने की शुरुआत करता है। विरासत केवल संपत्ति का नाम नहीं विरासत की बात होते ही हमारे सामने जमीन, मकान, व्यवसाय, धन और दूसरी भौतिक संपत्तियों की तस्वीर उभरती है। निस्संदेह ये भी विरासत का हिस्सा हैं, लेकिन मनुष्य की सबसे स्थायी विरासत अक्सर दिखाई नहीं देती। एक परिवार अपने बच्चों को केवल घर नहीं देता, वह संस्कार और जीवन के अनुभव भी देता है। एक शिक्षक केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाता, वह सोचने और प्र...

No- 386. ₹20,000 से शुरू हुई वह कहानी, जिसने Emami को बनाया

आर.एस. अग्रवाल की उद्यमिता, दोस्ती और अवसर पहचानने की कहानी ✍️ राकेश मिश्र कभी-कभी किसी बड़े कारोबारी साम्राज्य की कहानी पढ़ते हुए मेरी नजर उसके वर्तमान आकार पर नहीं, बल्कि उसकी शुरुआत पर ठहर जाती है। सोचिए—एक तरफ सुरक्षित नौकरी, दूसरी तरफ अपना कारोबार शुरू करने का अनिश्चित रास्ता। एक तरफ सीमित संसाधन, दूसरी तरफ बड़ा सपना। और पूंजी? सिर्फ ₹20,000 के आसपास। यहीं से शुरू होती है राधेश्याम अग्रवाल , यानी आर.एस. अग्रवाल, और उनके बचपन के मित्र आर.एस. गोयनका की कहानी। आज Emami भारत के चर्चित कारोबारी समूहों में शामिल है। लेकिन इस कहानी को समझने के लिए हमें आज से लगभग पाँच दशक पीछे, 1974 के कोलकाता में जाना होगा। दो दोस्तों का एक सपना आर.एस. अग्रवाल का जन्म 18 फरवरी 1946 को कोलकाता में हुआ। उनका परिवार राजस्थान के बीकानेर से जुड़ा हुआ था। शिक्षा को उन्होंने गंभीरता से लिया। St. Xavier's College, Kolkata से पढ़ाई के बाद उन्होंने वाणिज्य और कानून की शिक्षा प्राप्त की और Chartered Accountant तथा Company Secretary की पेशेवर योग्यता हासिल की। उनके बचपन के मित्र थे आर.एस. गोयनका। द...

No- 385. जीवन-पथ — शेर और शायरी

1.कर्म से बनती है पहचान, हुनर से निखरता है इंसान, वक़्त चाहे जितना आज़माए, हौसला रखता है इंसान। 2. ठोकरों ने जो सिखाया, वो किताबों में कहाँ, गिरके जो फिर उठ खड़ा हो, असली फ़न है बस वहाँ। 3. मुश्किलों से भागकर कोई मुकाम हासिल नहीं होता, जिसे चलना आता है, उसका सफ़र कभी बेकार नहीं होता। 4. हार को हार मत समझो, ये भी एक पैग़ाम है, जहाँ राह बदलनी पड़े, वहीं से नया मुकाम है। 5. फ़ैसले मुश्किल सही, लेकिन सफ़र रोकते नहीं, जो अपने फ़ैसलों पर टिके रहें, वो कभी झुकते नहीं। 6. वक़्त ने जब आईना दिखाया, अपनी औक़ात समझ आई, सफलता ने जब सिर उठाया, ज़िम्मेदारी साथ आई। 7. धन से घर सज सकता है, जीवन नहीं सँवरता, जब तक उसमें रिश्तों का उजाला नहीं उतरता। 8. रिश्ते मतलब से नहीं, एहसास से निभाए जाते हैं, मुश्किल वक़्त में जो साथ रहें, वही अपने कहलाते हैं। 9. परिवार सिर्फ़ छत नहीं, एक संस्कारों की ज़मीन है, जहाँ जड़ें मज़बूत हों, वहीं उड़ान हसीन है। 10. धर्म अगर माथे की रेखा है, तो कर्म उसकी पहचान, पूजा से पहले आचरण देखता है भगवान। 11. इबादत सिर्फ़ सजदे में हो, ये ज़रूरी तो नहीं, ...

No- 383. जीवन-पथ

कर्म मनुज को ऊँचा करता, अनुशासन देता आधार, सीख निरंतर साथ रहे तो निखर उठे जीवन-व्यवहार। संघर्षों से धैर्य मिलता, ठोकर देती नई समझ, हार कभी अंतिम नहीं होती, वहीं से मिलती नई राह। निर्णय लेकर बढ़ना सीखो, भय को मन से दूर करो, अपने बल पर खड़े रहो और अपने श्रम पर गर्व करो। समय सिखाता सीमा अपनी, सफलता दे उत्तरदायित्व, धन जीवन का साधन भर है, उससे बड़ा मनुष्य का मूल्य। धर्म वही जो कर्म में उतरे, वाणी में ही धर्म न हो, सेवा वह जो काम किसी के, केवल अपना यश न हो। संबंधों की डोर सँभालो, विश्वासों का मान करो, परिवार मिले तो केवल सुख नहीं—संस्कार भरो। जीवन में जो लोग मिलें, सब कुछ देकर जाते हैं— कोई धैर्य, कोई विश्वास, कोई निर्णय सिखलाते हैं। कोई कठिन घड़ी में आकर जीवन का अर्थ समझाता है, कोई छोटी-सी जिम्मेदारी से मन को बड़ा बनाता है। सफलता जब द्वार खटखटाए, मन में विनय बनाए रखना, जितना ऊँचा उठते जाओ, उतना धरती से जुड़े रहना। कभी ठहरकर स्वयं से पूछो— क्या रिश्तों का मान रखा? क्या परिवार को साथ लेकर जीवन का हर पथ पार किया? क्या विपदा में धैर्य बचा था? क्या सुख ...

No- 382. घर और बाहर

दुनिया जीतते-जीतते कहीं अपना घर तो नहीं हार रहे? एक ऐसा सवाल, जिसका जवाब शायद हमें अपने भीतर तलाशना चाहिए मैं यह लेख किसी को समझाने के लिए नहीं लिख रहा हूँ। न किसी परिवार को आदर्श बताने के लिए, न किसी परिवार को गलत साबित करने के लिए। मैं यह लेख इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि पिछले कुछ समय से मेरे मन में एक सवाल बार-बार उठता है— हम अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए आखिर क्या-क्या कर रहे हैं, और उस बेहतर जीवन को जीने के लिए हमारे पास बच क्या रहा है? हम पढ़ रहे हैं। कमाई बढ़ा रहे हैं। नौकरी बदल रहे हैं। व्यवसाय कर रहे हैं। शहर बदल रहे हैं। बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। घर खरीद रहे हैं। गाड़ी खरीद रहे हैं। SIP कर रहे हैं। Insurance ले रहे हैं। Retirement Planning कर रहे हैं। बच्चों के भविष्य के लिए पैसा जोड़ रहे हैं। दुनिया घूम रहे हैं। अपने लिए एक बेहतर जीवन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इनमें से कुछ भी गलत नहीं है। बल्कि यह सब जरूरी है। लेकिन इसी दौड़ के बीच कभी-कभी मन पूछता है— जिस जीवन को बेहतर बनाने के लिए हम इतनी मेहनत कर रहे हैं, क्या उस जीवन में हमारे अपने...

No- 381. घर कब घर नहीं रहता?

जब बाहर की दुनिया अच्छी और अपने लोग अजनबी लगने लगते हैं मैं इस प्रश्न का उत्तर किसी सिद्धांत से नहीं देना चाहता। न समाजशास्त्र की किताब से, न मनोविज्ञान की किसी परिभाषा से, न किसी उपदेश से। मैं इसे जीवन के उन छोटे-छोटे दृश्यों में देखना चाहता हूं, जिनके बीच हम रोज जीते हैं, लेकिन जिनका अर्थ बहुत देर से समझ में आता है। एक बच्चा अपने पिता की उंगली पकड़कर बाजार जाता है। वह किसी चीज के लिए जिद करता है। पिता अपनी जेब टटोलता है। बच्चे की इच्छा पूरी करने लायक पैसे नहीं हैं। लेकिन पिता बच्चे को यह महसूस नहीं होने देता कि उसके पास पैसे कम हैं। वह कोई दूसरा रास्ता निकालता है। बच्चा खुश हो जाता है। घर लौटकर मां को बताता है— “पापा ने मुझे यह खिलाया था। बहुत अच्छा था।” मां पति की जेब जानती है। वह समझती है कि उस दिन क्या हुआ था। लेकिन वह भी उस छोटी-सी खुशी को टूटने नहीं देती। तीनों अपनी-अपनी जगह उस घटना को जीते हैं। किसी ने गरीबी का नाम नहीं लिया। किसी ने त्याग का हिसाब नहीं रखा। किसी ने यह नहीं कहा— “मैंने तुम्हारे लिए इतना किया।” फिर भी उस दिन परिवार थोड़ा और जुड़ गया। यही...

No- 380. राकेश मिश्रा — 100 शायरियाँ

जिंदगी, रिश्ते, संघर्ष, प्रेम, स्वाभिमान और इंसानियत के रंग 1. सफर चल पड़ा हूँ तो रास्ते खुद बनेंगे, आज काँटे हैं तो कल फूल भी खिलेंगे। मंज़िल की चिंता नहीं, कदमों पर भरोसा है, जो मेरे साथ चले, वही मेरा कारवाँ है। 2. संघर्ष धूप ने पूछा—कितना और जलोगे? मैंने हँसकर कहा—जब तक निखर न जाऊँ। मुश्किलों ने पूछा—कब तक लड़ोगे? मैंने कहा—जब तक खुद से न जीत जाऊँ। 3. वक्त वक्त ने बड़ी खामोशी से सबक सिखाया, जिसे अपना समझा, उसका असली चेहरा दिखाया। कुछ रिश्ते टूटे तो कुछ मजबूत हुए, हम भी कल से थोड़ा ज्यादा समझदार हुए। 4. ठोकर ठोकर लगी तो रास्ता बदलने की सोची, फिर देखा—मंज़िल तो सामने ही खड़ी थी। बस नजर में थोड़ा धैर्य कम था, और कदमों में थोड़ा भरोसा कम था। 5. हौसला आंधियाँ आईं तो दीये को हाथों में ले लिया, रात लंबी थी तो खुद को संभाल लिया। किसी से रोशनी माँगने की आदत नहीं थी, सो अपने भीतर ही एक सूरज पाल लिया। 6. स्वाभिमान झुकना सीखा है मैंने रिश्तों के सम्मान में, मगर बिकना नहीं सीखा किसी के अभिमान में। जो देना हो इज्जत से दो, स्वीकार कर लूँगा, पर अपनी आत्मा का सौदा कभी ...