संदेश

सुनो, सीखो, लिखो और जियो : ज्ञान को जीवन में उतारने की साधना

प्रस्तावना : ज्ञान का संग्रह नहीं, ज्ञान का संस्कार मनुष्य का जीवन केवल समय बिताने के लिए नहीं है; यह आत्म-विकास, आत्म-निर्माण और आत्म-उत्कर्ष की यात्रा है। हम प्रतिदिन अनेक बातें सुनते हैं, अनेक दृश्य देखते हैं और अनेक अनुभवों से सीखते हैं। संसार एक विशाल विश्वविद्यालय है और हर दिन उसका नया पाठ है। किन्तु प्रश्न यह है कि— क्या हम उस पाठ को केवल सुनकर आगे बढ़ जाते हैं? क्या हम उस प्रेरणा को केवल उस क्षण तक सीमित रख देते हैं? सच्चाई यह है कि जो ज्ञान जीवन में उतरता नहीं, वह धीरे-धीरे स्मृति से मिट जाता है। इसलिए आवश्यक है कि जो भी अच्छा सुनें, अच्छा देखें, अच्छा सीखें—उसे केवल मन में न रखें, बल्कि उसे लिखें, पढ़ें और जिएँ। अच्छा सुनना : विवेकपूर्ण श्रवण की कला सुनना एक साधना है। कानों से सुनना सरल है, पर हृदय से सुनना दुर्लभ है। आज सूचना का विस्फोट है। हर क्षण मोबाइल, समाचार, सोशल मीडिया और चर्चाएँ हमारे सामने हैं। परंतु हर बात ज्ञान नहीं होती। इसलिए पहला चरण है—विवेकपूर्ण चयन। जो बातें हमारे चरित्र को ऊँचा उठाएँ, जो प्रेरणा दें, जो जीवन को दिशा दें—उन्हें ग्रहण करें। अच्छे प्रवचन, प्रे...

🇮🇳 भारत-जननी राष्ट्र-वन्दना. (समूहगानार्थ संस्कृत-रूप)

🇮🇳 जयतु जयतु भारतम् 🇮🇳 🌺 मंगलाचरण (सर्वे मिलित्वा) वन्दे भारत-जननीम्। वन्दे जीवन-आधारम्॥ त्वमेव माता नः नित्यं, त्वमेव प्राण-धारिणी॥ जयतु जयतु भारतम्। जयतु संस्कृतिधारिणी॥ 🌄 प्रथम स्तोत्रम् — स्वरूप-वर्णनम् हिमालयः ते शिरोभूषणम्, सिन्धुः पादप्रक्षालकः। गङ्गा-यमुना ते नाड्यौ, जनजीवन-प्रदीपिके॥ नानाधर्म-समन्विता, नानाभाषा-विभूषिता। एकत्व-सूत्रे बद्धा त्वं, विश्वमङ्गल-कारिणी॥ (कोरस) 🌾 द्वितीय स्तोत्रम् — जीवनाधारत्वम् त्वत्क्षेत्रेषु सस्य-शोभा, त्वत्पवनः जीवनप्रदः। त्वन्मृदा गन्ध-पूर्णा नः, हृदये सदा वसति॥ कृषक-श्रम-समन्विता, विज्ञान-विकास-युक्ता। वाणिज्य-विद्या-संपन्ना, कलासंगीत-रञ्जिता॥ (कोरस) 🇮🇳 तृतीय स्तोत्रम् — तिरङ्ग-गौरवम्के सरिया त्याग-दीप्तिः, श्वेतः शान्ति-प्रकाशकः। हरितः समृद्धि-सूचकः, चक्रं धर्मस्य चिन्हकम्॥ उन्नतं ध्वजम् अस्माकं, आकाशे नित्यं विराजते। तेजसा तस्य प्रेरिताः, राष्ट्रसेवां कुर्महे॥ (कोरस ऊर्ध्वस्वरे) 🕯 चतुर्थ स्तोत्रम् — शहीद-स्मरणम् येषां रक्तं भूमौ पतितम्, स्वाधीनतायै समर्पितम्। ते वीराः अमराः सन्ति, राष्ट्रदीपाः दिवाकराः॥ न विस्मरामः तेषां त्यागम्, न...

हर दिन नया है, हर दिन अंतिम है

हर दिन नया है, हर दिन अंतिम है, जीवन क्षण-क्षण में संपूर्ण है। जो आज मिला है श्वास तुम्हें, वही प्रभु का सबसे बड़ा वरण है। मत टालो सपनों को कल पर, कल केवल एक कल्पना है, जो करना है, अभी कर डालो, यही समय की सच्ची साधना है। यदि आज अंतिम संध्या होती, क्या तुम यूँ ही मौन खड़े रहते? या साहस की ज्वाला बनकर अपने भीतर के पर्वत चढ़ते? समय न रुकता राजाओं पर, न साधारण जन पर ठहरता है, जो जाग गया इस क्षण में, वही अमर पथ पर चलता है। क्रोध त्यागो, अहंकार मिटाओ, प्रेम को अपना अस्त्र बनाओ, यदि अंतिम दिन समझ सको तो हर रिश्ते को गले लगाओ। एक प्रतिशत भी जीत की आशा हो, तो सौ प्रतिशत पुरुषार्थ करो, भाग्य नहीं, परिश्रम लिखता है, अपने कर्मों से इतिहास रचो। हर प्रभात नया अवसर है, हर साँझ आत्ममंथन है, जो हर दिन को अंतिम जी ले, वही सच्चा जीवन धन है। यदि आज ही अंतिम अवसर हो, तो क्या तुम डरकर जी पाओगे? या मुस्काकर संसार को अपना श्रेष्ठ देकर जाओगे? चलो ऐसे जियो कि हर क्षण में उद्देश्य की अग्नि प्रखर रहे, यदि मृत्यु भी आ जाए सम्मुख, तो भी मन निर्भय और निखर रहे। हर दिन नया है, हर दिन अंतिम है— इसे केवल शब्द न रहने दो,...

मानवता ही सच्चा धर्म

गौ की ममता का मान रखो, गाँवों की पहचान रखो, गंगा की पावन धारा में भारत की शान रखो। यह भूमि ऋषियों की तपोभूमि, यह त्याग-तपस्या का मर्म, सुन लो जग के मानवों — मानवता ही सच्चा धर्म। मंदिर की घंटी गूँजे तो मन भी पावन होना चाहिए, केवल शब्दों से नहीं, जीवन से धर्म होना चाहिए। कर्तव्य-पथ पर जो अडिग रहे, वही सच्चा वीर, लोभ-मोह की ज्वाला बुझाकर बने युगों का धीर। जब-जब मन में अहंकार का अंधकार छा जाता है, मानव अपने ही हाथों से अपना घर जला जाता है। जागो! भीतर दीप जलाओ, सत्य-अहिंसा धारण करो, नैतिकता की ढाल उठाकर अन्यायों का हरण करो। नशे की बेड़ी तोड़ो अब, चेतना को मुक्त करो, अपने जीवन को उज्ज्वल कर भारत को भी युक्त करो। सद्भावों की शीतल छाया हर हृदय में फैलाओ, भाईचारे की पावन गंगा घर-घर तक ले जाओ। अणुव्रत का यह दिव्य संदेश — छोटा-सा संकल्प उठाओ, पहले खुद को जीत लो फिर जग को जीत दिखाओ। चरित्र-निर्माण की नींव रखो, बनो समय की आवाज़, सत्य, संयम, सेवा से लिख दो भारत का नया इतिहास। गौ बचेगी तो करुणा बचेगी, गाँव बचेंगे तो देश बचेगा, गंगा बहेगी निर्मल जब, तब ही भारत विशेष बचेगा। मानवता का दीप जला दो हर अंत...

चल, उठ, जाग, हुँकार भर —हार नहीं अंतिम सत्य है l (वीर रस)

हर मुश्किल आसान होगी — मन को शांत जला, अंतर में विश्वास रख, मत डर भाग्य-छला। तूफानों से क्या डरना, जब संकल्प अडिग खड़ा, पर्वत भी झुक जाएगा — यदि मन तेरा न डरा। हर कोई तेरे सम्मुख झुके — ऐसा तेज़ जगा, पर विनम्रता की ढाल लिए, अहंकार को दूर भगा। शान रहे तेरे व्यक्तित्व में, पर अभिमान न हो, सिंह सा साहस हो भीतर — पर क्रूरता का गान न हो। हर शत्रु काँपेगा तुझसे — यदि सत्य तेरी तलवार, धर्म-पथ पर जो डट गया — उसका कौन प्रतिकार? अन्यायों की भीड़ भले ही — आगे दीवार बने, धर्मवीर के चरणों में — वह दीवार धूल बने। रग-रग में ज्वाला भर ले, नेत्रों में प्रकाश जगा, अंतर का संशय तोड़, स्वयं का इतिहास रचा। हार नहीं अंतिम सत्य है — यह केवल एक पड़ाव, जो गिरकर फिर उठ जाता है — वही रचता है प्रभाव। क्रोध नहीं, संयम रख — यही वीरों की पहचान, क्षमा जहाँ शक्ति बन जाए — वहीं बसता भगवान। कर्म तेरा रण-नाद बने, वाणी तेरी हुंकार, तेरी चाल से कांपे जग — ऐसा कर विस्तार। चल, उठ, जाग, हुँकार भर — यह समय नहीं विश्राम का ! धर्म, सत्य, संकल्प लिए — यह क्षण है तेरे काम का ! हर मुश्किल आसान होगी — यह मंत्र हृदय में धार, सत्य-पथ ...

“जितने का चांस अगर 1% भी है, तो भी वहाँ 100% कोशिश करो”

जीवन एक युद्धभूमि है। यहाँ हर दिन हमें छोटे-छोटे और बड़े-बड़े निर्णय लेने होते हैं। कभी परिस्थिति अनुकूल होती है, तो कभी प्रतिकूल। कभी संसाधन भरपूर होते हैं, तो कभी सीमित। कभी लोग साथ खड़े होते हैं, तो कभी हम बिल्कुल अकेले महसूस करते हैं। ऐसे समय में मन एक प्रश्न पूछता है — “क्या इसमें जीतने का कोई चांस है?” यदि उत्तर मिलता है — “हाँ, थोड़ा बहुत है” तो हम आगे बढ़ते हैं। लेकिन यदि उत्तर मिलता है — “बस 1% ही संभावना है” तो अधिकतर लोग पीछे हट जाते हैं। यही वह क्षण है जहाँ साधारण और असाधारण लोगों के बीच अंतर पैदा होता है। साधारण व्यक्ति संभावना का हिसाब लगाता है। असाधारण व्यक्ति संकल्प का। 1% संभावना का अर्थ है — दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। आकाश पूरी तरह अंधकारमय नहीं हुआ है। रास्ता पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और जब तक रास्ता पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, तब तक प्रयास भी समाप्त नहीं होना चाहिए। जीवन का यह सिद्धांत केवल प्रेरक वाक्य नहीं है, यह चरित्र निर्माण की आधारशिला है। यह नेतृत्व का मूल मंत्र है। यह व्यवसाय, शिक्षा, खेल, समाज और आध्यात्म — हर क्षेत्र में लागू होता है। किसी भी बड़...

जीवन के तीन शाश्वत प्रश्न. (लक्ष्य, स्थान और कर्म का समन्वित जीवन-दर्शन)

प्रस्तावना : निर्णय ही जीवन की दिशा है मनुष्य का जीवन घटनाओं का परिणाम नहीं है; वह निर्णयों का परिणाम है। परिस्थितियाँ सबके जीवन में आती हैं। परंतु परिस्थितियाँ किसे कहाँ तक ले जाएँगी — यह व्यक्ति के निर्णय तय करते हैं। निर्णय तभी परिपक्व होते हैं जब मन स्पष्ट हो। और मन तभी स्पष्ट होता है जब व्यक्ति स्वयं से सही प्रश्न पूछता है। बड़े लक्ष्य रखने वाला व्यक्ति सामान्य जीवन नहीं जी सकता। उसे स्वयं से गहरे प्रश्न पूछने ही पड़ते हैं। ऐसे तीन प्रश्न हैं, जो किसी भी महत्वाकांक्षी, संवेदनशील और दूरदर्शी व्यक्ति के लिए अनिवार्य हैं: मैं क्या सीखना चाहता हूँ और क्यों? मैं कहाँ रहना चाहता हूँ और क्यों? मैं क्या करना चाहता हूँ और क्यों? ये प्रश्न केवल वाक्य नहीं हैं — ये जीवन की धुरी हैं। भाग 1 पहला प्रश्न: मैं क्या सीखना चाहता हूँ और क्यों? 1.1 सीखना केवल शिक्षा नहीं, दिशा है बहुत लोग पढ़ते हैं। बहुत लोग डिग्रियाँ लेते हैं। बहुत लोग कोर्स करते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि वे सीख क्यों रहे हैं। यदि सीखना उद्देश्य से जुड़ा नहीं है, तो वह जानकारी है। यदि सीखना उद्देश्य से जुड़ा है, तो वह शक्त...