No- 393. तूफ़ान को तूफ़ान रहने दो!
रचनाकार: राकेश मिश्रा जब भारत के वीरों ने, रण में हुंकार लगाई थी, तब दुनिया को भारत की, शक्ति समझ में आई थी। तोपों की गर्जन गूँजी थी, धरती भी थर्राई थी, वीरों के अदम्य साहस ने, विजय पताका फहराई थी। तोपों की गर्जन कम न हो, वीरों का साहस कम न हो। कलम की धार कभी थमे नहीं, युवा की रफ़्तार कभी थमे नहीं। कहते हैं, तूफ़ान को, इक दिन शांत हो जाना है, गरजते बादल को भी आख़िर, ख़ामोशी में खो जाना है। लेकिन मैंने ठान लिया है, अपना मत बतलाना है, हर तूफ़ान को हर क़ीमत पर, शांत नहीं हो जाना है। जब तक अन्याय ज़िंदा है, हुंकार ज़िंदा रहनी है, जब तक सत्य अकेला है, ललकार ज़िंदा रहनी है। कलम चले, कविता गूँजे, युवा शक्ति लहराए, भारत माँ के गौरव का, परचम ऊँचा लहराए। कलम रुकी तो सच हारेगा, कौन सवाल उठाएगा? कवि चुप हुआ तो जन-मन को, कौन जगाने आएगा? युवा जोश यदि थम जाएगा, कौन नया इतिहास रचाएगा? सज्जन जब ख़ामोश रहेंगे, दुष्टों का तांडव छाएगा। कलम नहीं रुकने पाएगी, कविता नहीं दबेगी, सच की आवाज़ समय के सीने पर, अमिट छाप लिखेगी। युवा लहू की रवानी से, हर मंज़िल मुस्काएगी, भारत की नवशक्...