No- 391. आज का कुरुक्षेत्र हमारे भीतर है
आधुनिक मनुष्य, स्थिर मन और श्रीमद्भगवद्गीता हमने दुनिया को बदलने के लिए विज्ञान बनाया, दूरी मिटाने के लिए तकनीक बनाई, समय बचाने के लिए मशीनें बनाईं, और संवाद को तेज करने के लिए सोशल मीडिया बना लिया। लेकिन एक प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है— क्या हमने अपने मन को समझने और उसे स्थिर रखने की क्षमता भी उसी गति से विकसित की है? आज सूचना पहले से अधिक है, लेकिन विवेक उतना ही बढ़ा है—यह आवश्यक नहीं। हमारे पास संवाद के साधन पहले से अधिक हैं, लेकिन संवाद की गुणवत्ता क्या उतनी ही बढ़ी है? हम हजारों लोगों से डिजिटल रूप से जुड़े हैं, लेकिन क्या अपने परिवार, अपने समाज और सबसे बढ़कर— अपने आप से हमारा संवाद मजबूत हुआ है? समाज में असहिष्णुता, आक्रोश, नशा, अपराध, हिंसा, अवसाद, रिश्तों में कटाव, विश्वास की कमी, दिखावे की संस्कृति और लगातार बढ़ती तुलना जैसे अनेक प्रश्न दिखाई देते हैं। सत्ता, धन और प्रतिष्ठा के प्रति आसक्ति भी अनेक स्तरों पर दिखाई देती है। इन सबके कारण अलग-अलग हो सकते हैं। इन्हें केवल सोशल मीडिया के खाते में डाल देना समस्या को बहुत सरल बना देना होगा। लेकिन सोशल मीडिया ने एक क...