खुद का डर हटाने के लिए, दूसरे को साहस दीजिए. (वीर रस कविता)
भय के बादल मन में छाए, कदम रुके, विश्वास थमाए। तन कांपे, दृष्टि डगमगाए, पर भीतर एक दीप जगाए। उठो! किसी का हाथ थाम लो, उसके मन में ज्योति जला दो। जो दीप जलाओगे तुम उसमें, वह प्रकाश स्वयं में पा लो। डर है केवल तम का घेरा, साहस है उगता सवेरा। जो औरों के हित दीपक बने, उसका जीवन न होगा अँधेरा। जो गिरते को तुम सहारा दो, जो रोते को तुम हँसाओ। उसकी आँखों में विश्वास देखो, वह शक्ति तुम्हारे भीतर आए। मत डर तू अपने संकट से, मत झुक तू अपने शोक से। जब थामेगा हाथ किसी का, बच जाएगा हर आघात से। डर कायरता का बंधन है, साहस वीरों का आभूषण। जो जन-जन में जोश जगा दे, वही धारण करे सिंहासन। गिरते को यदि तू उठा दे, रोते को यदि हँसा दे। उसकी आँखों का जो विश्वास, तेरे भीतर अग्नि जगा दे। सेवा से साहस उपजता, निस्वार्थ हृदय बल रचता। जो औरों के लिए खड़ा हो, वह स्वयं भी निर्भीक सजता। उठ, बढ़, ललकार स्वयं को, टूट पड़े हर अवरोध पर। जो साहस का शंख बजाए, विजय लिखे वह हर मोड़ पर। जो दीप जलाए तूफानों में, वह अडिग रहे मैदानों में। जो औरों को निर्भय करता, वह विजयी हर अभियान में। खुद का डर हटाना है यदि, जग में ज्वाला प्रज्वलि...