संदेश

390- “हनुमान चालीसा आत्मचिंतन एवं Inner Development Journey”

हनुमान चालीसा : 100 आत्मचिंतन प्रश्न खंड 1 — मन का दर्पण मैं रोज हनुमान चालीसा पढ़ता हूँ—लेकिन क्या मैं अपने मन को भी पढ़ता हूँ? “निज मनु मुकुरु सुधारि” —मेरे मन का दर्पण आज कितना साफ है? मेरे भीतर की सबसे बड़ी कुमति क्या है? क्या मैं अपनी गलतियों को स्वीकार करता हूँ या उनके लिए दूसरों को दोष देता हूँ? मैं सुमति माँगता हूँ—लेकिन क्या सही बात समझ आने पर उसे स्वीकार भी करता हूँ? मेरी बुद्धि सत्य की खोज करती है या मेरे अहंकार को सही साबित करती है? मेरे भीतर कौन-सा विचार है जिसे मैं जानता हूँ कि गलत है, फिर भी छोड़ नहीं पा रहा? क्या मैं दूसरों के दोष जल्दी देखता हूँ और अपने दोष देर से? अगर मेरा मन एक दर्पण है, तो उसमें आज मुझे अपना कौन-सा चेहरा दिखाई देगा? क्या मेरी पूजा मेरे व्यवहार में दिखाई देती है? खंड 2 — गुरु, ज्ञान और विनम्रता “श्रीगुरु चरन सरोज रज” —क्या मैं वास्तव में किसी से सीखने के लिए तैयार हूँ? क्या ज्ञान बढ़ने के साथ मेरा अहंकार भी बढ़ रहा है? क्या मैं सलाह सुनता हूँ या केवल अपनी बात मनवाना चाहता हूँ? क्या मैं अपने से छोटे व्यक्ति से भी सीख सकता हूँ? मे...

No- 389. अगर सब कुछ मिल जाए, तो फिर इंसान क्या खोजता है?

अगर सब कुछ मिल जाए, तो फिर इंसान क्या खोजता है? लेखक: राकेश मिश्रा अगर दौलत ही सब कुछ होती , तो दुनिया के सबसे सम्पन्न लोगों के कदम मंदिरों की चौखट तक क्यों पहुँचते? अगर आविष्कार ही सब कुछ होता , तो आधुनिक तकनीकी दुनिया को बदल देने वाले Steve Jobs एक समय भारत की आध्यात्मिक भूमि तक क्यों आते? अगर यश ही सब कुछ होता , तो करोड़ों लोगों के आदर्श बने विराट कोहली जैसे खिलाड़ी भी किसी संत के सामने बैठकर आध्यात्मिक संवाद क्यों करते? और अगर पद ही सब कुछ होता , तो इतिहास में ऊँचे से ऊँचे पदों पर पहुँचे लोग भी अंततः किसी मंदिर, आश्रम या आध्यात्मिक परंपरा की ओर क्यों मुड़ते रहे? ये प्रश्न किसी व्यक्ति, धर्म या विचारधारा के पक्ष या विपक्ष में नहीं हैं। ये मनुष्य के जीवन को समझने वाले प्रश्न हैं। क्योंकि शायद जीवन का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि मनुष्य बाहर की दुनिया में बहुत कुछ हासिल करने के बाद भी भीतर कुछ खोजता रहता है। क्या उपलब्धि और पूर्णता एक ही चीज हैं? हमने सफलता को कुछ निश्चित पैमानों से मापना सीख लिया है। कितना पैसा है? कितनी बड़ी संपत्ति है? कितनी बड़ी कंपनी है? कितने लोग पहचान...

No- 388. रिश्ते बड़ी गलतियों से नहीं, छोटे अहंकार से टूटते हैं

एक ‘माफ़ करना’ मन का बोझ हल्का कर सकता है और एक ‘शुक्रिया’ रिश्ते में फिर से गर्माहट ला सकता है कभी-कभी फोन हमारे हाथ में होता है। हम किसी अपने का नाम देखते हैं, कुछ क्षण स्क्रीन को देखते रहते हैं और फिर फोन रख देते हैं। मन कहता है— “बात कर लेनी चाहिए।” अहंकार कहता है— “पहले वह फोन करे।” सामने वाला भी शायद उसी समय यही सोच रहा होता है। उसे भी बात करनी होती है। उसे भी पुरानी बात खत्म करनी होती है। उसे भी शायद हमारी याद आती है। लेकिन वह भी इंतजार करता है। और इस तरह दो लोगों के बीच कोई बड़ी दीवार नहीं बनती—बस एक छोटी-सी चुप्पी खड़ी हो जाती है। फिर दिन गुजरते हैं। दिन महीनों में बदलते हैं। महीने वर्षों में। और एक दिन पीछे मुड़कर देखते हैं तो समझ आता है कि रिश्ता किसी बड़ी गलती से नहीं टूटा था। बस किसी एक ने समय पर “माफ़ करना” नहीं कहा और दूसरे ने समय पर “चलो, बात करते हैं” नहीं कहा। यही रिश्तों की सबसे बड़ी विडंबना है। कई बार प्रेम मौजूद रहता है, लेकिन अहंकार उससे पहले बोल देता है। अहंकार हमेशा घमंड के रूप में नहीं आता हम अहंकार को अक्सर ऊँची आवाज़, घमंड या खुद को दूसर...

No- 387 विरासत का सवाल: पूर्वजों से हमने क्या पाया, अगली पीढ़ी को क्या देंगे?

लेखक: राकेश मिश्रा हम अपने पूर्वजों के बारे में जानना चाहते हैं—वे कौन थे, कहाँ से आए, उनका जीवन कैसा था, उन्होंने किन परिस्थितियों में संघर्ष किया और हमारे परिवार तथा समाज के लिए क्या छोड़कर गए। अपनी जड़ों को जानना केवल अतीत को जानना नहीं है। यह अपनी पहचान, अपने संस्कार और अपनी सामाजिक यात्रा को समझने का माध्यम भी है। लेकिन क्या केवल अपनी जड़ों को जान लेना पर्याप्त है? शायद नहीं। इसके साथ एक और बड़ा सवाल खड़ा होता है— “हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए क्या छोड़ा, यह जानना जरूरी है। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल है—हम आने वाली पीढ़ी के लिए क्या छोड़कर जाएंगे?” यही प्रश्न विरासत के वास्तविक अर्थ को समझने की शुरुआत करता है। विरासत केवल संपत्ति का नाम नहीं विरासत की बात होते ही हमारे सामने जमीन, मकान, व्यवसाय, धन और दूसरी भौतिक संपत्तियों की तस्वीर उभरती है। निस्संदेह ये भी विरासत का हिस्सा हैं, लेकिन मनुष्य की सबसे स्थायी विरासत अक्सर दिखाई नहीं देती। एक परिवार अपने बच्चों को केवल घर नहीं देता, वह संस्कार और जीवन के अनुभव भी देता है। एक शिक्षक केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाता, वह सोचने और प्र...

No- 386. ₹20,000 से शुरू हुई वह कहानी, जिसने Emami को बनाया

आर.एस. अग्रवाल की उद्यमिता, दोस्ती और अवसर पहचानने की कहानी ✍️ राकेश मिश्र कभी-कभी किसी बड़े कारोबारी साम्राज्य की कहानी पढ़ते हुए मेरी नजर उसके वर्तमान आकार पर नहीं, बल्कि उसकी शुरुआत पर ठहर जाती है। सोचिए—एक तरफ सुरक्षित नौकरी, दूसरी तरफ अपना कारोबार शुरू करने का अनिश्चित रास्ता। एक तरफ सीमित संसाधन, दूसरी तरफ बड़ा सपना। और पूंजी? सिर्फ ₹20,000 के आसपास। यहीं से शुरू होती है राधेश्याम अग्रवाल , यानी आर.एस. अग्रवाल, और उनके बचपन के मित्र आर.एस. गोयनका की कहानी। आज Emami भारत के चर्चित कारोबारी समूहों में शामिल है। लेकिन इस कहानी को समझने के लिए हमें आज से लगभग पाँच दशक पीछे, 1974 के कोलकाता में जाना होगा। दो दोस्तों का एक सपना आर.एस. अग्रवाल का जन्म 18 फरवरी 1946 को कोलकाता में हुआ। उनका परिवार राजस्थान के बीकानेर से जुड़ा हुआ था। शिक्षा को उन्होंने गंभीरता से लिया। St. Xavier's College, Kolkata से पढ़ाई के बाद उन्होंने वाणिज्य और कानून की शिक्षा प्राप्त की और Chartered Accountant तथा Company Secretary की पेशेवर योग्यता हासिल की। उनके बचपन के मित्र थे आर.एस. गोयनका। द...

No- 385. जीवन-पथ — शेर और शायरी

1.कर्म से बनती है पहचान, हुनर से निखरता है इंसान, वक़्त चाहे जितना आज़माए, हौसला रखता है इंसान। 2. ठोकरों ने जो सिखाया, वो किताबों में कहाँ, गिरके जो फिर उठ खड़ा हो, असली फ़न है बस वहाँ। 3. मुश्किलों से भागकर कोई मुकाम हासिल नहीं होता, जिसे चलना आता है, उसका सफ़र कभी बेकार नहीं होता। 4. हार को हार मत समझो, ये भी एक पैग़ाम है, जहाँ राह बदलनी पड़े, वहीं से नया मुकाम है। 5. फ़ैसले मुश्किल सही, लेकिन सफ़र रोकते नहीं, जो अपने फ़ैसलों पर टिके रहें, वो कभी झुकते नहीं। 6. वक़्त ने जब आईना दिखाया, अपनी औक़ात समझ आई, सफलता ने जब सिर उठाया, ज़िम्मेदारी साथ आई। 7. धन से घर सज सकता है, जीवन नहीं सँवरता, जब तक उसमें रिश्तों का उजाला नहीं उतरता। 8. रिश्ते मतलब से नहीं, एहसास से निभाए जाते हैं, मुश्किल वक़्त में जो साथ रहें, वही अपने कहलाते हैं। 9. परिवार सिर्फ़ छत नहीं, एक संस्कारों की ज़मीन है, जहाँ जड़ें मज़बूत हों, वहीं उड़ान हसीन है। 10. धर्म अगर माथे की रेखा है, तो कर्म उसकी पहचान, पूजा से पहले आचरण देखता है भगवान। 11. इबादत सिर्फ़ सजदे में हो, ये ज़रूरी तो नहीं, ...

No- 383. जीवन-पथ

कर्म मनुज को ऊँचा करता, अनुशासन देता आधार, सीख निरंतर साथ रहे तो निखर उठे जीवन-व्यवहार। संघर्षों से धैर्य मिलता, ठोकर देती नई समझ, हार कभी अंतिम नहीं होती, वहीं से मिलती नई राह। निर्णय लेकर बढ़ना सीखो, भय को मन से दूर करो, अपने बल पर खड़े रहो और अपने श्रम पर गर्व करो। समय सिखाता सीमा अपनी, सफलता दे उत्तरदायित्व, धन जीवन का साधन भर है, उससे बड़ा मनुष्य का मूल्य। धर्म वही जो कर्म में उतरे, वाणी में ही धर्म न हो, सेवा वह जो काम किसी के, केवल अपना यश न हो। संबंधों की डोर सँभालो, विश्वासों का मान करो, परिवार मिले तो केवल सुख नहीं—संस्कार भरो। जीवन में जो लोग मिलें, सब कुछ देकर जाते हैं— कोई धैर्य, कोई विश्वास, कोई निर्णय सिखलाते हैं। कोई कठिन घड़ी में आकर जीवन का अर्थ समझाता है, कोई छोटी-सी जिम्मेदारी से मन को बड़ा बनाता है। सफलता जब द्वार खटखटाए, मन में विनय बनाए रखना, जितना ऊँचा उठते जाओ, उतना धरती से जुड़े रहना। कभी ठहरकर स्वयं से पूछो— क्या रिश्तों का मान रखा? क्या परिवार को साथ लेकर जीवन का हर पथ पार किया? क्या विपदा में धैर्य बचा था? क्या सुख ...