No- 397 तेरे दर से रूठकर जाऊँ कहाँ... राकेश मिश्रा की कलम से
(मुखड़ा) तुझसे रूठूँ, तो जाऊँ कहाँ, तेरे सिवा है मेरा कहाँ? आँखों में दरिया, लब पे दुआ, तू ही बता, अब कहूँ क्या? तूने ही रुलाया, तू ही मना ले, टूटे हुए दिल को फिर से उठा ले। तेरे ही दर पे बिखरा पड़ा हूँ, चाहे सज़ा दे, चाहे लगा ले॥ (अंतरा – 1) जिनको मेरी दुआओं ने माँगा, क्यों उनको ही वक्त ने छीना? जिनके लिए खुद को भुलाया, क्यों उनसे ही दर्द है पाया? क्या मेरी चाहत में खता थी? क्या मेरी किस्मत ही सज़ा थी? तू सामने होकर भी चुप क्यों, क्या मेरी आवाज़ अनसुनी थी? (मुखड़ा) तुझसे रूठूँ, तो जाऊँ कहाँ, तेरे सिवा है मेरा कहाँ? आँखों में दरिया, लब पे दुआ, तू ही बता, अब कहूँ क्या? (अंतरा – 2) हँसी का मुखौटा पहने हुए, फिरता हूँ दर्द को सीने हुए। महफ़िल में सबको हँसाता हूँ, तन्हाई में खुद को रुलाता हूँ। तकिये ने रातों का हाल सुना, आँखों ने कितने सवाल बुने। जिस दर्द को दुनिया पढ़ न सकी, वो दर्द तेरे दर पर रख दिया। (अंतरा – 3) माथे की धूल तिलक हुई, आँसू की बूँद अभिषेक हुई। जिस 'मैं' को सीने से बाँधा था, वो तेरी चौखट पर राख हुई। अब जीत का कोई मान नहीं, अब ह...