No- 399 मेरे भीतर शिव जागे
1\. गुरु वंदना गुरु ने मेरा हाथ थामा, जीवन का अर्थ समझाया। भटके मन को राह दिखाकर, सच्चा पथ बतलाया। 2\. गुरु ही शिव हैं शिव ही गुरु हैं, गुरु ही शिव हैं, यही सनातन ज्ञान। गुरु की वाणी में मिलता है, जीवन का कल्याण। मुखड़ा गुरु मिले तो ज्ञान मिला, शास्त्र मिले तो मान मिला। सत्संग और सेवा से मुझको, जीवन का पहचान मिला। 3\. शास्त्र का संदेश शास्त्रों ने दर्पण दिखलाया, अपना रूप पहचान कराया। क्या है सच और क्या है माया, जीवन का मर्म बताया। 4\. सत्संग की महिमा सत्संग की जब छाँव मिली, मन को नई पहचान मिली। जो अपना था, जो पराया, सबमें एक ही जान मिली। 5\. सच्ची भक्ति मंदिर-मंदिर घूम लिया, माथे चंदन खूब लगाया। जब दुखियों के आँसू पोंछे, तब मैंने शिव को पाया। 6\. संवेदना भूखे को भोजन दे आया, प्यासे को जल पिलाया। टूटे मन को प्रेम से जोड़ा, तब सच्चा सुख पाया। 7\. अहंकार का त्याग लोभ गया तो चैन मिला, क्रोध गया तो प्रेम खिला। 'मैं' का पर्दा जब हट पाया, हर चेहरे में शिव नज़र आया। 8\. आत्मबोध न धन में, न अभिमान में, न केवल पूजा-पाठ में। शिव तो मिलते उस मन में, जो प्रेम रखे हर प्राण में। 9\. शिवत्व की...