आज के दौर में मानवता की प्रासंगिकता
मानव जीवन की सबसे बड़ी पहचान उसकी संवेदनशीलता है। पशु-पक्षी भी जीते हैं, खाते हैं, सोते हैं और अपनी संतति का पालन करते हैं, किंतु मनुष्य को “मानव” इसीलिए कहा गया है क्योंकि उसके भीतर मानवता (Humanity) का भाव है। आज जब विज्ञान और तकनीक ने हमें तेज़ गति दी है, सुविधाएँ बढ़ाई हैं और पूरी दुनिया को एक वैश्विक गाँव में बदल दिया है, तब सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या हम अब भी मानवता को उतना ही महत्व देते हैं, जितना देना चाहिए?
आज का युग प्रगति और प्रतिस्पर्धा का है। हर कोई सफलता, शक्ति, पद और प्रतिष्ठा की दौड़ में लगा है। लेकिन इस भागदौड़ में कहीं न कहीं मानवता का आधार कमजोर होता जा रहा है। इसलिए यह लेख आज की परिस्थितियों में मानवता की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालता है।
2. मानवता की मूल परिभाषा और मूल्य
मानवता केवल दूसरों की मदद करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक जीवन दृष्टि है—
- दूसरों के दुख में सहानुभूति रखना,
- सत्य, न्याय और करुणा पर चलना,
- किसी का शोषण न करना,
- और हर जीव में ईश्वर का अंश मानकर उसका सम्मान करना।
महात्मा गांधी ने कहा था—
"आप किसी समाज की महानता को इस बात से आँक सकते हैं कि वह अपने सबसे कमजोर और असहाय लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है।"
इसलिए मानवता का मूल्य है करुणा, दया, समानता और सहयोग। यही गुण मनुष्य को “सच्चा मनुष्य” बनाते हैं।
3. वर्तमान समय की चुनौतियाँ और मानवता की कमी
आज की दुनिया कई संकटों से घिरी है—
- आर्थिक विषमता – एक ओर अरबपति हैं, दूसरी ओर भूख से तड़पते लोग।
- धार्मिक और जातीय संघर्ष – धर्म के नाम पर हिंसा और आतंकवाद।
- पर्यावरण संकट – लालच और स्वार्थ ने प्रकृति को असंतुलित कर दिया है।
- परिवार और समाज में टूटन – रिश्तों में दूरियाँ, वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या।
- युद्ध और हिंसा – यूक्रेन-रूस, गाज़ा-इस्राइल जैसे युद्ध उदाहरण हैं।
इन सबके बीच सबसे ज़रूरी चीज़ है मानवता का पुनर्जागरण।
4. आज के दौर में मानवता की प्रासंगिकता
मानवता आज केवल आदर्श नहीं बल्कि आवश्यकता है। इसके कुछ पहलू इस प्रकार हैं—
(क) समाज में शांति और भाईचारा
यदि मानवता की भावना न हो तो समाज केवल स्वार्थ और हिंसा से भरा रहेगा। भाईचारा, सह-अस्तित्व और परस्पर सहयोग केवल मानवता के कारण ही संभव है।
(ख) आर्थिक और सामाजिक न्याय
मानवता का मूल्य हमें यह सिखाता है कि दूसरों के अधिकारों का सम्मान करें, गरीबों को उठाएँ और सबको समान अवसर दें। यही सामाजिक न्याय की नींव है।
(ग) पर्यावरण संरक्षण
मानवता केवल इंसानों तक सीमित नहीं है, यह प्रकृति और जीव-जंतु तक फैली है। यदि हमें आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य देना है तो मानवता के नाम पर ही हमें पर्यावरण बचाना होगा।
(घ) वैश्विक सहयोग
दुनिया अब सीमाओं से बंधी नहीं है। कोरोना महामारी इसका सबसे बड़ा उदाहरण रही—जहाँ देशों को दवाइयाँ, वैक्सीन और सहयोग की ज़रूरत थी। ऐसे समय मानवता ही सबसे बड़ा धर्म बनकर उभरी।
5. प्रेरणादायी उदाहरण
(1) मदर टेरेसा
उन्होंने कोलकाता की झुग्गियों में अपना पूरा जीवन गरीबों, रोगियों और असहायों की सेवा में लगा दिया। उनका एक ही संदेश था—
"हम सब महान कार्य नहीं कर सकते, लेकिन हम छोटे-छोटे कार्य बड़े प्रेम से कर सकते हैं।"
(2) स्वामी विवेकानंद
उन्होंने कहा था—
"मानव सेवा ही नारायण सेवा है।"
यानी ईश्वर की पूजा का सबसे बड़ा माध्यम मानवता की सेवा है।
(3) अब्दुल सत्तार ईधी (पाकिस्तान के समाजसेवी)
उन्होंने बिना धर्म और जाति देखे हर ज़रूरतमंद की सेवा की। उनके लिए मानवता सबसे बड़ा धर्म था।
(4) आधुनिक उदाहरण
- कोरोना काल में लाखों स्वयंसेवक, डॉक्टर और आम लोग सामने आए।
- किसी ने ऑक्सीजन सिलेंडर पहुँचाया, किसी ने मुफ्त भोजन, किसी ने अपनी गाड़ी एम्बुलेंस बना दी।
ये सब इस बात के प्रमाण हैं कि कठिन दौर में भी मानवता जीवित है।
6. प्रेरक उद्धरण और श्लोक
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गीता: "अहिंसा सत्यम् अक्रोधः त्यागः शान्तिरपैशुनम्। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥"
(सभी प्राणियों के प्रति दया और करुणा ही सच्चे मानव का लक्षण है।) -
महात्मा बुद्ध: "करुणा ही जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।"
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महात्मा गांधी: "जहाँ प्रेम है, वहीं जीवन है।"
7. मानवता को जीवन में उतारने के उपाय
- छोटी-छोटी मदद करें – किसी भूखे को खाना खिलाना, अनाथों की सहायता करना।
- धैर्य और सहनशीलता अपनाएँ – क्रोध के बजाय संवाद को महत्व दें।
- परिवार और रिश्तों में करुणा – माता-पिता, बुजुर्ग और बच्चों का ख्याल रखना।
- समाज सेवा – शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता जैसे कार्यों में सहयोग देना।
- विविधता को स्वीकारें – धर्म, जाति या भाषा के आधार पर भेदभाव न करें।
8. उपसंहार
आज की दुनिया में यदि सबसे बड़ी कमी है तो वह है मानवता की कमी। विज्ञान और तकनीक हमें सुविधाएँ दे सकते हैं, परंतु दिल में करुणा और दया केवल मानवता ही जगा सकती है।
यदि हर व्यक्ति यह संकल्प ले कि—
- वह दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करेगा जैसा वह अपने लिए चाहता है,
- और उसके जीवन का आधार केवल पैसा या पद नहीं बल्कि मानवता का मूल्य होगा,
तो निश्चित ही यह धरती स्वर्ग बन सकती है।
✍️ निष्कर्ष:
आज के दौर में मानवता केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि जीवन की अनिवार्यता है। यही वह मूल्य है जो समाज को जोड़ता है, इंसान को इंसान बनाता है और हमें सच्ची शांति व आनंद प्रदान करता है।
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