No- 389. अगर सब कुछ मिल जाए, तो फिर इंसान क्या खोजता है?

अगर सब कुछ मिल जाए, तो फिर इंसान क्या खोजता है?

लेखक: राकेश मिश्रा

अगर दौलत ही सब कुछ होती, तो दुनिया के सबसे सम्पन्न लोगों के कदम मंदिरों की चौखट तक क्यों पहुँचते?

अगर आविष्कार ही सब कुछ होता, तो आधुनिक तकनीकी दुनिया को बदल देने वाले Steve Jobs एक समय भारत की आध्यात्मिक भूमि तक क्यों आते?

अगर यश ही सब कुछ होता, तो करोड़ों लोगों के आदर्श बने विराट कोहली जैसे खिलाड़ी भी किसी संत के सामने बैठकर आध्यात्मिक संवाद क्यों करते?

और अगर पद ही सब कुछ होता, तो इतिहास में ऊँचे से ऊँचे पदों पर पहुँचे लोग भी अंततः किसी मंदिर, आश्रम या आध्यात्मिक परंपरा की ओर क्यों मुड़ते रहे?

ये प्रश्न किसी व्यक्ति, धर्म या विचारधारा के पक्ष या विपक्ष में नहीं हैं। ये मनुष्य के जीवन को समझने वाले प्रश्न हैं।

क्योंकि शायद जीवन का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि मनुष्य बाहर की दुनिया में बहुत कुछ हासिल करने के बाद भी भीतर कुछ खोजता रहता है।

क्या उपलब्धि और पूर्णता एक ही चीज हैं?

हमने सफलता को कुछ निश्चित पैमानों से मापना सीख लिया है।

कितना पैसा है?
कितनी बड़ी संपत्ति है?
कितनी बड़ी कंपनी है?
कितने लोग पहचानते हैं?
कितनी बड़ी उपलब्धियाँ हैं?
कितना प्रभाव है?
कितना ऊँचा पद है?

इनमें से हर चीज महत्वपूर्ण हो सकती है। धन जीवन को सुविधा और सुरक्षा देता है। शिक्षा और आविष्कार मानव सभ्यता को आगे बढ़ाते हैं। यश व्यक्ति को पहचान देता है। पद उसे निर्णय लेने की शक्ति देता है।

लेकिन एक प्रश्न फिर भी बच जाता है—

क्या इन सबके मिल जाने से मनुष्य पूर्ण हो जाता है?

शायद नहीं।

क्योंकि मनुष्य के भीतर कुछ ऐसे प्रश्न होते हैं, जिनका उत्तर बैंक खाते, पुरस्कार, पद या प्रसिद्धि नहीं दे सकते।

मैं कौन हूँ?

मैं क्यों हूँ?

मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?

मेरी उपलब्धियों का अर्थ क्या है?

मेरे पास सब कुछ होते हुए भी मन अशांत क्यों हो सकता है?

यहीं से बाहरी सफलता की यात्रा धीरे-धीरे भीतर की यात्रा में बदलने लगती है।

दौलत—बहुत कुछ खरीद सकती है, लेकिन सब कुछ नहीं

धन आवश्यक है। धन के बिना जीवन की अनेक आवश्यकताएँ पूरी करना कठिन है। धन से शिक्षा मिल सकती है, स्वास्थ्य सुविधाएँ मिल सकती हैं, घर बन सकता है, व्यवसाय खड़ा हो सकता है और समाज के लिए बड़े काम किए जा सकते हैं।

लेकिन क्या धन मनुष्य को निश्चित रूप से संतोष दे सकता है?

यदि ऐसा होता, तो सम्पन्न मनुष्य को कभी चिंता नहीं होती, कभी बेचैनी नहीं होती और कभी किसी आध्यात्मिक सहारे की आवश्यकता महसूस नहीं होती।

भारत के प्रमुख उद्योगपति परिवारों का मंदिरों में दर्शन करना कोई असाधारण घटना नहीं है। सम्पन्नता के साथ आस्था का होना विरोधाभास नहीं है।

इसके पीछे एक सरल मानवीय सत्य हो सकता है—

धन जीवन को आसान बना सकता है, लेकिन जीवन का अर्थ स्वयं नहीं बन सकता।

धन से बिस्तर खरीदा जा सकता है, नींद नहीं।

दवा खरीदी जा सकती है, स्वास्थ्य की गारंटी नहीं।

मनोरंजन खरीदा जा सकता है, मानसिक शांति नहीं।

सुरक्षा खरीदी जा सकती है, जीवन की अनिश्चितता समाप्त नहीं की जा सकती।

इसलिए धन महत्वपूर्ण है, लेकिन धन को जीवन का अंतिम उद्देश्य मान लेना शायद जीवन को बहुत छोटा कर देना है।

Steve Jobs—तकनीक से पहले स्वयं की खोज

Steve Jobs का जीवन इस प्रश्न को एक अलग कोण से देखने का अवसर देता है।

Apple जैसी कंपनी और आधुनिक तकनीकी संस्कृति पर उनके प्रभाव की कहानी बाद की है। 1974 में, अपनी विश्व-प्रसिद्धि से बहुत पहले, युवा Steve Jobs भारत आए थे। वे Neem Karoli Baba से मिलने की इच्छा लेकर Kainchi Dham पहुँचे, लेकिन तब तक बाबा का निधन हो चुका था।

इस घटना का महत्व इसलिए है कि दुनिया को तकनीक के माध्यम से बदलने वाले इस युवा व्यक्ति के जीवन में भी एक समय ऐसा था, जब वह बाहरी उपलब्धि से अधिक आंतरिक खोज की ओर आकर्षित हुआ।

यहाँ बात Steve Jobs को संत घोषित करने की नहीं है।

बात यह समझने की है कि मनुष्य कितना भी तार्किक, वैज्ञानिक या तकनीकी क्यों न हो, उसके भीतर अर्थ और आत्मबोध के प्रश्न उठ सकते हैं।

विज्ञान हमें यह समझाने में मदद कर सकता है कि चीजें कैसे काम करती हैं।

लेकिन जीवन का प्रश्न अक्सर इससे आगे जाता है—

“मैं यह सब क्यों कर रहा हूँ?”

यश—दुनिया की नजर में बड़ा होना और स्वयं की नजर में शांत होना अलग बातें हैं

विराट कोहली का नाम भारत ही नहीं, विश्व क्रिकेट में भी अत्यंत प्रसिद्ध है। मैदान पर उनकी उपलब्धियाँ और लोकप्रियता करोड़ों लोगों के सामने हैं।

लेकिन सार्वजनिक रूप से दर्ज प्रसंगों में वे और अनुष्का शर्मा वृंदावन में Premanand Maharaj से मिलने भी पहुँचे हैं।

इस घटना को किसी चमत्कार या किसी व्यक्ति की निजी मनःस्थिति के प्रमाण के रूप में देखने की आवश्यकता नहीं है।

लेकिन इससे एक सामान्य मानवीय प्रश्न जरूर उठता है—

क्या प्रसिद्धि मनुष्य की सभी आवश्यकताओं को पूरा कर देती है?

शायद नहीं।

क्योंकि लाखों लोग आपको जानते हों, फिर भी आपके भीतर ऐसे प्रश्न हो सकते हैं, जिनका उत्तर भीड़ के पास नहीं होता।

लोग आपको पहचान सकते हैं, लेकिन आपको समझना अलग बात है।

दुनिया आपको सफल मान सकती है, लेकिन आपके भीतर का संतोष एक अलग विषय है।

यही अंतर प्रसिद्धि और आत्मसंतोष के बीच है।

पद—शक्ति देता है, लेकिन शांति की गारंटी नहीं

पद मनुष्य को अधिकार देता है।

पद के साथ जिम्मेदारी आती है।

पद के साथ प्रभाव आता है।

लेकिन पद मनुष्य को मृत्यु से मुक्त नहीं करता।

पद अकेले मन को स्थिर नहीं करता।

पद यह सुनिश्चित नहीं करता कि व्यक्ति अपने जीवन से संतुष्ट ही होगा।

इसीलिए इतिहास में हम देखते हैं कि राजा, सम्राट, राजनेता, अधिकारी, उद्योगपति और सामान्य मनुष्य—सभी किसी न किसी रूप में जीवन के अंतिम प्रश्नों से सामना करते हैं।

कुर्सी बदलती रहती है, मनुष्य वही रहता है।

और एक दिन हर पद पीछे छूट जाता है।

तब प्रश्न यह नहीं रहता कि आपके पास कितनी शक्ति थी।

प्रश्न यह रहता है कि आपने उस शक्ति का उपयोग किसलिए किया और उस यात्रा में स्वयं को कितना समझ पाए।

तो फिर मनुष्य खोजता क्या है?

यही इस पूरे विचार का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

यदि धन पर्याप्त नहीं,
यदि आविष्कार पर्याप्त नहीं,
यदि यश पर्याप्त नहीं,
यदि पद पर्याप्त नहीं,

तो फिर मनुष्य की तलाश क्या है?

शायद इसका कोई एक सार्वभौमिक उत्तर नहीं है।

किसी के लिए वह आस्था है।

किसी के लिए आत्मज्ञान।

किसी के लिए परिवार।

किसी के लिए सेवा।

किसी के लिए राष्ट्र और समाज के प्रति योगदान।

किसी के लिए सृजन।

और किसी के लिए अपने भीतर की शांति।

इन सभी के पीछे एक साझा आवश्यकता दिखाई देती है—

जीवन को केवल जीना नहीं, उसे अर्थ देना।

मंदिर केवल ईश्वर का स्थान नहीं, मनुष्य के ठहरने का स्थान भी हो सकता है

मंदिर जाने वाले हर व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से श्रेष्ठ मान लेना भी उचित नहीं है।

और मंदिर न जाने वाले व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से कमजोर मानना भी उचित नहीं है।

आस्था व्यक्तिगत है।

लेकिन मंदिर, आश्रम या किसी आध्यात्मिक स्थान की ओर मनुष्य का आकर्षण एक गहरी मानवीय आवश्यकता की ओर संकेत करता है—ठहरने की आवश्यकता।

आज की दुनिया लगातार दौड़ रही है।

और शायद इसी दौड़ में मनुष्य स्वयं से दूर होता जा रहा है।

मंदिर की घंटी, प्रार्थना, ध्यान, मौन या किसी संत के सामने कुछ समय बैठना—इनमें से किसी को भी केवल धार्मिक कर्मकांड मानकर समाप्त कर देना आसान है।

लेकिन किसी व्यक्ति के लिए वही कुछ क्षण उसे अपने जीवन को देखने का अवसर दे सकते हैं।

जहाँ दुनिया कहती है—“और आगे बढ़ो”, वहाँ आध्यात्मिकता कभी-कभी पूछती है—“रुको, और देखो कि तुम जा कहाँ रहे हो।”

सफलता छोड़ने की नहीं, सफलता का अर्थ समझने की जरूरत है

इस विचार का अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि पैसा कमाना गलत है।

व्यवसाय करना गलत है।

वैज्ञानिक बनना गलत है।

बड़ा खिलाड़ी बनना गलत है।

प्रसिद्ध होना गलत है।

ऊँचा पद प्राप्त करना गलत है।

नहीं।

समस्या उपलब्धियों में नहीं है।

समस्या तब शुरू होती है, जब साधन ही साध्य बन जाते हैं।

धन साधन है।

ज्ञान साधन है।

व्यवसाय साधन है।

पद साधन है।

प्रसिद्धि भी साधन बन सकती है।

लेकिन इन सबका उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया गया—यही जीवन को अर्थ देता है।

एक व्यक्ति करोड़ों कमाकर केवल अपने लिए जी सकता है।

दूसरा वही धन शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य या समाज के निर्माण में लगा सकता है।

दोनों के बैंक खाते में धन हो सकता है, लेकिन उस धन का अर्थ अलग हो सकता है।

इसीलिए प्रश्न यह नहीं कि आपके पास कितना है।

प्रश्न यह भी है कि आपके पास जो है, उसका उपयोग किसलिए करते हैं।

असली सम्पन्नता कहाँ है?

शायद असली सम्पन्नता उस दिन शुरू होती है, जब मनुष्य यह समझता है कि—

मेरी पहचान केवल मेरा बैंक बैलेंस नहीं है।

मेरा परिचय केवल मेरा पद नहीं है।

मेरी कीमत केवल मेरी प्रसिद्धि नहीं है।

मेरी बुद्धिमत्ता केवल मेरे आविष्कारों से तय नहीं होती।

और मेरा जीवन केवल मेरी उपलब्धियों की सूची नहीं है।

मनुष्य का मूल्य उसके चरित्र, कर्म, संवेदना, संबंध, उद्देश्य और समाज के प्रति योगदान में भी छिपा होता है।

यही वह बिंदु है, जहाँ सफलता और सार्थकता एक-दूसरे से मिलती हैं।

आखिर में बचता क्या है?

एक दिन दौलत पीछे रह जाएगी।

एक दिन पद चला जाएगा।

एक दिन प्रसिद्धि कम हो जाएगी।

एक दिन शरीर भी साथ छोड़ देगा।

तब मनुष्य के साथ क्या जाएगा?

शायद उसकी बनाई हुई यादें।

उसके कर्म।

उसका चरित्र।

उसके संबंधों में छोड़ा हुआ प्रेम।

समाज के लिए उसका योगदान।

और सबसे बढ़कर—उसका अपने जीवन के प्रति उत्तर।

इसलिए शायद जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है—

“मैंने कितना हासिल किया?”

बल्कि यह है—

“जो हासिल किया, उसने मुझे क्या बनाया?”

दुनिया आपको आपकी उपलब्धियों से पहचान सकती है।

लेकिन आपकी उपलब्धियाँ यह तय नहीं करतीं कि आपके भीतर कितना संतोष है।

आपके पास करोड़ों हों और मन अशांत हो सकता है।

आपके पास बहुत कम हो और मन में संतोष हो सकता है।

आप प्रसिद्ध हों और फिर भी अकेले हो सकते हैं।

आप सामान्य जीवन जीते हों और फिर भी भीतर से अत्यंत समृद्ध हो सकते हैं।

इसलिए—

दौलत जरूरी है, लेकिन दौलत ही सब कुछ नहीं।

आविष्कार जरूरी हैं, लेकिन आविष्कार ही सब कुछ नहीं।

यश सुखद है, लेकिन यश ही सब कुछ नहीं।

पद महत्वपूर्ण है, लेकिन पद ही सब कुछ नहीं।

मनुष्य को इन सबके साथ कुछ और भी चाहिए—

एक उद्देश्य, एक आधार, कुछ संबंध, कुछ संवेदना और अपने भीतर लौटने की क्षमता।

शायद यही कारण है कि दुनिया की ऊँची-से-ऊँची मंजिल पर पहुँचने के बाद भी मनुष्य कभी मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ जाता है।

क्योंकि—

दुनिया को जीत लेना और स्वयं को पा लेना—दो अलग यात्राएँ हैं।

पहली यात्रा में दुनिया आपको पहचानती है।

दूसरी यात्रा में आप स्वयं को पहचानते हैं।

और शायद जीवन की सबसे बड़ी सफलता यही है कि दोनों यात्राओं के बीच मनुष्य स्वयं को खोने न दे।

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