No- 368. ऐसा बनो


ऐसा बनो कि जीवन तुम्हारा,
एक प्रार्थना बन जाए।
तुम्हें देखकर जग मुस्काए,
तुम्हें देखकर प्रभु रीझ जाए।

न नाम की कोई चाह रहे,
न यश का कोई भार रहे।
जो मिला उसे बाँट सको तुम,
मन में केवल प्यार रहे।

ऐसा बनो, ऐसा बनो,
कि मन निर्मल हो जाए।
दुनिया चाहे देर से समझे,
ईश्वर तुरंत समझ जाए।

जब राहों में अँधियारा हो,
तुम दीपक बनकर जल जाना।
जब कोई अपना टूट रहा हो,
चुपके से उसका बल बन जाना।

जिसके हिस्से धूप ही आई,
उसको थोड़ी छाँव दे देना।
जिसने जीवन हार दिया हो,
उसको फिर से गाँव दे देना।

जिसकी आँखें नम दिख जाएँ,
उनमें सपनों का रंग भरो।
जिसके पाँव थककर रुक जाएँ,
उसकी राह में संग चलो।

मंदिर में जाकर शीश झुकाना,
अच्छा है—पर इतना करना,
जिसे प्रभु ने भेजा जग में,
उस इंसान का मान भी करना।

सत्य कठिन हो, सत्य चुनो तुम,
लाभ मिले तो लोभ न करना।
भीड़ गलत दिशा में जाए,
तब भी अपना धर्म न बदलना।

कोई देखे या न देखे,
अपने कर्म सँवारते रहना।
दुनिया से छिप सकता है इंसान,
अपने भीतर से क्या छिपना?

जब कोई न हो पास तुम्हारे,
तब भी सच्चे बने रहो।
ईश्वर हर पल देख रहा है,
अपने मन से सच्चे रहो।

ऊँचा पद यदि मिल जाए तो,
और अधिक विनम्र हो जाना।
धन आए तो हाथ खुलें और,
दुखियों का दुःख हर लेना।

शक्ति मिले तो रक्षा करना,
ज्ञान मिले तो राह दिखाना।
जीत मिले तो साथ बाँटना,
हार मिले तो फिर उठ जाना।

पेड़ बनो तो छाँव भी देना,
नदी बनो तो प्यास बुझाना।
सूरज बनो तो प्रकाश बाँटना,
चाँद बनो तो दर्द घटाना।

जीवन का अर्थ यही तो है—
केवल अपने लिए न जीना।
अपने हिस्से की खुशियों में से,
थोड़ा जग को भी दे देना।

माँ की आँखों का सम्मान करो,
पिता के श्रम को मान करो।
परिवार मिले तो प्रेम लुटाओ,
रिश्तों को सम्मान करो।

बच्चों को केवल धन न देना,
उनको सच्चे संस्कार देना।
अपने पीछे ऐसी राह बनाना,
जिस पर चलना गर्व से कहना।

जिस मिट्टी ने जन्म दिया है,
उस मिट्टी का मान करो।
देश, समाज और मानवता पर,
अपने जीवन का दान करो।

कितना पाया—यह मत पूछो,
कितना बाँटा—याद करो।
कितने तुमको जानते हैं,
कितनों को तुम याद करो।

जो तुमको दुख दे, उसे क्षमा दो,
पर सीख कभी मत भूलो।
जो तुमसे आगे निकल गया है,
उससे जलना मत—कुछ सीखो।

ईर्ष्या मन को जला देती है,
क्रोध स्वयं को हाराता है।
क्षमा हृदय को मुक्त कर देती,
प्रेम मनुष्य बनाता है।

मन में इतना उजियारा रखो,
द्वेष कहीं ठहर न पाए।
तुम्हारा सबसे बड़ा शत्रु भी,
तुमसे मिलकर बदल जाए।

जीवन हर दिन एक परीक्षा है,
हर दिन नया सवाल लिए।
कभी खुशी, कभी गम लेकर,
कभी धूप, कभी छाँव लिए।

गिरना आए तो गिर जाना,
लेकिन वहीं पड़े मत रहना।
टूटो तो फिर जुड़ते जाना,
रुको नहीं—बस चलते रहना।

जब अपने भी साथ न दें तो,
प्रभु का हाथ समझ लेना।
जब सारे द्वार बंद मिलें तो,
नया द्वार स्वयं खोल लेना।

कठिन समय भी गुरु है अपना,
इससे कुछ तो सीखते जाना।
ईश्वर जब राह कठिन कर दे,
उसमें भी उसका हाथ पहचानना।

फिर आएगी जीवन की संध्या,
धीरे-धीरे रात ढलेगी।
एक दिन यह साँसों की माला,
चुपचाप कहीं छूट चलेगी।

न धन जाएगा, न पद जाएगा,
न कोई महल साथ चलेगा।
जिसे दिया था प्रेम जगत को,
बस वही तुम्हारे साथ चलेगा।

तब न पूछेगा जग तुमसे,
कितनी बड़ी थी तुम्हारी गाड़ी।
न यह पूछा जाएगा तुमसे,
कितनी ऊँची थी तुम्हारी अटारी।

बस इतना पूछा जाएगा—
कितने आँसू पोंछ सके?
कितने टूटे मन जोड़ सके?
कितनों के जीवन में तुम
आशा के दीप जगा सके?

और यदि उस अंतिम क्षण में,
मन के भीतर शांति मिले।
आँखें बंद हों, होंठ मौन हों,
फिर भी भीतर गीत खिले।

तब समझना जीवन जीना,
तुमने सच में सीख लिया।
जो कुछ था वह बाँट दिया और,
जो न था वह प्रेम दिया।

तब प्रभु के द्वार खड़े होकर,
कुछ भी माँगना मत प्रभु से।
बस इतना कहना शांत हृदय से—
“जितना बन पाया, जिया तुझसे।”

और शायद उस क्षण प्रभु भी,
मुस्कुराकर इतना कह जाए—

**“तूने मुझे मंदिर में ढूँढा,
मैं तेरे कर्मों में था।
तूने मुझे दूर समझा था,
मैं तेरे अंतर्मन में था।

तूने फूल चढ़ाए कम,
पर जीवन फूल बनाया।
तूने मेरा नाम लिया कम,
पर मेरा काम निभाया।”**

तब न दुनिया की वाहवाही चाहिए,
न कोई सम्मान चाहिए।
बस प्रभु की आँखों में अपने लिए,
थोड़ा-सा स्थान चाहिए।

ऐसा बनो कि जीवन तुम्हारा,
एक प्रार्थना बन जाए।
दुनिया चाहे भूल भी जाए,
ईश्वर तुम्हें न भूल पाए।

ऐसा बनो... ऐसा बनो...
कि कर्म तुम्हारे बोल उठें।
जब दुनिया तुमको देखकर चुप हो,
तब ईश्वर के होंठ बोल उठें—

“हाँ, यह मेरा अपना है...
इस पर मुझे नाज़ है।”

कुछ ऐसा बनो कि दुनिया तुम्हें देखकर नहीं,
तुम्हारा ईश्वर तुम्हें देखकर रीझ जाए।

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