No- 365. कारगिल विजय दिवस


"हिमालय का रक्त अभी जीवित है"

नमन नहीं—
आज रणवीरों का वंदन होगा।
आज शब्द नहीं,
राष्ट्र-आत्मा का स्पंदन होगा।

पूछो मत हिमगिरि की चोटी से, कितने वज्र प्रहार सहे,
कितनी बार हिमशिला पिघली, जब वीरों के उर विदीर्ण रहे।
पर झुकना भारत ने जाना कब? यह इतिहास बताता है,
जब-जब संकट घिरकर आया, भारत सिंह बन जाता है।

द्रास की घाटी आज भी अपने वीरों का जयगान करे,
टाइगर हिल का प्रत्येक शिखर रणभेरी का अभियान भरे।
बटालिक की चट्टानों पर अब भी वह हुंकार लिखी है—
"भारत की सीमा पर पहले, मृत्यु खड़ी है, फिर सैनिक है।"

जिस रातों में पर्वत काँपे, नभ का साहस टूट गया,
जिस क्षण अग्नि उगलती तोपों से धरती का विश्वास डिगा;
उस क्षण भारत का एक जवान, वज्र-सा अडिग खड़ा बोला—
"प्राण रहें या प्राण न रहें, तिरंगा किंचित् नहीं डोला।"

न तलवारों ने विजय लिखी,
न केवल अस्त्रों की ज्वाला ने;
भारत जीता उस क्षण,
जब माँ ने पुत्र कहा—
"जा बेटा! यदि लौटे तो आलिंगन दूँगी,
यदि न लौटे तो तुझ पर भारत को अर्पण कर दूँगी।"

धन्य वह जननी,
जिसने आँसू पीकर मुस्कान सजाई।
धन्य वह पत्नी,
जिसने चूड़ियों से पहले मातृभूमि बचाई।
धन्य वह बहन,
जिसकी राखी सीमा पर कवच बन गई।
धन्य वह संतान,
जिसके पिता अमर होकर भारत की धड़कन बन गए।

सुनो युवाओं!

राष्ट्र केवल नक्शों से नहीं बनता,
राष्ट्र चरित्र से बनता है।
सीमा केवल सैनिक नहीं बचाता,
उसे बचाती है हर नागरिक की निष्ठा।

यदि कलम उठाओ,
तो वह राष्ट्र के स्वाभिमान की प्रहरी बने।

यदि धन कमाओ,
तो उसमें देश का भी अधिकार हो।

यदि नेतृत्व करो,
तो स्वार्थ नहीं, भारत आगे चले।

यही कारगिल का संदेश है।

आज भी जब हिमालय पर सूर्य उगता है,
उसकी पहली किरण शहीदों के चरण चूमती है।
जब गंगा बहती है,
तो उसकी हर लहर उनके यश का अभिषेक करती है।
जब तिरंगा लहराता है,
तो उसकी हर फड़फड़ाहट कहती है—

"मैं रंगों का वस्त्र नहीं,
अपने वीरों के रक्त, त्याग और विश्वास का इतिहास हूँ।"

आओ, आज प्रतिज्ञा करें—

जब तक इस भूमि पर हमारी साँस चलेगी,
भारत का मस्तक नहीं झुकेगा।

जब तक हमारी नसों में रक्त बहेगा,
तिरंगे का गौरव नहीं रुकेगा।

और यदि कभी फिर कोई
कारगिल की ओर आँख उठाएगा,

तो हिमालय नहीं बोलेगा...

भारत का प्रत्येक नागरिक बोलेगा—

"यह भूमि बुद्ध की भी है,
यह भूमि शिवाजी की भी है,
यह भूमि भगत सिंह की भी है,
और यह भूमि उन अमर सैनिकों की है,
जो मृत्यु से नहीं,
केवल कर्तव्य से परिचित हैं।"

विजय का इतिहास तलवारें नहीं लिखतीं,
उसे सैनिकों का रक्त लिखता है।
और भारत का इतिहास आज भी
कारगिल की चोटियों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित है।

शत-शत नमन कारगिल के अमर वीरों को।
जय हिन्द!
भारत माता की जय!

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आज के दौर में मानवता की प्रासंगिकता

Consistency Se Zero Se Banta Hai Hero

🇮🇳 "भारत अपनी बेटियों पर गर्व करता है" 🇮🇳 ✍️With Respect & Pride— Rakesh Mishra