No-364. "धीरे चलना स्वीकार है"
धीरे चलना स्वीकार है,
लेकिन रुकना स्वीकार नहीं।
मंज़िल चाहे दूर खड़ी हो,
सपनों से इंकार नहीं।
पहले नींव को मजबूत करेंगे,
फिर ऊँची दीवार उठाएँगे।
एक-एक ईंट जोड़कर हम,
नया भविष्य गढ़ जाएँगे।
बीज धरा में धैर्य धरता,
तब बनकर वटवृक्ष खिलता है।
जो हर दिन थोड़ा आगे बढ़ता,
वही शिखरों तक मिलता है।
आज नहीं तो कल होगा,
हर श्रम अपना फल होगा।
छोटा कदम भी व्यर्थ नहीं,
यही सफलता का पल होगा।
ज्ञान हमारा दीप बनेगा,
सेवा जीवन का गीत बनेगा।
सत्य, श्रम और अनुशासन से,
भारत फिर से श्रेष्ठ बनेगा।
ना जल्दबाज़ी, ना घबराहट,
ना हारों से कोई डर।
धीरे-धीरे बढ़ते जाना,
यही विजेता का है सफ़र।
पहले नींव, फिर संरचना,
फिर विस्तार की होगी उड़ान।
इसी क्रम से बनता है,
हर युग का स्वर्णिम अभियान।
चलो आज बस एक कदम लें,
कल उससे आगे बढ़ जाएँ।
हर दिन एक नई ईंट रखकर,
सपनों का भारत गढ़ जाएँ।
समापन
धीरे चलना स्वीकार है,
लेकिन रुकना स्वीकार नहीं।
पहले नींव, फिर संरचना,
फिर विस्तार—यही सही।
यही हमारा पथ बने,
यही हमारा धर्म बने।
हर दिन एक छोटा प्रयास,
एक दिन भारत का उत्कर्ष बने।
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