No - 363. सुखांत जीवन
कौन कहे—सुख अंत में होगा?
कौन कहे—कल आएगा?
आज जिया जो सत्य, वही तो
जीवन का फल पाएगा।
पग-पग पर जो स्वयं सँवरे,
वही जग को सँवार सके।
अपने मन का दीप जलाकर,
अंधकार भी हार सके।
पहला दीप—जीवनशैली।
भोर जगे तो मन भी जागे,
श्रम से हर दिन हो आरंभ।
सादा भोजन, निर्मल चिंतन—
यही स्वास्थ्य का सच्चा स्तंभ।
दूसरा दीप—दृष्टिकोण।
नारी केवल रूप नहीं है,
जीवन की आधारशिला।
जिसने उसका मान रखा है,
उसने पाया सत्य मिला।
हर मानव में अपना अंश है,
क्यों फिर वैर-विरोध करें?
प्रेम जहाँ व्यवहार बन जाए,
वहीं सच्चे उत्सव भरें।
तीसरा दीप—अनुशासन।
मन तो चंचल पवन समान,
हर क्षण दिशा बदलता है।
जो अपने ही मन को साधे,
वह पर्वत-सा अटल रहता है।
समय न रुकता, काल न झुकता,
क्षण-क्षण जीवन ढलता है।
जो हर पल का मान समझ ले,
वह अमरत्व को छूता है।
चौथा दीप—अच्छी आदत।
बूँद-बूँद से घट भरता है,
कण-कण बनता पर्वत है।
रोज़ किया जो शुभ अभ्यास,
वही मनुष्य का व्यक्तित्व है।
सत्य वचन, सेवा का संकल्प,
सीखने की हर दिन प्यास।
यही आदतें भाग्य लिखेंगी,
यही जीवन का विश्वास।
समापन
चारों दीप जहाँ जलते हैं,
वहाँ न कोई रात रहती।
सुख कोई मंज़िल नहीं मित्रों,
वह तो हर दिन साथ रहती।
जीवन का निष्कर्ष यही है,
यही साधना, यही साधन—
स्वयं को प्रतिदिन श्रेष्ठ बनाना,
यही है सच्चा सुखांत जीवन।
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