एक-एक बूंद का जीवन-दर्शन
प्रस्तावना : सूक्ष्म ही मूल है संसार में जो कुछ भी विराट दिखाई देता है, उसका आरंभ अदृश्य और सूक्ष्म होता है। बीज धरती में दबा होता है, पर उसी में वटवृक्ष छिपा रहता है। विचार दिखाई नहीं देता, पर वही सभ्यताओं को जन्म देता है। सागर बूंदों से बनता है। पर्वत कणों से बनते हैं। और चरित्र — क्षण-क्षण के निर्णयों से बनता है। मनुष्य की भूल यही है कि वह परिणाम चाहता है, प्रक्रिया नहीं; वह ऊँचाई चाहता है, पर सीढ़ियाँ नहीं चढ़ना चाहता। संसार का हर महान परिवर्तन किसी विशाल विस्फोट से नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म बिंदु से आरंभ होता है। सागर बूंदों से बनता है, पर्वत कणों से बनते हैं, और चरित्र छोटे-छोटे कर्मों से बनता है। मनुष्य अक्सर बड़े अवसर, बड़े साधन और बड़े मंच की प्रतीक्षा करता है; परंतु जीवन का सत्य यह है कि बड़ा कभी अचानक नहीं बनता — वह बूंद-बूंद संचय से बनता है। पर जीवन का अटल नियम है — बड़ा कभी अचानक नहीं बनता; वह निरंतर संचय से बनता है। 1️⃣ सृजन का सिद्धांत : संभावना की परिपक्वता जब वर्षा की एक बूंद सीप में गिरती है, वही मोती बन जाती है। पर वही बूंद यदि पत्थर पर गिरे, तो केवल सूख जाती है। इसका अ...