एक बूंद
🌊 (१) सृजन का प्रारंभ
१
बूंद गिरी जब सीप में, बनती निर्मल मोत।
लघु कण पाता मान तब, जग में अमरित ज्योत॥
२
बूंद जली प्यासे अधर, जागे जीवन-श्वास।
सूखा वन हरषाय फिर, फूटे नव विश्वास॥
३
एक किरन तम हर सके, खोल प्रकाश-द्वार।
नन्हा दीपक जीत ले, घनघोर अंधकार॥
४
स्याही की इक बूंद से, लिखे समय इतिहास।
अंतिम पन्ना बोल उठे, जीवन का प्रकाश॥
५
रक्त-बिंदु दानार्थ जब, बहता पावन भाव।
मृतप्राय देहों में जगे, नव जीवन की छाव॥
६
शक्ति-बिंदु नारी धरे, बनती जग की माँ।
ममता से पोषित करे, धरती और गगन॥
७
रुपया एक लगन से, पूरा करे संकल्प।
बूंद-बूंद से पर्वत ढहे, मिटे कठिन विकल्प॥
📖 (२) ग्रंथ-साक्षी – इतिहास का प्रमाण
८
मानस में इक नाम से, पत्थर तरि गए तात।
राम-नाम की बूंद से, मिटे भवसिंधु-त्रात॥
९
गीता का इक श्लोक जब, उतरा अर्जुन-प्राण।
संशय-बूंद विलीन हुई, जागा दिव्य विधान॥
१०
कुरु सभा में एक छल, पासे की वह चाल।
शकुनि बुद्धि की बूंद से, जल उठा महाभार॥
११
एक स्मित माधव का, बदला रण का रूप।
श्रीकृष्ण नीति की इक रेख से, जीता धर्म-स्वरूप॥
१२
श्रद्धा की इक बूंद से, पूजित हो भगवान।
भगवान शंकर प्रसन्न तब हो उठें, दें कृपा-विधान॥
⚖️ (३) चेतावनी – पतन की दिशा
१३
एक गलत आचरण करे, जीवन चूर-चूर।
अरश चढ़ा मानव गिरे, क्षण में होकर दूर॥
१४
कुसंगति की इक चाल से, डोले दृढ़ विश्वास।
चरित्र-दीप बुझने लगे, छिन जाए उल्लास॥
१५
लोभ-बूंद जब मन गिरे, डोले कुल-आचार।
दुर्योधन सा मोह फिर, लाए घोर संहार॥
१६
एक विकार अगर बढ़े, बने अनर्थ अपार।
स्मरण गीता का करो, यही धर्म-आधार॥
🔥 (४) समापन – संकल्प और सार
१७
बूंद-बूंद से सागर बने, बूंद करे संहार।
सजग रहो हर श्वास में, यही जीवन सार॥
१८
मानस, गीता, युग कथन — देते यही विचार।
बूंद-सम क्षण में छिपा, जीवन का विस्तार॥
१९
अमृत-बूंद सद्कर्म की, धर लो हृदय-विचार।
लघु निर्णय इतिहास को, देता नया आकार॥
२०
अमृत-बूंद समान बन, कर उज्ज्वल व्यवहार।
लघु अंशों में ही छिपा, महानत्व का द्वार॥
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