चल, उठ, जाग, हुँकार भर —हार नहीं अंतिम सत्य है l (वीर रस)


हर मुश्किल आसान होगी — मन को शांत जला,
अंतर में विश्वास रख, मत डर भाग्य-छला।

तूफानों से क्या डरना, जब संकल्प अडिग खड़ा,
पर्वत भी झुक जाएगा — यदि मन तेरा न डरा।

हर कोई तेरे सम्मुख झुके — ऐसा तेज़ जगा,
पर विनम्रता की ढाल लिए, अहंकार को दूर भगा।

शान रहे तेरे व्यक्तित्व में, पर अभिमान न हो,
सिंह सा साहस हो भीतर — पर क्रूरता का गान न हो।

हर शत्रु काँपेगा तुझसे — यदि सत्य तेरी तलवार,
धर्म-पथ पर जो डट गया — उसका कौन प्रतिकार?

अन्यायों की भीड़ भले ही — आगे दीवार बने,
धर्मवीर के चरणों में — वह दीवार धूल बने।

रग-रग में ज्वाला भर ले, नेत्रों में प्रकाश जगा,
अंतर का संशय तोड़, स्वयं का इतिहास रचा।

हार नहीं अंतिम सत्य है — यह केवल एक पड़ाव,
जो गिरकर फिर उठ जाता है — वही रचता है प्रभाव।

क्रोध नहीं, संयम रख — यही वीरों की पहचान,
क्षमा जहाँ शक्ति बन जाए — वहीं बसता भगवान।

कर्म तेरा रण-नाद बने, वाणी तेरी हुंकार,
तेरी चाल से कांपे जग — ऐसा कर विस्तार।

चल, उठ, जाग, हुँकार भर —
यह समय नहीं विश्राम का !
धर्म, सत्य, संकल्प लिए —
यह क्षण है तेरे काम का !

हर मुश्किल आसान होगी — यह मंत्र हृदय में धार,
सत्य-पथ का रथी बने — जीत तेरे द्वार।

मन शांत, इरादा प्रखर —
यही विजेता की पहचान!
तेरा साहस, तेरी मर्यादा —
बन जाए युग की शान ! 

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