No- 371. चरैवेति—चरैवेति !
चरैवेति
अभी मैं हारा नहीं हूँ
जेब में एक रुपया नहीं,
गला प्यास से सूखा है,
तन में दर्द समाया है,
मन भी आज रूठा है।
अपने दूर खड़े हैं,
दुनिया ताने देती है,
हर राह मुझे रोक रही,
हर साँस परीक्षा लेती है।
फिर भीतर से स्वर उठता है—
रुकना मत!
झुकना मत!
टूटना मत!
चरैवेति!
बारिश तेज है,
रास्ता कीचड़ से भरा है,
दुनिया छाता ओढ़ चली,
मैं फिर भी नंगे पाँव खड़ा हूँ।
कपड़े भीग रहे हैं,
पाँवों में छाले हैं,
लेकिन आँखों में
अभी कुछ उजाले हैं।
मैं खुद से कहता हूँ—
दर्द है—सह लूँगा।
राह कठिन है—चल दूँगा।
दुनिया रोकती है—बढ़ दूँगा।
चरैवेति!
आज वे हँसते हैं
मेरी मजबूरी देखकर।
कल वही पूछेंगे—
“तुमने किया कैसे?”
मैं उन्हें उत्तर नहीं दूँगा।
मेरी मेहनत देगी उत्तर,
मेरी मंज़िल देगी उत्तर,
मेरे कदमों के निशान
दे देंगे उत्तर।
क्योंकि—
जिसे दुनिया कमजोर समझती है,
कभी-कभी वही
सबसे लंबी लड़ाई लड़ रहा होता है।
मैं गिरा हूँ—
लेकिन खत्म नहीं।
मैं थका हूँ—
लेकिन रुका नहीं।
मैं अकेला हूँ—
लेकिन हारा नहीं।
मेरी जेब खाली है—
लेकिन हौसला खाली नहीं।
मेरी आँखें नम हैं—
लेकिन सपना जीवित है।
और जब तक सपना जीवित है—
मैं जीवित हूँ।
इसलिए ऐ मुश्किल!
तू अपना पूरा जोर लगा।
आँधी बन—
मैं चट्टान बनूँगा।
बारिश बन—
मैं रास्ता बनाऊँगा।
अँधेरा बन—
मैं दीप बनूँगा।
तू मुझे गिरा सकती है—
लेकिन हर बार
मैं पहले से ऊँचा उठूँगा।
अब फैसला हो चुका है—
रास्ता चाहे जितना कठिन हो,
कदम रुकेंगे नहीं।
साथी चाहे जितने छूटें,
हौसला छूटेगा नहीं।
समय चाहे जितना लगे,
सपना मरेगा नहीं।
क्योंकि—
जब तक साँस है,
तब तक प्रयास है।
और जब तक प्रयास है—
चरैवेति!
चलते रहो।
बढ़ते रहो।
लड़ते रहो।
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