इंसान की परिभाषा
१
इंसान वही, जो धर्म की राह—
संकट में भी थामे रहता,
राम-सी मर्यादा लेकर
सत्य-अग्नि में झुलसे रहता।
२
इंसान वही, जो न्याय हेतु—
कृष्ण-शौर्य बन बनकर आए,
धर्म-युद्ध में अडिग खड़ा हो
अन्यायों से तनिक न घबराए।
३
इंसान वही, जो शक्ति पाकर—
दंभ न लाए, नेत्र न फेरें,
दुर्बल के आँसू पहचानें
और सहारा देकर उन्हें घेरे।
४
इंसान वही, जो कर्म-पथों—
पर गीता का स्वर सुन पाए,
कर्तव्य को ईश्वर माने
और हर क्षण उसको निभाए।
५
इंसान वही, जो जाति-धर्म—
की दीवारों में मन न बाँधे,
प्रेम, दया, सत्कर्म के सेतु
हर उर में प्रतिदिन वह गाँथे।
६
इंसान वही, जो भारत-माँ—
को जीवित मंदिर मान सके,
मिट्टी, गंगा, वेद-धरा को
अपने जीवन से जान सके।
७
इंसान वही, जो सत्य-ध्वजा—
को आँधियों में भी थामे,
राम-कृष्ण के पावन गुण
हृदय-दीप में जाग्रत थामे।
⭐ पूर्ण सार
राम सा वचन, कृष्ण का धर्म—
यही मनुष्य का सच्चा मर्म।
सत्य, पराक्रम, प्रेम का मान—
यही भारत का सच्चा इंसान।
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