No - 362. शनैः शनैः (जीवन का शाश्वत मंत्र)
उषा न आती एक ही पल में,
धीरे-धीरे अरुणिम होती।
कली न खिलती एक श्वास में,
सौरभ बनकर जग में होती।
गर्भ धरा का चीर अंकुर,
मौन तपस्या करता है।
अंधकार की गोद में पलकर,
एक दिवस वट बनता है।
सरिता कब सागर से मिलती,
बिना शिलाओं से टकराए?
चंदन कब सुगंध लुटाता,
बिना कुल्हाड़ी की चोटें खाए?
अग्नि बिना कुंदन निखरता?
बिना तपे क्या स्वर्ण दमकता?
संघर्षों की धधक भट्ठी में,
जीवन अपना रूप चमकता।
ऋषियों ने तब सत्य सुनाया,
जीवन का अनुपम उपदेश—
"शनैः पन्थाः शनैः कन्था,
शनैः पर्वतमस्तके।
शनैर्विद्या शनैर्वित्तं,
पञ्चैतानि शनैः शनैः॥"
चलना ही जीवन का धर्म है,
रुक जाना अज्ञान है।
कदम-कदम पुरुषार्थ जगे तो,
मंज़िल स्वयं प्रमाण है।
एक तंतु से नहीं बनता,
कभी वस्त्र का दिव्य विस्तार।
सत्कर्मों के सूक्ष्म तंतुओं से,
सजता जीवन का श्रृंगार।
शिखर कभी झुकते नहीं हैं,
भय, आलस्य या अभिमान से।
वे चरण चूमते केवल उनको,
जो लड़ते अपने अभियान से।
विद्या कोई दीप नहीं जो,
क्षणभर में जल जाए।
वह तो साधना की सरिता है,
जो जीवन भर बह जाए।
धन केवल मुद्राएँ नहीं हैं,
धन है श्रम का पावन मान।
ईमानों की हर कमाई,
बनती पीढ़ी का सम्मान।
समय मौन संन्यासी जैसा,
बिन बोले सब कह जाता।
जो प्रतिपल श्रम-दीप जलाए,
उसका भाग्य स्वयं लिख जाता।
जब थक जाएँ पाँव तुम्हारे,
मन आशाओं से भर लेना।
बीजों की निस्तब्ध तपस्या,
स्मृति में फिर से धर लेना।
कभी हिमालय हार न मानें,
कभी गगन झुकता देखा?
सूरज भी संध्या से पहले,
अपने पथ से हटता देखा?
तो फिर मानव! क्यों घबराता?
क्यों होता निराश, अधीर?
तेरे भीतर वही प्रभा है,
जो करती अंधकार अधीर।
मत माँग समय से शीघ्र फल,
पहले श्रम का वृक्ष उगाओ।
पुरुषार्थों की पावन धरती पर,
विश्वासों का बीज लगाओ।
बूँद नहीं पहचान बनाती,
नदियों का विस्तार बनो।
दीप नहीं, सूर्य बनो ऐसे,
जग का नव-आधार बनो।
चरैवेति का मंत्र हृदय में,
अविरल धड़कन बन जाए।
कर्मयोग की हर श्वास तुम्हारी,
भारत का स्पंदन बन जाए।
समापन
धीरे-धीरे समय सँवरता,
धीरे जीवन गाता है।
जो धैर्य और श्रम का साधक,
वही अमर कहलाता है।
रुको नहीं, झुको नहीं तुम,
चाहे पथ पाषाण बने।
"शनैः शनैः" का मंत्र जपो,
हर संघर्ष वरदान बने।
**पुरुषार्थों की ज्योति जलाकर,
सत्य-पथिक बन चलना तुम।
समय स्वयं इतिहास लिखेगा—
बस प्रतिपल आगे बढ़ना तुम।
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