No 358. स्कूल यूनिफॉर्म ✍️ यादों, संस्कारों और बचपन की सबसे भावुक धुन

वो स्कूल वाली यूनिफॉर्म…
सिर्फ कपड़ा नहीं होती थी,
वो माँ के हाथों की खुशबू,
पिता की मेहनत
और बचपन की सबसे सुंदर पहचान होती थी।

सफेद कमीज़, नीली पैंट,
काले जूतों की चमक निराली,
उसे पहनते ही लगता था
जैसे दुनिया अपनी-सी लगने वाली।

सुबह-सुबह माँ का आवाज़ लगाना—
“बेटा, जल्दी उठो… देर हो जाएगी…”
और नींद भरी आँखों में भी
स्कूल जाने की चमक आ जाती थी।

कभी टाई टेढ़ी हो जाती थी,
कभी फीते खुल जाते थे,
फिर भी आईने में खुद को देखकर
हम चुपके से मुस्कुराते थे।

कभी बटन टूट जाता था,
तो माँ रात में ही सी देती थी,
अपनी थकान छुपाकर
हमारी खुशी में जी लेती थी।

जूते जब पुराने हो जाते,
तलवे भी जवाब दे जाते,
तब पिता मुस्कुराकर कहते—
“अभी कुछ दिन और चल जाते…”

तब कहाँ समझ पाते थे
उनकी मजबूरी और प्यार,
आज वही बातें याद करके
भर आता है मन हर बार।

गाँव की कच्ची गलियों से लेकर
शहर की भागती राहों तक,
यही यूनिफॉर्म हर बच्चे को
एक जैसा बना देती थी।

न कोई अमीर दिखता था,
न कोई गरीब कहलाता था,
उस कपड़े के भीतर बस
एक मासूम सपना मुस्कुराता था।

उसकी जेब में कभी टॉफी होती,
कभी कुछ सिक्कों की खनक,
और उन्हीं तहों में छुपी रहती
दोस्ती, शरारत और धड़कन।

वही प्रार्थना की पंक्तियाँ,
वही घंटी की आवाज़,
वही दोस्तों संग हँसना-रोना,
वही अधूरे छोटे राज।

कभी सज़ा में खड़े रहे,
कभी तालियों में नाम आया,
उसी यूनिफॉर्म में हमने
जीवन जीना सीख पाया।

आज अलमारी में
महंगे कपड़ों की कमी नहीं,
पर सच कहें…
वो सुकून अब कहीं नहीं।

क्योंकि वो यूनिफॉर्म
सिर्फ धागों से नहीं बनी थी,
उसमें माँ-बाप की उम्मीदें,
शिक्षकों के संस्कार
और हमारे सपनों की उड़ान बुनी थी।

अब जब पुरानी तस्वीरों में
खुद को उस ड्रेस में देखते हैं,
तो लगता है…
ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत समय
हम चुपचाप पीछे छोड़ आए।

काश…
एक बार फिर वही बचपन लौट आए,
वही स्कूल की घंटी सुनाई दे,
वही दोस्त आवाज़ लगाएँ—
“अरे जल्दी आ… प्रार्थना शुरू हो गई…”
और हम भागते हुए माँ से कहें—
“माँ…
मेरी स्कूल यूनिफॉर्म निकाल दो ना…
आज फिर दिल से
बच्चा बनने का मन कर रहा है…”॥

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