झुको तो राष्ट्रभक्तों के सामने झुको”


शीश वहीं झुकेगा मेरा, जहाँ राष्ट्र का मान होगा,
जहाँ वतन की मिट्टी पर बलिदानों का गान होगा।

दिखावे के दरबारों में, झुकना मुझे स्वीकार नहीं,
झूठे वैभव के आगे सिर झुके—मुझे यह व्यवहार नहीं।

झुकना है तो झुकूँ वहाँ, जहाँ देश-प्रेम की ज्योति जले,
जहाँ किसी वीर की छाती पर तिरंगा निर्भय होकर फले।

धर्म अलग हो, जाति अलग हो, भाषा का भेद भले ही हो,
पर जिस हृदय में भारत बसता, उससे बढ़कर कोई न हो।

सीमा पर जो अडिग खड़ा है, प्राणों को भी वार रहा,
माँ भारती की रक्षा में जो हँसकर जीवन हार रहा।

उस वीर के चरणों में ही, मेरा कोटि प्रणाम रहेगा,
उसके आगे झुकने में ही भारत का अभिमान रहेगा।

किसान जो धरती जोत रहा है, अन्न-धन उपजाता है,
श्रमिक जो श्रम की अग्नि में तप राष्ट्र-भवन बनाता है।

गुरु जो ज्ञान का दीप जला, अज्ञान तिमिर मिटाता है,
ऐसे जन के चरणों में ही भारत शीश झुकाता है।

इसलिए कहता हूँ गर्व से—
नहीं झुकूँगा झूठे मान में, नहीं झुकूँगा अभिमान में,
झुकना होगा तो झुकूँगा केवल राष्ट्रभक्त इंसान में।

क्योंकि वही सच्चा सम्मान है, वही भारत की शान है,
राष्ट्रभक्तों के चरणों में ही मेरा हिंदुस्तान है।

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