जीवन का मौन संघर्ष 🔥 kavita


शब्द थक जाते हैं अक्सर,
पर मौन नहीं थकता,
भीतर जलता अग्निकुंड,
बाहर चेहरा चमकता।

भीतर एक ज्वालामुखी है,
बाहर हिम-सा शांत,
चेहरे पर उजली प्रभा,
अंतर में प्रलयकांत।

हर धड़कन रणभेरी जैसी,
हर साँस तीर-कमान,
मन का यह अदृश्य रणक्षेत्र
गढ़ता नया इंसान।

सपनों की सीढ़ी पर चढ़ते
पाँव लहूलुहान,
फिर भी माथे पर लिखी रहती
जिद की स्वर्णिम शान।

टूटन भी शिक्षक बन जाती,
पीड़ा देती ज्ञान,
घावों की गहराई में ही
छुपा हुआ सम्मान।

संघर्षों की राख तले ही
सुलगती है चिनगारी,
उसी अग्नि से ढलती जाती
जीवन की तलवारी।

न ताज मिला, न सिंहासन,
न जयघोष की धुन,
फिर भी भीतर विजयी होता
हर गिरकर उठता जन।

आँसू नमक बने घावों का,
पीड़ा बनी प्रकाश,
जिसने सहना सीख लिया है
वही बने इतिहास।

मौन यहाँ कमजोरी नहीं,
यह तप की तीखी धार,
जो भीतर-भीतर गढ़ती है
विजय का असली आकार।

जो गिरा, जो टूटा, जो फिर खड़ा —
वही अमर गाथा है,
जीवन का यह मौन संघर्ष ही
मानव की परिभाषा है।

क्योंकि—
जो भीतर जलना सीख गया,
वही प्रकाश बनेगा,
जो मौन में खुद को गढ़ लेगा,
वही इतिहास बनेगा। 🔥

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