खुशबूहीन फूलों-सी शिक्षा (समाज की सामूहिक वेदना)

खुशबूहीन फूलों-सी शिक्षा,
कैसी यह बगिया आज खड़ी?
ज्ञान मिला पर ज्ञान नहीं है,
आत्मा भीतर क्यों है पड़ी?

अंग्रेज़ियत का चोला पहने,
अपनी जड़ों से भाग रहे।
हिंदी बोलने में लज्जा,
मातृभाषा से विराग रहे।

“माँ” की जगह “मॉम” कहें,
“पिता” हुए बस “डैड” यहाँ।
संस्कारों की धूप बुझी है,
शब्दों में रह गया धुआँ।

बड़ों के चरणों में झुकना
अब पिछड़ापन कहलाता है।
“अरे”, “अबे” की तीखी बोली
संस्कारों को छल जाता है।

विद्यालय थे ज्ञान के मंदिर,
अब बाजारों की कड़ी बने।
ऊँची-ऊँची फीसों के कारण
कितने सपने अधूरे तले।

हर वर्ष अरबों का बजट
घोषणाओं में बह जाता।
कागज़ पर सपने खिलते,
धरातल सूना रह जाता।

पर आज एक प्रश्न बड़ा है —
क्या शिक्षा केवल धनवानों की?
क्या ज्ञान बिके ऊँची कीमत पर,
और राह बचे निर्धनों की?

शिक्षा तो अधिकार सभी का,
यह संविधान का वचन है।
यह अमीर-गरीब का भेद नहीं,
यह मानव होने का चयन है।

गरीब यहाँ कोई जाति नहीं,
न कोई सीमित पहचान।
हर वर्ग, हर धर्म के भीतर
संघर्षों का है तूफ़ान।

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, श्रमिक —
सबके सपनों में आग है।
पर अवसर जब सीमित होते,
तो टूटता विश्वास है।

मंदिर की घंटी सबकी है,
मस्जिद की अज़ान सभी की।
पर शिक्षा के इस महंगे द्वार पर
रुक जाती चाल कई की।

हर माँ की आँखों में सपना है
बच्चा आगे बढ़ जाए।
हर पिता के मौन संघर्ष में
बस इतना — वह पढ़ जाए।

दिन-रात श्रम की रेखाएँ
उनके माथे पर दिखती हैं,
पर फीसों की ऊँची दीवारें
राहों में आ खड़ी होती हैं।

प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में
निर्बल पीछे छूट रहा।
समान अवसर की धूप बिना
हर उत्साह भी टूट रहा।

यह वेदना किसी एक घर की नहीं,
न यह केवल मेरी बात।
यह पीड़ा पूरे समाज की है,
यह हर आँगन की रात।

हम दोष नहीं ठहराते,
न किसी से वैर रखते।
हम बस इतना कहना चाहें —
शिक्षा को व्यापार न करते।

दूर हटो, हे लाभ के लोभ में
ज्ञान को तौलने वालों।
यह राष्ट्र-आत्मा की ज्योति है,
मत इसे बाजार में ढालो।

मत करो सपनों का दोहन,
मत भविष्य को बाँटो धन से।
शिक्षा मंदिर है मानव-निर्माण का,
न लाभ-हानि के गण से।

शिक्षा केवल नौकरी नहीं,
यह जीवन का निर्माण है।
जहाँ चरित्र प्रथम स्थान पर,
वही सच्चा सम्मान है।

फूल तभी खुशबू देंगे
जब जड़ तक जल पहुँचेगा।
भारत तभी आगे बढ़ेगा
जब हर बच्चा पढ़ सकेगा।

उठो, स्वयं से प्रश्न करो —
क्या शिक्षा बिकने की वस्तु है?
या हर नन्हीं आँखों में
उजियारा बनने की शक्ति है?

खुशबूहीन फूल स्वीकार नहीं,
संस्कारहीन ज्ञान नहीं।
अधिकार से वंचित कोई रहे —
ऐसी शिक्षा महान नहीं।

ज्ञान के साथ समान अवसर —
यही हमारा प्रण रहे।
हर बच्चे तक पहुँचे उजाला —
यही सच्चा राष्ट्रधन रहे।

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