“मौन नहीं, मैं तूफ़ान हूँ!” 🔥
जब मन में अंधियारा छाए,
जब हर सपना टूटता जाए,
जब अपनों के तीखे शब्द
सीने में शूल बन चुभ जाएँ —
जब मन कहे — “अब चुप रहो…
किससे कहो? क्यों कुछ कहो?”
जब भीतर पीड़ा जलती हो
और आँखें भीगती चलती हों —
तभी उठो!
तभी संभलो!
तभी स्वयं से यह कह दो —
मैं हार नहीं, हुंकार हूँ!
मैं मौन नहीं, तूफ़ान हूँ!
जो मुझको आज गिराएगा,
कल मुझसे ही घबराएगा!
अपमान अगर अंगार बना,
तो समझो भाग्य का द्वार खुला,
जो जलता है, वही तपता है,
जो तपता है, वही दमकता है!
काँटों ने राह रोकी है?
तो समझो मंज़िल चौकी है!
जो संघर्षों से टकराता है,
वही इतिहास बनाता है!
चुप्पी को कमजोरी समझा?
यह तो शक्ति की गहराई है!
यह वह ज्वाला है भीतर की
जिसने दुनिया हिलाई है!
मैं झुकूँगा नहीं परिस्थितियों से,
मैं रुकूँगा नहीं आलोचनाओं से,
मेरी चाल भले धीमी हो —
पर मेरी जीत सुनिश्चित है!
तूफ़ानों से आँख मिलाकर
जो चलता है, वो वीर है!
जो अपमान पीकर भी बढ़े,
वही सच्चा रणधीर है!
आज अगर सब साथ नहीं,
तो क्या हुआ — मैं साथ हूँ!
अपने साहस, अपने विश्वास,
अपने कर्मों के साथ हूँ!
सुन लो दुनिया वालों तुम —
मेरा मौन संकेत है,
आने वाली गर्जना का
यह केवल पूर्वभेष है!
मैं गिरकर फिर उठ जाऊँगा,
मैं रुककर फिर बढ़ जाऊँगा,
हर तिरस्कार की चिंगारी से
अपना भविष्य गढ़ जाऊँगा!
क्योंकि —
मैं हार नहीं, हुंकार हूँ!
मैं मौन नहीं, तूफ़ान हूँ!
आज भले मैं चुप खड़ा हूँ,
पर कल स्वयं पहचान हूँ!
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