आज की युवा पीढ़ी, बदलती मर्यादा और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी(संवाद, संतुलन और संस्कार पर एक गहन चिंतन)
परिवर्तन के युग में मूल्य-संकट या मूल्य-पुनर्रचना?समाज कानूनों की जंजीरों से नहीं, मूल्यों, विश्वास और संबंधों की पवित्रता से बंधा चलता है। एक पीढ़ी अगली को केवल संपत्ति या सुविधाएँ नहीं सौंपती—वह दृष्टि, विवेक और मर्यादा का अमूल्य धरोहर देती है। जब यह हस्तांतरण संतुलित हो, सभ्यता फलती-फूलती है; यदि दरार पड़ जाए, तो सामाजिक विघटन की आहट सुनाई देती है।आज हम hyper-connected युग में हैं। स्मार्टफोन ने भौगोलिक दूरी मिटाई, किंतु भावनात्मक दूरी बढ़ा दी। शिक्षा के अवसरों का विस्तार हुआ—IIT, IIM से लेकर स्टार्टअप्स तक। समान अधिकारों की चेतना जागी; #MeToo जैसे आंदोलनों ने आवाज दी। लड़कियाँ न केवल पढ़ रही, बल्कि नेतृत्व कर रही हैं—कल्पना चावला से लेकर पीआर स्रीधरन तक के उदाहरण जीवंत हैं। लड़के भावुकता, साझेदारी और घरेलू जिम्मेदारियाँ सीख रहे हैं। ये परिवर्तन समाज की उन्नति के प्रमाण हैं।
फिर भी, गहन प्रश्न उभरते हैं:क्या आधुनिकता मर्यादा की जड़ें काट रही?क्या स्वतंत्रता को 'कुछ भी करो' की छूट समझ लिया?क्या प्रेम, मित्रता और रक्त-संबंधों की गरिमा पर संकट?स्कूल-कॉलेज-ऑफिस में सह-शिक्षा आवश्यक है। विवाद साथ का नहीं, दृष्टि का है।
मिसाल: मेट्रो में विपरीत लिंग को देखना सामान्य, किंतु असम्मानजनक टिप्पणी अनुचित। सोशल मीडिया ने रिश्तों को 'इंस्टेंट नूडल' बना दिया—त्वरित, सतही, प्रदर्शन-प्रधान। एक 'लाइक' आत्ममूल्य तय करता है। किशोरावस्था का मन जिज्ञासु और कमजोर होता है; बिना मार्गदर्शन के TikTok रील्स उसके गुरु बन जाती हैं।
विशेष चिंता रक्त-संबंधों की। भारतीय संस्कृति में 'मौसी', 'मामा', 'बुआ', 'चाचा' केवल नाम नहीं—विश्वास, सुरक्षा और नैतिक सीमाओं के प्रतीक हैं। यदि ये धुंधले पड़ें, पारिवारिक ताना-बाना ढीला पड़ता है।संतुलन जरूरी: पूरी युवा पीढ़ी को कलंकित न करें। लाखों युवा UPSC क्रैक कर रहे, स्टार्टअप चला रहे, स्वयंसेवा में लगे हैं। समस्या कुछ विषाक्त प्रवृत्तियों में है, जो संवाद से बदली जा सकती हैं।
यह लेख निंदानहीं, आत्मचिंतन है; हताशा नहीं, समाधान की आशा।
भाग 1: समस्या को समझना— भावनात्मक नहीं, विवेकपूर्ण दृष्टिआकर्षण स्वाभाविक, दिशा अनिवार्य
किशोरावस्था में हार्मोनल तूफान आता है—टेस्टोस्टेरोन, एस्ट्रोजन जागृत होते हैं।
आकर्षण जैविक सत्य है; इसे दबाना अव्यावहारिक। समस्या दिशाहीनता: अनियंत्रित आकर्षण अवसाद, ब्रेकअप या जोखिम (STI) लाता है।
उदाहरण: फूल की सुंदरता सराहें, किंतु बगीचे को उजाड़ न दें।
डिजिटल मीडिया का जाल
2025 के आंकड़ों में, भारत के 70% किशोर रोज 4+ घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं। रील्स-सीरीज (जैसे 'Mirzapur') रिश्तों को हिंसा-शारीरिकता से जोड़ती हैं। FOMO (Fear of Missing Out) तुलना जन्म देता है। घर में संवाद घटे, तो YouTube 'रिलेशनशिप एडवाइस' गुरु।
साथियों का दबाव
पीयर प्रेशर किशोर मस्तिष्क के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (निर्णय केंद्र) के अविकसित होने से तीव्र। यदि ग्रुप 'पार्टी कल्चर' या 'हुकअप' को कूल माने, तो अनुकरण। अध्ययन: 40% किशोर साथियों के दबाव में नशे की ओर।
स्वतंत्रता की अधूरी परिभाषा
संविधान अनुच्छेद 21 स्वतंत्रता देता है, किंतु जिम्मेदारी बंधन। सच्ची स्वतंत्रता: आत्मनिर्णय + नियंत्रण + परिणाम स्वीकार। बिना, यह अराजकता—जैसे ट्रैफिक सिग्नल तोड़ना दुर्घटना बुलाता।
भाग 2: आधुनिकता बनाम मर्यादा—सह-अस्तित्व संभव?
आधुनिकता सशक्तिकरण है: STEM में लड़कियों का 48% प्रतिनिधित्व (2024 डेटा)। मर्यादा चार स्तंभ: स्व-सम्मान, पर-सम्मान, संतुलन, सीमाएँ। यह दमन नहीं, गरिमा का कवच।
महाकाव्यों से: रामायण में राम की मर्यादा (सीता त्याग), महाभारत में द्रौपदी चीरहरण मर्यादा-भंग का फल। ये अतीत नहीं, शाश्वत सबक।
आधुनिक उदाहरण: एपीजे अब्दुल कलाम—आधुनिक वैज्ञानिक, सांस्कृतिक मूल्यवान।
भाग 3: रिश्तों में मर्यादा क्यों धुंधली?संयुक्त परिवार लुप्त—
1950 में 80% संयुक्त, आज 20%। व्यवहार-सीख घटा।चर्चा अभाव—'क्यों' न समझाएँ, तो मर्यादा आदेश लगे।मीडिया प्रभाव—बॉलीवुड गाने (“कमर लौटा रे”) आकर्षण सामान्यीकृत। संवाद खाई—70% किशोर सेक्स एजुकेशन बाहर से लेते (NFHS-5)।
भाग 4: युवाओं से संवाद की कलाआरोप से भागेंगे, समझ से जुड़ेंगे।
प्रश्न-आधारित: “स्वतंत्रता तुम्हारे लिए क्या?”
“हर आकर्षण प्रेम?”परिभाषाएँ:
आकर्षण (शारीरिक),
प्रेम (भावनात्मक),
वासना (आवेग),
मित्रता (सम्मान)।
सहमति: “हाँ बिना आगे न”—#ConsentMatters।
व्यवहार फोकस: “यह काम गलत, तुम नहीं।
”भाग 5: अभिभावकों की जिम्मेदारियाँ
विश्वास आधार—डर छिपावे लाएगा।
उदाहरण: घर में “बेटी” शब्द सम्मान से।
बेटों को: “स्त्री = इंसान, न वस्तु”; पोर्न प्रभाव समझाएँ।
बेटियों को: “ना” का हक, बॉडी पॉजिटिविटी।
डिजिटल: ऐप्स से 2 घंटा लिमिट, फैमिली चेक-इन।
व्यस्तता: NCC, डिबेट, मेडिटेशन—ऊर्जा चैनलाइज।
रक्त-संबंध: “ये रिश्ते सुरक्षा कवच”; स्टोरी शेयर।
भाग 6: विद्यालय-समाज की भूमिकाकक्षाएँ:
नैतिकता + लाइफ स्किल्स (CBSE गाइडलाइन)।कार्यशालाएँ: जेंडर सेंसिटिविटी, काउंसलिंग।गतिविधियाँ: स्पोर्ट्स, नाटक—टीमवर्क सिखाएँ।
समाज: NGO जैसे Teach For India से सहयोग।
भाग 7: आत्ममंथन के प्रश्न
स्वतंत्रता = मनमानापन या जिम्मेदारी?
मेरी आजादी दूसरे का दुख दे तो?
आकर्षण ही प्रेम? (उत्तर: नहीं, प्रेम गहरा।)
मित्रता बिना सीमा?
इंस्टा जीवन असली?
सम्मानजनक नजर?
व्यवहार आत्मसम्मान बढ़ाए?
नशा ताकत या जाल?
भविष्य प्लान?
भाग 8: नैतिकता और आत्मनियंत्रण
नैतिकता बाहरी डंडे से नहीं, आंतरिक ज्योति से।
APA अध्ययन: सीमाएँ वाले किशोर 30% कम जोखिम।
स्पष्टता: “उचित-अनुचित क्यों?”—पालन सहज।
विस्तृत निष्कर्ष:
संतुलन ही कुंजी समस्या संतुलनहीनता में:
स्वतंत्रता बिना मर्यादा = अराजकता;
मर्यादा बिना स्वतंत्रता = ठहराव।
फॉर्मूला: स्वतंत्रता + जिम्मेदारी;
आधुनिकता + संस्कार;
संवाद + अनुशासन।
युवा शक्ति हैं—दिशा दें। माता-पिता विश्वास दें। स्कूल चरित्र गढ़ें। समाज सहयोग करे।
मर्यादा चरित्र का मुकुट है। संतुलन में राष्ट्र की स्थिरता, पीढ़ियों का उज्ज्वल कल।
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