हे पवनसुत महावीर

🙏 संकल्प
हे पवनसुत महावीर,
मेरे जीवन की दुर्बलता, अहंकार और भय को
अपने चरणों में अर्पित करता हूँ।
मुझे ‘मैं’ से मुक्त कर,
आप में आप में मिला दीजिए।

🎶 प्रार्थना–भजन
स्थायी (मुखड़ा)

हे महाबीर, मुझे आप में मिला दीजिए,
मैं मैं न रहूँ, बस आप ही बना दीजिए।
मेरे बल–बुद्धि–अभिमान सब चरणों में धर,
दास बनाकर प्रभु, सेवा में रमा दीजिए॥

अंतरा 1 — बल और विवेक

जन्म साधारण पाया, राहें कठिन रहीं,
हर मोड़ पर परीक्षा, हर जीत ऋण रही।
गिरकर भी जो उठा, तेरे नाम से उठा,
मेरी हर साँस में प्रभु, तेरा ही गुण गुंथा॥
🔸 सिद्ध चौपाई (पाठ)
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं,
हरहु कलेस विकार॥

अंतरा 2 — वाणी और सेवा

धन न दिया जग ने, वाणी तूने दी,
शब्दों में सत्य रख, पहचान तूने दी।
कलम हो या वचन, सब तेरी आज्ञा से,
जो भी लिखा–कहा, सेवा तेरे नाम से॥
🔸 सिद्ध चौपाई (पाठ)
विद्यावान गुनी अति चातुर,
राम काज करिबे को आतुर॥

अंतरा 3 — संकट नाश

पीड़ा आई जीवन में, धैर्य तूने दिया,
आँधियों में भी घर को, तूने ही थाम लिया।
जब सब द्वार बंद लगे, तू द्वार बन गया,
डूबती नैया का प्रभु, तू पार बन गया॥
🔸 सिद्ध चौपाई (पाठ)
संकट कटै मिटै सब पीरा,
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

अंतरा 4 — रोग, भय, संशय

रोग भी आए, भय भी, संशय भी घिरे,
तेरे नाम के आगे सब बंधन बिखरे।
शोर से मन थका तो, मौन तूने दिया,
ठहरकर जीना प्रभु, तूने ही सिखा दिया॥
🔸 सिद्ध चौपाई (पाठ)
नासै रोग हरै सब पीरा,
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

अंतरा 5 — पूर्ण समर्पण

न नाम की चाह रखूँ, न मान का भार,
राम–दूत के चरणों में बस मेरा संसार।
जैसे हनुमत राम में रहे पूर्ण लीन,
वैसे मुझे भी कर दो आप में विलीन॥
🔸 सिद्ध चौपाई (पाठ)
राम दुआरे तुम रखवारे,
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥


दोहा
पवन तनय संकट हरन,
मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित,
हृदय बसहु सुर भूप॥

🌺 समापन प्रार्थना (दोहा)
मैं मैं मिटे, तू तू हो जाए,
यही मेरी अरदास।
दास बने रहूँ जीवन भर,
हे बजरंग, मेरे श्वास॥

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