भय-विजय” (रश्मिरथी शैली में)
मत पूछो किसका रक्त जगा है,
किसने ज्वाला भड़काई है,
यह रण केवल बाह्य नहीं है,
भीतर भी लड़ाई है।
तुम धनवान, विद्वान सही हो,
पर क्या साहस जागा है?
यदि भय बैठा हृदय-गुहा में,
तो सब कुछ ही भागा है!
न मान बचेगा, न सम्मान,
न भूमि, न तेरा अधिकार,
जो डर के आगे झुक जाता,
उसका जीवन बेकार!
उठो मनुज! यह काल पुकारे,
अब भी समय संभल जाओ,
जो अन्याय सामने दिखता,
उससे डटकर टकराओ!
स्मरण करो हनुमान जी की शक्ति,
जब भय को उन्होंने हर डाला,
लांघ सागर, फाड़ अंधेरा,
असंभव को भी कर डाला!
देखो भगवान शिव का तांडव,
जब क्रोध धर्म बन जाता है,
अधर्मों की जड़ जलती है,
जब निर्भय मन जग जाता है!
ना भूलो छत्रपति संभाजी महाराज को,
जिनका शीश कटा, पर झुका नहीं,
वज्र-हृदय था धर्म हेतु,
कठिन समय में रुका नहीं!
जाग उठो, बन जाओ ज्वाला,
जैसे मंगल पांडे जलते थे,
एक चिंगारी बनकर भी,
साम्राज्य हिला कर चलते थे!
सुनो पुकार चंद्रशेखर आज़ाद की,
“आज़ाद रहूँगा, यह प्रण है!”,
मृत्यु सामने खड़ी रही,
पर अडिग रहा वो मन है!
याद करो भगत सिंह का हँसना,
जब फांसी का फंदा चूमा,
मृत्यु को भी जीत लिया,
जब सत्य का दीपक झूमा!
और सुभाष चंद्र बोस का आह्वान—
“खून दो, मैं आज़ादी दूँ!”,
जो डट गया वह अमर हुआ,
जो डर गया वह क्या ही जिए!
आज नहीं वह काल पुराना,
पर युद्ध अभी भी जारी है,
रूप बदलकर सामने खड़ा,
अधर्म अभी भी भारी है।
गुंडे, अत्याचारी, दंभी,
सत्ता के मद में चूर खड़े,
सत्य दबा है, न्याय रुका है,
निर्बल क्यों मजबूर खड़े?
कब तक चुप रह जाएगा तू?
कब तक यूँ डर खाएगा?
आज नहीं जो डट पाया,
कल सब कुछ खो जाएगा!
लड़—जब तक भय टूट न जाए!
लड़—जब तक स्वर फूट न जाए!
लड़—जब तक रक्त न गरजे!
लड़—जब तक सत्य न सरजे!
तू ज्वाला बन, तू गर्जन बन,
तू प्रलय का उद्घोष बने,
तेरे साहस की आंधी से,
हर अन्यायी खामोश बने!
फिर देखेगा वह दृश्य अनोखा—
भय तुझसे ही कांपेगा,
तेरे तेज के सम्मुख आकर,
छाया बनकर भागेगा!
⚔️ अंतिम घोष
जो डर गया, वह मर गया—
यह सत्य सदा उद्घोषित है,
जो डट गया रणभूमि में,
वह इतिहास में अंकित है।
उठो, जलो, प्रज्वलित बनो,
अपने भाग्य के निर्माता बनो,
डर को आज समाप्त करो—
और स्वयं “विजय-गाथा” बनो! 🔥
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