"हल्ला बोल – जनगर्जना”


स्वार्थों के अंधकार तले, कुचली जाती जनता,
सिंहासन के मद में डूबी, रोती-रोती जनता।
वोटों के व्यापार में बँटता, हर मानव सम्मान,
जागो अब, वरना बिक जाएगा, पूरा हिंदुस्तान।

भ्रष्टाचार की ज्वाला में, जलता हर विश्वास,
ईमानों की राख उड़ाती, लोभ-लिप्सा की प्यास।
कागज़ पर विकास खड़ा है, धरती पर है शून्य,
किससे पूछे न्याय यहाँ—कहाँ गया वो पुण्य?

भाई-भतीजा राज बढ़ा, योग्यता लाचार,
दरवाज़ों पर ठोकर खाता, हर प्रतिभा बेकार।
मामा-चाचा के नामों पर, बँटती हर पहचान,
मेहनत का अपमान यहाँ, बन बैठा अभियान।

महँगी शिक्षा, महँगाई ने, तोड़े कितने स्वप्न,
मध्यमवर्ग का युवक यहाँ, जीता हर दिन तप।
गरीब घरों के लाल फिरें, लेकर डिग्री हाथ,
रोज़गार के द्वार बंद हैं, सूना हर एक पथ।

भय का शासन छा गया, काँपे हर इंसान,
सच बोलो तो दंड मिले, झूठ बने सम्मान।
तुष्टिकरण की आग में जलता, न्याय-धर्म का मर्म,
नीति बनी है मौन यहाँ, सत्ता बनी अधर्म।

नैतिकता के दीप बुझें, अंधा हुआ समाज,
चरित्र गिरा बाजार में, बिकता हर अंदाज़।
बेटियों की राहों में भी, छाया गहरा घात,
सत्ता की चुप्पी पूछ रही—किसका है ये हाथ?

जब-जब जनमन जाग उठा, टूटा हर अभिमान,
सिंहासन के पांव हिले, बदला हर विधान।
सत्य अगर अंगार बने, फूटे जन-आक्रोश,
टूटेंगे अन्याय सभी, मिटेगा हर संतोष।

उठो युवा, जागो जन-जन, तोड़ो हर जंजाल,
सत्य-न्याय की राह पकड़ो, बदलो ये हालात।
कुर्सी सेवा का साधन है, मत बनाओ शान,
जनता ही जनार्दन है, जनता ही भगवान।

हल्ला बोल—अन्याय पर, वज्र समान प्रहार!
हल्ला बोल—भ्रष्टाचार पर, जागे जन-संसार!
हल्ला बोल—उस सत्ता पर, जो भूली हर मान!
जन-जन की हुंकार बने—नया हिंदुस्तान!

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