जीत से आगे—मनुष्यता का मंत्र
जीत अगर किसी अश्रु पर जमे,
तो वह मुकुट भी शूल बने,
मुस्कान छीन जो ताज सजे,
वह वैभव भी व्यर्थ तले।
रुककर देखो उस चेहरे को,
जिसमें पीड़ा की रेखा है,
विजय-घोष से पहले सुन लो—
वह मौन भी एक लेखा है।
शक्ति नहीं वह जो झुका दे,
शक्ति वह जो उभार करे,
जो अपनी ज्योति से जगमग कर
हर हृदय में उजियार भरे।
उत्सव हो तो ऐसा हो,
जहाँ न कोई लघु लगे,
अपनी ऊँचाई की छाया में
कोई भी न धुंधला लगे।
मौन विनय की मृदु वाणी में
जो गौरव का संचार करे,
वही असली सामर्थ्य है—
जो सबको समान आधार करे।
नेता वह जो वेदना पढ़े,
नयनों की गहराई में,
जो चल पड़े उस राह स्वयं
जहाँ पीड़ा हो परछाई में।
जो ठहर सके उस मोड़ पर
जहाँ सब राहें मुड़ जाती हैं,
और थामे हाथ उन लोगों का
जिनकी सांसें जुड़ जाती हैं।
आगे बढ़ना सरल बहुत है,
पर मुड़ना ही तप का सार,
जो पीड़ा की ओर बढ़े—
वही सच्चा पथ-आधार।
जीत वही जो हृदय जीते,
शक्ति वही जो साथ चले,
नेतृत्व वह जो हर पीड़ित को
अपने संग विश्वास मिले।
आओ ऐसी रीत रचें हम,
जहाँ न कोई तिरस्कृत हो,
हर उत्सव में हर मन शामिल—
कोई भी न वंचित हो।
इंसानियत का दीप जले जब,
तभी विजय का मान हो,
वरना हर उपलब्धि भी
एक रिक्त-सा सम्मान हो।
अंतिम स्वर
न मुकुट बड़ा, न ताज बड़ा—
सबसे ऊँचा व्यवहार है,
जो दिल जीत ले हर दिल को,
वही सच्चा सरताज है।
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