समय की चाल : जागरण-गाथा


समय की चाल प्रचंड है,
न कोमल है, न मंद है,
यह न्याय-अग्नि का दंड है,
यह सृष्टि का अनुबंध है।

न राजा रुकता, न रंक ठहरता,
न विजय-नाद यहाँ ठहरता,
जो आज गगन पर चढ़ता है,
कल धूलि में ही बिखरता।

इतिहास के पन्ने बोल उठे —
“कहाँ गया वह अभिमान?”
क्षण भर जिसने गर्जन किया,
फिर खो बैठा पहचान।

अधर्म जला क्षणिक दीप-सा,
अहंकार गिरा निपात-सा,
समय की धारा जब बही,
सब बह गया प्रभात-सा।

जो सत्य-पथिक अडिग रहा,
उसका ही दीप जला सदा,
ग्रंथों की वाणी गूँज उठी —
“सत्य अमर है, बाकी क्षणभंगुर सदा।”

जीवन है श्वासों की माला,
हर मोती में भाग्य का जाला,
पाप-पुण्य का सूक्ष्म लेखा,
समय रखे हर इक पाला।

सुख आया — तो संयम धर,
दुःख आया — तो मत तू डर,
दोनों क्षणिक अतिथि जग में,
दोनों ही शिक्षक अमर।

यश मिला — विनम्र रहो,
अपयश मिला — तो स्थिर रहो,
आज जिसे जयकार मिली,
कल उसको भी धिक्कार सहो।

परिस्थिति जब वज्र बने,
संघर्ष अग्नि-सम प्रखर बने,
तब मत झुक, मत टूट मनुज,
तू ही अपना शंकर बने।

बीज दबा जब अंध तले,
तभी वटवृक्ष निकलता है,
मानव जब तपता विपदा में,
तभी चरित्र सँभलता है।

जो विपत्ति से भाग गया,
वह समय से हार गया,
जो विपत्ति से लड़ा डटा,
वह इतिहास में उतर गया।

जीवन-मरण दो तट जैसे,
एक हँसाए, एक रुलाए,
समय-नदी का सत्य यही —
दोनों को संग बहाए।

आज मिला जो श्वास तुझे,
कल शायद अवसर ना हो,
कर्म कर ऐसा जग में तू,
जिस पर पछतावा ना हो।

समय न मित्र, न शत्रु यहाँ,
यह दर्पण है चरित्र का,
देर भले हो निर्णय में,
पर न्याय सदा करता है।

हे मानव! नेत्र खोल जरा,
क्यों मोह-निद्रा में डूबा पड़ा?
समय पुकारे, कर्म पुकारे,
क्यों भाग्य भरोसे अड़ा खड़ा?

ले संकल्प — सत्य जिएँगे,
अन्याय से न डरेंगे हम,
पाप-प्रलोभन त्याग कर,
पुण्य-पथ पर ही बढ़ेंगे हम।

🔥
समय चल रहा है अविराम…
प्रश्न यही हर श्वास पूछती —

तू इतिहास बनेगा?
या इतिहास पढ़ेगा मात्र?

जो जाग गया — वही अमर है,
जो सो गया — वही पराजित।
समय की चाल अटल सत्य है,
जागरण ही मनुष्य की विजय-घोषित। 🔥

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Consistency Se Zero Se Banta Hai Hero

🇮🇳 "भारत अपनी बेटियों पर गर्व करता है" 🇮🇳 ✍️With Respect & Pride— Rakesh Mishra

🌿 कर्म पथ (प्रेरक शैली) 🌿