“अभिमन्यु: जो हर युग में जन्म लेता है”
(4/4 ताल, हर पंक्ति में )
ढोल गरजा! रण दहका! काँपी धरती लाल!
बीच व्यूह में खड़ा अकेला—धर्मपुत्र विक्राल!
एक ओर थे कुटिल कौरव—
छल का काला जाल,
एक ओर था सत्य अकेला—
तेजस्वी, निष्कल, निष्काल।
धनुष उठाया बालक ने तो काँपा अधर्म-व्यूह,
तीरों की ज्वाला में जलता कौरव-गर्व-वृक्ष।
पर जब टूटा धनुष अचानक—
टूट गया रथ-चक्र,
काल ठिठक कर देखने आया—
कैसा यह प्रहर!
निरस्त्र खड़ा वह रक्त-स्नात,
फिर भी दृष्टि प्रखर,
मानो अग्नि देह में धधके,
मानो सूर्य अमर।
एक नहीं थे सामने उसके—
सातों एकसाथ!
धर्म भुलाकर टूट पड़े वे—
त्याग नियम की राह!
पहला वार पड़ा जब उस पर—
धरती करुण पुकार,
दूजा वार पड़ा तो रोया—
नीला अम्बर पार।
तीजा वार—काँपा इतिहास!
चौथा—लज्जित काल!
पाँचवाँ वार पड़ा तो जैसे
फट गया अंतर्मन जाल।
छठा वार—माँ सुभद्रा का
काँप उठा हृदय,
सातवाँ वार लगा तो रोई
स्वयं विजय की नय।
रक्त बही तो लगा मानो
गंगा उलटी बहती,
हर बूँद कहती— “देखो जग!
वीरता यूँ ही रहती!”
न ढाल रही, न शस्त्र शेष,
न रथ, न सारथी पास,
फिर भी मुख पर ज्वाला ऐसी—
जग से ऊँचा प्रकाश।
गिरते-गिरते गरजा वह—
स्वर में बिजली धार,
“मारो तन को, धर्म अजर है,
सत्य अमर हुंकार!
आज मुझे तुम घेर गिराओ,
पर सुन लो अत्याचार!
हर संतति के रक्त में जागेगा
मेरा ही अंगार!
जब-जब होगा अन्याय जगत में,
जब-जब रोए न्याय,
एक अभिमन्यु जन्मेगा फिर—
देने प्राण उपाय!”
और उसी क्षण नभ फट पड़ा—
बिन मेघों की वर्षा,
कौरव-शिविर में जीत नहीं थी—
था भीतर का शोक-दंशा।
जीत गए वे संख्या बल से—
पर हारे इतिहास,
धर्म गिरा था रक्त-धरा पर—
पर हुआ अमर प्रकाश।
🔥 अंतिम हुंकार (मंच पर ऊँचे स्वर में) 🔥
मत समझो वीरता आयु है,
मत समझो बल शस्त्र,
धर्म जहाँ निर्भीक खड़ा हो—
वहीं झुकेगा दुष्ट!
अभिमन्यु कोई कथा नहीं—
वह चेतन ज्वालामुखी है,
अन्यायों पर मौन जहाँ हो—
वहीं से हार शुरू हुई है!
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