उचित मार्ग स्वयं चुनो, नहीं तो अनुचित मार्ग तुम्हें स्वयं चुन लेगा

भूमिका (भूमिका एवं संदर्भ)

मनुष्य जीवन एक यात्रा है। यह यात्रा केवल जन्म से मृत्यु तक की भौतिक दूरी नहीं, बल्कि विचारों, निर्णयों, कर्मों और संस्कारों की गहन प्रक्रिया है। हर क्षण मनुष्य किसी न किसी मार्ग के चयन के सामने खड़ा होता है। यही कारण है कि शास्त्र, संत और समाज बार-बार मनुष्य को उचित मार्ग चुनने की प्रेरणा देते हैं। क्योंकि यदि मनुष्य सजग होकर सही मार्ग नहीं चुनता, तो परिस्थितियाँ, वासनाएँ, लालच, भय और अज्ञान मिलकर उसे अनुचित मार्ग पर धकेल देती हैं।

यह कथन— “उचित मार्ग स्वयं चुनो, नहीं तो अनुचित मार्ग तुम्हें स्वयं चुन लेगा”— केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन का शाश्वत सत्य है। यह सत्य वेदों, उपनिषदों, गीता, रामायण, महाभारत, संत साहित्य और सामाजिक अनुभवों में बार-बार प्रतिध्वनित होता है।

यह लेख शास्त्र-संगत, धर्म-संगत और समाज के व्यवहारिक उदाहरणों के माध्यम से इस विचार को विस्तार से प्रस्तुत करता है, ताकि पाठक केवल पढ़े नहीं, बल्कि आत्मचिंतन कर अपने जीवन का मार्ग स्वयं निर्धारित कर सके।


1. मार्ग का अर्थ और उसका महत्व

‘मार्ग’ केवल सड़क या रास्ता नहीं है। मार्ग का अर्थ है—

  • विचारों की दिशा
  • कर्मों की प्रवृत्ति
  • जीवन की प्राथमिकताएँ
  • निर्णय लेने की क्षमता

मनुष्य का प्रत्येक निर्णय उसके जीवन की दिशा तय करता है। शास्त्र कहते हैं—

"यथा बुद्धिस्तथा वाणी, यथा वाणी तथा क्रिया"

अर्थात जैसी बुद्धि होगी, वैसी वाणी होगी और जैसी वाणी होगी, वैसा ही कर्म होगा। इसीलिए मार्ग का चयन बुद्धि से होता है और बुद्धि का निर्माण संस्कारों से।

यदि बुद्धि जाग्रत है, तो मनुष्य उचित मार्ग चुनता है। यदि बुद्धि सुप्त है, तो अनुचित मार्ग स्वयं उसे घेर लेता है।


2. शास्त्रों में मार्ग चयन की अवधारणा

(क) श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश

गीता का सम्पूर्ण उपदेश मनुष्य को धर्म के मार्ग पर चलने के लिए है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—

"उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्" (गीता 6.5)

अर्थात मनुष्य स्वयं अपना उद्धार करे, स्वयं को पतन की ओर न ले जाए।

यहाँ स्पष्ट है—उद्धार और पतन, दोनों की जिम्मेदारी स्वयं मनुष्य की है। यदि वह सही मार्ग नहीं चुनेगा, तो पतन का मार्ग उसे स्वयं चुन लेगा।

(ख) कर्म और विकल्प

गीता कहती है—

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन"

मनुष्य को कर्म करने का अधिकार है, लेकिन कर्म का चयन उसी के हाथ में है। अनुचित कर्म का फल भी अनुचित ही होता है।


3. रामायण में उचित और अनुचित मार्ग

रामायण मानव जीवन की आदर्श मार्गदर्शिका है।

(क) श्रीराम – उचित मार्ग का प्रतीक

वनवास, त्याग, मर्यादा और सत्य— श्रीराम ने हर परिस्थिति में उचित मार्ग चुना। उन्हें ज्ञात था कि वनवास कठिन है, फिर भी उन्होंने धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा।

(ख) रावण – अनुचित मार्ग का परिणाम

रावण विद्वान था, शिवभक्त था, परंतु उसने अहंकार, काम और लोभ का मार्ग चुना। परिणामस्वरूप, वही अनुचित मार्ग उसका विनाश बन गया।

यह उदाहरण सिद्ध करता है कि ज्ञान होते हुए भी यदि उचित मार्ग न चुना जाए, तो विनाश निश्चित है।


4. महाभारत: चुनाव और परिणाम

महाभारत का युद्ध वास्तव में शस्त्रों का नहीं, बल्कि मार्गों का संघर्ष था।

(क) युधिष्ठिर का धर्म मार्ग

अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी युधिष्ठिर ने धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। सत्य और न्याय उनके जीवन की धुरी रहे।

(ख) दुर्योधन का अधर्म मार्ग

दुर्योधन के पास भी विकल्प थे, पर उसने ईर्ष्या और अहंकार का मार्ग चुना। परिणामस्वरूप, उसका सम्पूर्ण वंश नष्ट हो गया।


5. संत साहित्य में मार्ग चयन

(क) कबीरदास जी

कबीर कहते हैं—

"धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय"

संत कबीर संयम और विवेक के मार्ग पर चलने की सीख देते हैं। जल्दबाजी और लोभ का मार्ग अनुचित है।

(ख) तुलसीदास जी

"परहित सरिस धरम नहि भाई"

जो परहित का मार्ग चुनता है, वही सच्चे धर्म का अनुयायी है।


6. धर्म-संगत दृष्टिकोण

धर्म का अर्थ केवल पूजा नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देना है।

धर्म-संगत मार्ग में—

  • सत्य
  • अहिंसा
  • संयम
  • करुणा
  • कर्तव्य

यदि मनुष्य धर्म-संगत मार्ग नहीं चुनता, तो अधर्म—

  • भ्रष्टाचार
  • हिंसा
  • असंयम
  • स्वार्थ

स्वतः जीवन में प्रवेश कर लेता है।


7. सामाजिक उदाहरण

(क) युवा वर्ग

यदि युवा अनुशासन, अध्ययन और सेवा का मार्ग नहीं चुनता, तो नशा, अपराध और अवसाद उसे स्वयं चुन लेते हैं।

(ख) व्यवसाय

यदि व्यापारी ईमानदारी का मार्ग नहीं चुनता, तो शॉर्टकट, धोखा और भ्रष्टाचार उसके व्यवसाय को खोखला कर देते हैं।

(ग) पत्रकारिता

यदि पत्रकार सत्य और निष्पक्षता का मार्ग नहीं चुनता, तो सनसनी, झूठ और पक्षपात उसे स्वयं चुन लेते हैं।


8. आज का युग और मार्ग की चुनौती

आज सूचना की अधिकता है, पर विवेक की कमी। सोशल मीडिया, भोगवाद और त्वरित सफलता की चाह मनुष्य को अनुचित मार्ग की ओर खींच रही है।

ऐसे समय में—

  • सत्संग
  • शास्त्र अध्ययन
  • आत्मचिंतन

अत्यंत आवश्यक हैं।


9. सत्संग का महत्व

शास्त्र कहते हैं—

"सत्संगत्वे निस्संगत्वं"

अर्थात सत्संग से आसक्ति का नाश होता है। सत्संग मनुष्य को उचित मार्ग चुनने की शक्ति देता है।


10. आत्मचिंतन और विवेक

उचित मार्ग चुनने के लिए आत्मचिंतन अनिवार्य है। प्रतिदिन स्वयं से पूछना चाहिए—

  • मेरा आज का कर्म धर्म-संगत है या नहीं?
  • मेरा निर्णय किसी का अहित तो नहीं कर रहा?

उपसंहार (निष्कर्ष)

मनुष्य का जीवन विकल्पों की श्रृंखला है। हर मोड़ पर उचित और अनुचित मार्ग खड़े होते हैं। यदि मनुष्य जागरूक होकर उचित मार्ग चुन लेता है, तो जीवन सार्थक, शांत और सफल बनता है।

परंतु यदि वह निर्णय टालता है, विवेक को दबाता है और केवल परिस्थितियों के भरोसे चलता है, तो अनुचित मार्ग उसे स्वयं चुन लेता है—और तब पछतावे के अतिरिक्त कुछ शेष नहीं रहता।

अतः शास्त्र, संत और समाज का एक ही संदेश है—

उचित मार्ग स्वयं चुनो, क्योंकि जीवन में तटस्थता नहीं होती। या तो तुम मार्ग चुनोगे, या मार्ग तुम्हें चुन लेगा।


यह लेख आत्मचिंतन, सत्संग और शास्त्राधारित जीवन के लिए एक विनम्र प्रयास है।

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