एक मुस्कान की लय
वह सामने बैठी, हँसकर मुस्काई,
जैसे ठहर गई हो पल की परछाईं।
कहने को कुछ भी खास न था,
पर हर बात मन में उतर आई।
उम्रों के बीच एक लंबा फासला,
फिर भी शब्दों ने दूरी न मानी।
नज़रें झुकीं, लहजा शान्त रहा,
फिर भी दिल ने कहानी जानी।
हँसते-हँसते नंबर बढ़ा दिया,
जैसे कोई साधारण सी बात।
पर उस एक छोटे से पल ने,
बदल दी मेरी पूरी रात।
अब खूबसूरती नहीं सताती,
अब याद आती हैं उसकी बातें।
हर शब्द, हर मुस्कान उसकी,
दिन में भी सपनों सी आती-जाती।
चेहरा आँखों में नहीं रहता,
मन के भीतर घूम जाता है।
बिना चाहत, बिना किसी आस के,
एक एहसास छोड़ जाता है।
न यह प्रेम, न कोई चाह,
न रिश्ते का कोई नाम।
बस एक मुलाक़ात की लय है,
जो दिल में बजती रहती है—
हर शाम।
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वह सामने हँसी तो ख़ामोशी इबादत बन गई,
उम्रों की दूरी भी उस पल में राहत बन गई।
न चाह थी, न कोई सवाल, न इज़हार की ज़रूरत,
बस एक मुस्कान मिली—
और रूह को आदत बन गई।
वह सामने बैठी, और मैं अपने भीतर उतर गया,
न उम्र रही, न दूरी—सब भ्रम बिखर गया।
उसकी हँसी ने कुछ कहा नहीं, फिर भी समझा दिया,
जो ढूँढ रहा था बाहर—
वह मुझे मुझमें ही मिल गया।
वह हँसी—
और कुछ नहीं हुआ,
सिवाय इसके कि
मन की अँधेरी तह में
एक हल्की-सी रौशनी
ठहर गई।
वह हँस के बैठी सामने, लम्हा ठहर गया,
उम्रों का फ़ासला था, पर दिल किधर गया।
यूँ ही बढ़ा दिया उसने एक नंबर मुस्कुरा के,
अब हर ख़याल में बस वही चेहरा उतर गया।
वह हँसी सामने बैठकर, मन ठहर-सा गया,
उम्रों का फासला था, फिर भी दिल जुड़-सा गया।
नंबर भी मुस्कुराकर यूँ ही दे दिया उसने,
अब हर बात, हर अदा उसकी—
दिमाग में घूम-सा गया।
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