मनुष्य! जाग… तेरे भीतर हनुमान सो रहे हैं
मनुष्य! जाग… तेरे भीतर हनुमान सो रहे हैं
यह लेख नहीं है। यह ललकार है।
यह अंतरात्मा को झकझोरने वाली पुकार है।
जब-जब मानव कहता है —
“मैं कमजोर हूँ”,
“मेरे बस का नहीं”,
“परिस्थिति बड़ी है” —
तब-तब उसके भीतर का हनुमान मौन हो जाता है।
सुंदरकांड इसलिए नहीं रचा गया कि हम केवल पाठ करें,
बल्कि इसलिए कि हम परिवर्तित हों।
🔥 पहला प्रहार: डर पर
हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं और कहते हैं —
“प्रबिसि नगर कीजे सब काजा,
हृदयँ राखि कोसलपुर राजा।”
यह केवल मंत्र नहीं,
यह मानसिक युद्ध की रणनीति है।
अर्थ यह नहीं कि लंका छोटी थी,
अर्थ यह है कि हनुमान बड़े थे।
आज मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या शत्रु नहीं,
डर है।
डर — असफलता का,
डर — समाज का,
डर — अपमान का।
जब तक हृदय में राम नहीं,
तब तक हर नगर लंका है।
और जब हृदय में राम हैं,
तो लंका भी साधारण है।
👉 हनुमान भीतर तब जागते हैं,
जब डर बाहर भागता है।
🔥 दूसरा प्रहार: आलस्य और आराम पर
हनुमान कहते हैं —
“राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम॥”
यह पंक्ति आरामप्रिय मनुष्य के लिए
सीधी चोट है।
आज लोग कहते हैं —
“पहले सेटल हो जाऊँ”
“पहले टाइम मिले”
“पहले मूड बने”
हनुमान कहते हैं —
👉 पहले कर्तव्य पूरा कर।
जिसके जीवन में कोई बड़ा उद्देश्य नहीं,
वह जल्दी थक जाता है।
और जिसके जीवन में राम-काज है,
वह थककर भी चलता है।
👉 हनुमान आलस्य के नहीं,
अग्नि के देवता हैं।
🔥 तीसरा प्रहार: आत्म-संदेह पर
हनुमान का चरित्र बताता है —
“साहस सुमति सकल गुन गहना,
राम कृपा सुत सुलभ सुहाना।”
साहस + विवेक = विजय
साहस – विवेक = विनाश
विवेक – साहस = कायरता
आज मनुष्य या तो बहुत सोचता है
या बहुत डरता है।
हनुमान दोनों नहीं थे।
वे जानते थे —
“मैं कौन हूँ, और किसके लिए हूँ।”
👉 जिस दिन मनुष्य अपनी पहचान
अपने डर से नहीं,
अपने कर्तव्य से जोड़ लेता है —
उसी दिन हनुमान जागते हैं।
🔥 चौथा प्रहार: अहंकार और मोह पर
तुलसीदास चेतावनी देते हैं —
“राम नाम बिनु गिरा न सोहा,
देखु विचारि त्यागि मद मोहा।”
आज मनुष्य बोलता बहुत है,
पर उसके शब्द खोखले हैं।
ज्ञान का अहंकार,
पैसे का घमंड,
पद का नशा —
ये सब हनुमान को सुला देते हैं।
हनुमान महान थे,
पर कभी महान दिखने का प्रयास नहीं किया।
👉 जहाँ अहंकार टूटता है,
वहीं शक्ति प्रकट होती है।
🔥 पाँचवाँ प्रहार: चिंता और परिणाम-भय पर
जब मन विचलित हो,
तो यह वाक्य गूंजना चाहिए —
“होइहि सोइ जो राम रचि राखा,
को करि तर्क बढ़ावै साखा।”
यह भाग्य की बात नहीं,
यह मानसिक स्वतंत्रता की बात है।
इसका अर्थ है —
👉 तू कर्म कर, परिणाम राम पर छोड़।
जो परिणाम से डरता है,
वह पूरा प्रयास नहीं करता।
हनुमान पूर्ण प्रयास करते थे,
क्योंकि उन्हें परिणाम की चिंता नहीं थी।
🔥 छठा प्रहार: अंदर की दुर्बलताओं पर
हनुमान की प्रार्थना आज भी प्रासंगिक है —
“बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं,
हरहु कलेस विकारहिं रोहीं।”
यह प्रार्थना बताती है कि
सच्चा योद्धा पहले
अपने भीतर के शत्रुओं से लड़ता है।
काम, क्रोध, लोभ, मोह —
ये रावण से बड़े शत्रु हैं।
👉 जब मनुष्य अपने भीतर युद्ध जीत लेता है,
बाहरी युद्ध सरल हो जाता है।
🔥 अंतिम उद्घोष: हनुमान जागरण
सुंदरकांड का निष्कर्ष सीधा है —
“संकट ते हनुमान छुड़ावै,
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै।”
यह पंक्ति कहती है —
हनुमान बाहर नहीं आते,
अंदर जागते हैं।
जब —
मन न डरे
कर्म न रुके
वाणी सत्य बोले
तब कोई संकट टिक नहीं सकता।
🌺 अंतिम आह्वान
मनुष्य!
तू कमजोर नहीं है।
तू केवल भूल गया है कि तू कौन है।
तेरे भीतर भी वही हनुमान हैं
जो समुद्र लांघे थे,
जो लंका जलाई थी,
जो असंभव को संभव करते थे।
आज जरूरत मंदिर जाने की नहीं,
हनुमान बनने की है।
👉 मन में साहस,
👉 कर्म में सेवा,
👉 वाणी में सत्य।
✨ अंतिम उद्घोष
आज आवश्यकता मंदिरों में घंटी बजाने की नहीं,
आज आवश्यकता अपने भीतर हनुमान जगाने की है।
अपने भय से कहो —
“मैं राम काज पर निकला हूँ।”
अपने आलस्य से कहो —
“विश्राम बाद में, कर्तव्य पहले।”
अपने अहंकार से कहो —
“मैं केवल दास हूँ।”
और फिर देखो —
कैसे तुम्हारे भीतर का हनुमान
समुद्र नहीं, पूरा जीवन लाँघ जाता है।
यही सुंदरकांड का जीवंत रूप है।
जय श्रीराम 🚩
जय जाग्रत बजरंगबली 🙏
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें