✨ “एहसास”

(1) – जीवन दर्पण

एहसास ही जीवन का दर्पण—जो दिखाए असली रूप,
भीड़ में भी पहचान दिलाए, भीड़ में भी दे अनूप।
मंज़िल चाहे जितनी ऊँची—जड़ें रखनी याद हमेशा,
जहाँ जन्मी थी पहली उम्मीद, वहीं से उठता हर सवेरा।


(2) – माँ की ममता

माँ के आँचल की छाया—तूफ़ान को भी मोड़ दे,
उसकी एक दुआ—निराश मन में सूरज नया जोड़ दे।
ममता की वो थपकी—पत्थर दिल में भी कंपन लाती,
माँ का एहसास ही सबसे पहले “जीवन” कहलाती।


(3) – पिता का अनुशासन

पिता की डाँट नहीं डाँट—वो ढाल है लोहे की,
कंधों पर चढ़ा दें आसमान—बशर्ते माने सीखें वो मोह की।
जीवन की हर मुश्किल पल में—सबसे पहले याद वही आते,
उनकी दी सीखों से ही हम पत्थर राहों में फूल उगाते।


(4) – परिवार का आधार

परिवार सिर्फ लोग नहीं—वो हमारी जड़ों की शान,
उनके बिना सारी जीतें—बस खाली, अधूरी पहचान।
दुनिया चाहे लाख बुलाए—दिल वहीं लौटकर आता,
जहाँ प्रेम बिना शर्त मिलता—जहाँ “अपना” कोई कह जाता।


(5) – बचपन के यार

बचपन के दोस्त ना बदलते—वक़्त बदल ले सौ रंग,
उनके संग हँसी सच्ची—उनके संग रोना भी प्रसंग।
भीड़ भरी इस दुनिया में—वो पहचान बनकर चलते,
गिर जाएं तो हाथ पकड़ें—जीवन के असली रिश्ते कहलते।


(6) – अपनी मिट्टी

अपनी मिट्टी वो माँ है—जो पांवों की धूल चूमती,
गिरकर उठाती बार-बार—और कहती, “चल, तू ही जीतती।”
ऊँचें बादलों में उड़कर भी—दिल वहीं लौट आता है,
जहाँ पहली बार खड़े होकर—जीवन ने चलना सीखा था।


(7) – जीवन की सीख

जीवन की सबसे गहरी सीख—एहसासों में छिपी रहती,
सपनों से आगे बढ़ते हुए—जड़ें पीछे से शक्ति देती।
अपनों को दिल में रखना—ये ही जीवन की सच्चाई,
वरना ऊँचाईयों में खड़े होकर भी—अंदर रहती तन्हाई।


(8) – समापन पंच

चलो आज प्रण लेते हैं—उड़ानों में जड़ों को याद रखेंगे,
ऊँचाईयों में भी मा-पिता, परिवार, मिट्टी—हर दम साथ रखेंगे।
क्योंकि जीवन की असली पूँजी—न धन, न शोहरत, न ताज,
एहसास ही है वो शक्तिशाली दीप—जो राख से भी जला दे आग।



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