पिता और पुत्री

जब पहली बार नन्हीं उँगली मेरी उँगली में सिमट गई,

तभी लगा मेरी दुनिया मानो पल में ही बदल गई।

कंधों पर बिठाकर दुनिया उसको दिखलाता था मैं,
राहों में उसकी खातिर छाया-सा फैल जाता था मैं।

उसकी हँसी में जैसे सूरज की किरनें खिल जाती थीं,
उसकी आँखों में झील-सी गहराईयां झलक जाती थीं।

पिता हूँ—पर उसकी बातों में मैं खुद बचपन पाता हूँ,
उसकी "पापा" पुकार सुनकर थका मन भी मुस्काता हूँ।

जब वह रोती—दिल के अंदर एक बिजली-सी कौंध जाती,
जब हँसती—मेरी धड़कन में फूलों जैसी महक छा जाती।

पुत्री सिर्फ़ एक बेटी नहीं—पिता का सपना, धड़कन है,
उसकी एक छोटी ख़ुशबू में मेरा पूरा जीवन है।

समय उड़ा—वह बढ़ती गई—पंखों में अब मजबूती है,
डरती जो मेरी बाँहों में—अब दुनिया से लड़ने की हिम्मत वही।

मैं पीछे खड़ा दुआओं में बस इतना ही माँगता रहता—
हे प्रभु, मेरी बच्ची को हर दुख से तुम दूर ही रखना।

चाहे जितनी बड़ी हो जाए, चाहें जितनी दूर निकल जाए,
मेरे दिल की कोमल धड़कन तो उसमें ही बस पाई जाए।

बेटी—पिता की साँसों में बसती नर्म-सी रौशनी है,
यह रिश्ता लिखी गई भगवान की सबसे प्यारी कहानी है।



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