"आर्थिक आधार पर आरक्षण बनाम जाति-आधारित आरक्षण: लोकहित, न्याय और भारत का आगामी दशक”
भूमिका
भारतीय संविधान का मूलाधार “सामाजिक न्याय” है। संविधान निर्माताओं की दृष्टि में आरक्षण कोई राहत-योजना नहीं, बल्कि वह संरचनात्मक औषधि थी जिसके बिना सदियों से उत्पीड़ित, बहिष्कृत और सामाजिक भेदभाव से पीड़ित समुदाय मुख्यधारा में सम्मिलित नहीं हो सकते थे। अतः आरक्षण के पीछे स्पष्ट उद्देश्य था—
“समान अवसर उपलब्ध कराना, न कि स्थायी विशेषाधिकार प्रदान करना”।
परंतु 21वीं सदी का भारत अब विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है; समाज की गतिशीलता बदली है; डिजिटल क्रांति ने नए अवसर उत्पन्न किए हैं; और गरीबी अब किसी एक जाति का विषय नहीं।
यही कारण है कि वर्तमान भारत में यह प्रश्न विशेष प्रासंगिकता प्राप्त करता है—
“क्या आने वाले दशक में आरक्षण का आधार जाति ही रहना चाहिए, या उसे आर्थिक स्थिति से बदल देना चाहिए?”
यह निबंध इसी विमर्श का अकादमिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
I. भारत में आरक्षण का ऐतिहासिक आधार
1. सामाजिक और जातिगत दमन की विरासत
भारतीय समाज की श्रेणीबद्ध जाति-व्यवस्था ने सदियों तक
- शिक्षा,
- भूमि,
- प्रशासनिक अधिकार,
- सामाजिक सम्मान
पर एक सीमित वर्ग का वर्चस्व स्थापित किया।
डॉ. अंबेडकर ने इसे “societal exclusion by birth” कहा था।
इसी पृष्ठभूमि में SC/ST आरक्षण प्रदान किया गया ताकि ऐतिहासिक अन्याय का संवैधानिक सुधार हो सके।
2. मंडल आयोग और OBC आरक्षण
1990 के बाद पिछड़े वर्गों के आर्थिक तथा सामाजिक पिछड़ेपन को मान्यता मिली।
इसका उद्देश्य था—
“सामाजिक असमानता की संरचनात्मक जड़ (जाति) को ठीक करना।”
II. जातिगत आरक्षण: उपलब्धियाँ और चुनौतियाँ
(A) उपलब्धियाँ
1. राजनीतिक व प्रशासनिक प्रतिनिधित्व में वृद्धि
आरक्षण ने उन समुदायों को सरकार, प्रशासन, शिक्षा और न्याय व्यवस्था में लाया जो सदियों तक अनुपस्थित थे।
2. सामाजिक गतिशीलता में वृद्धि
पहली पीढ़ी के शिक्षित, पेशेवर और अधिकारी वर्ग के रूप में हाशिये के समुदायों ने प्रेरणादायक प्रगति की।
3. सामाजिक सम्मान और सुरक्षा
जातिगत भेदभाव भले समाप्त न हुआ हो, परंतु आरक्षण ने इन समूहों की सामाजिक स्थिति में सुधार किया।
(B) चुनौतियाँ
1. क्रीमी लेयर की समस्या
लाभ वही परिवार बार-बार ले रहे हैं जो अब सामाजिक रूप से सक्षम हैं; वास्तविक गरीब पीछे छूट रहे हैं।
2. जातिगत राजनीति का विस्तार
आरक्षण राजनीतिक ध्रुवीकरण का माध्यम बन गया है।
3. सामाजिक तनाव और अविश्वास
कई वर्ग आरक्षण को प्रतियोगिता में बाधा मानते हैं।
4. समय-सीमा का अभाव
आरक्षण “अस्थायी” होना था, पर स्थायी हो गया है।
III. आर्थिक आरक्षण: अवधारणा और प्रासंगिकता
1. गरीबी जाति नहीं देखती
21वीं सदी का भारत इस सच को पहचान चुका है कि–
शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसरों की कमी अब जाति नहीं, आर्थिक स्थिति निर्धारण करती है।
सवर्ण, OBC, SC, ST—हर वर्ग में आर्थिक रूप से कमजोर हैं जो प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते हैं।
2. EWS आरक्षण का उदय (2019)
10% आर्थिक आरक्षण यह संकेत देता है कि
भारतीय नीतिनिर्माण जाति से आगे बढ़कर आर्थिक असमानता को भी स्वीकार करता है।
3. सामाजिक तनाव में कमी
आर्थिक आधार पर आरक्षण से
- जातिगत संघर्ष
- वोट बैंक की राजनीति
कम हो सकती है।
4. वैश्विक प्रचलन
अधिकांश लोकतंत्र “affirmative action” आर्थिक स्थिति, विकलांगता या क्षेत्रीय पिछड़ेपन के आधार पर देते हैं, जाति के आधार पर नहीं।
IV. आर्थिक आरक्षण की चुनौतियाँ
1. वास्तविक गरीब की पहचान में कठिनाई
भारत में आय का सही आकलन कठिन है।
2. जातिगत भेदभाव अभी भी मौजूद
सिर्फ आर्थिक आधार अपनाने से सदियों के सामाजिक भेदभाव की अनदेखी हो सकती है।
3. ग्रामीण-सामाजिक पिछड़ेपन की जटिलता
भारत में गरीबी + जातिगत अपमान + सामाजिक अवरोध—तीनों मिलकर पिछड़ापन बनाते हैं।
V. भारत के अगले 10 वर्ष: दो परिदृश्य
अब मुख्य प्रश्न—
“यदि भारत अगले 10 वर्ष जाति-आधारित आरक्षण जारी रखे या आर्थिक आधार अपनाए—तो क्या परिणाम होंगे?”
परिदृश्य-1: यदि अगले 10 वर्षों तक केवल जातिगत आरक्षण जारी रहे
-
जातिगत राजनीति और बढ़ेगी
सामाजिक संघर्ष तेज़ होंगे। -
योग्यता आधारित प्रतिस्पर्धा प्रभावित
युवा वर्ग में असंतोष बढ़ सकता है। -
क्रीमी लेयर विस्तार
आरक्षण का लाभ वही परिवार लेते रहेंगे। -
सामाजिक गतिशीलता सीमित
सबसे गरीब तबका (किसी भी जाति का) पीछे रह जाएगा। -
निजी क्षेत्र में असमानताएँ गहरी
क्योंकि आरक्षण मुख्यतः सरकारी क्षेत्र तक सीमित है।
परिदृश्य-2: यदि भारत पूरी तरह आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू कर दे
-
गरीबों का वास्तविक सशक्तिकरण
गरीबी उन्मूलन तेज़ होगा। -
सामाजिक सौहार्द बढ़ेगा
जातिगत तनाव कम होंगे। -
राजनीति का जातिगत चरित्र कमजोर होगा
राष्ट्रवाद और विकास आधारित राजनीति मजबूत होगी। -
मानव पूँजी में सुधार
बेहतर शिक्षा और प्रतिस्पर्धा गुणवत्ता बढ़ाएगी।
परंतु जोखिम:
सदियों के जातिगत उत्पीड़न को पूरी तरह भूल जाना अन्यायपूर्ण होगा।
VI. सर्वश्रेष्ठ विकल्प: संयुक्त मॉडल (Hybrid Affirmative Action)
UPSC, नीति आयोग और कई सामाजिक शोध संस्थान जिस मॉडल को सबसे उपयुक्त मानते हैं, वह है—
“सामाजिक पिछड़ापन + आर्थिक स्थिति = संयुक्त आधार”
इस मॉडल के घटक—
-
जातिगत वंचना की मान्यता
(क्योंकि सामाजिक अपमान और बहिष्कार अभी भी मौजूद हैं) -
आर्थिक फिल्टर (क्रीमी लेयर) को मजबूत करना
ताकि सक्षम परिवार बाहर हों और गरीब लाभार्थी अंदर आएं। -
आरक्षण की समयबद्ध समीक्षा
हर 10 वर्ष पर सामाजिक परिस्थितियों का मूल्यांकन। -
स्किल डेवलपमेंट + शिक्षा सुधार
आरक्षण तभी सार्थक है जब अवसरों की मात्रा बढ़े। -
निजी क्षेत्र में अवसर बढ़ाना
क्योंकि सरकारी नौकरियाँ घट रही हैं।
VII. लोकहित और राष्ट्रीय हित का विश्लेषण
1. सामाजिक न्याय
सिर्फ आर्थिक आधार इस सिद्धांत को अधूरा करेगा।
सिर्फ जातिगत आधार इस सिद्धांत को संकीर्ण करेगा।
संयुक्त मॉडल सर्वाधिक न्यायसंगत है।
2. सामाजिक सद्भाव
आर्थिक आधार से विभाजन कम, एकता अधिक।
3. राजनीतिक स्थिरता
जातिगत आरक्षण राजनीतिक अस्थिरता बढ़ाता है;
संयुक्त मॉडल संतुलन लाता है।
4. आर्थिक विकास
कौशल आधारित, अवसर आधारित प्रगति से देश की उत्पादकता बढ़ती है।
VIII. नीति सुझाव (Policy Recommendations)
-
क्रीमी लेयर को SC/ST पर भी लागू करने पर विचार
सामाजिक न्याय का दायरा विस्तृत होगा। -
आर्थिक स्थिति का पारदर्शी डेटाबेस तैयार करना
जैसे—SECC डेटा, आय प्रमाण, संपत्ति रिकॉर्ड। -
आरक्षण का अनुपात समयानुसार पुनरीक्षण
लोकसंख्या और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर। -
सरकारी नौकरियों की संख्या नहीं, कौशल बढ़ाना प्राथमिकता
क्योंकि 85% से अधिक रोजगार निजी क्षेत्र में हैं। -
शिक्षा क्षेत्र में विशेष सहायता
कोचिंग, हॉस्टल, स्किल इंस्टीट्यूट, डिजिटल लर्निंग आदि।
IX. निष्कर्ष
आरक्षण भारतीय लोकतंत्र की वह संरचना है जिसने
- सामाजिक सम्मान,
- अवसरों की समानता,
- और राजनीतिक प्रतिनिधित्व
को नया स्वरूप दिया।
लेकिन जैसे-जैसे भारत आर्थिक रूप से उभर रहा है, केवल जाति-आधारित आरक्षण भारत के भविष्य की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता।
आने वाले दशक में भारत को चाहिए—
- ऐतिहासिक सामाजिक अन्याय की मान्यता (जातिगत आधार)
- वास्तविक आर्थिक वंचना का निदान (आर्थिक आधार)
यह संतुलन ही भारत को
👉 सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण,
👉 आर्थिक रूप से सक्षम,
👉 राजनीतिक रूप से स्थिर,
👉 और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी
बनाएगा।
अतः लोकहित में भारत को एक ऐसी नीति अपनानी चाहिए जो न सामाजिक न्याय से समझौता करे, न आर्थिक न्याय से—
और यही है:
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें