“वो ही तो घर की रौशनी है”

जब मैं द्वार पे लौटूँ थककर, मन में छाया संदेह लिए,

वो मुस्कान की लौ बन जाती, सपनों का हर नेह लिए।

मैं सो जाऊँ तो घर थम जाता, जैसे थमता कोई नदी,
वो सो जाए तो सूना–सूना, खो दे अपनी सभी कली।

मैं जागूँ तो दिन की भागदौड़, फर्ज़ों की हलचल गूंजे,
वो जागे तो पूजा–धूप–दीपक, घर के हर कोने में पूँजे।

मेरे आने से हिम्मत बढ़ती, उसके आने से सुख घनश्याम,
वो ही लक्ष्मी, वो ही अन्नपूर्णा, घर में उसके होने का नाम।

उसके कदमों से घर बसता, उसके वचन से दीप जले,
वो त्याग की गंगा-सी पावन, हर दुख की मिट्टी धो डाले।

हँसकर मेरी राह सजाती, रोकर भी आँसू छुप जाए,
पथरीली धूपों में चलकर भी, मेरी छाँव-सी साथ निभाए।

वो उपहास नहीं, सम्मानित है, मेरे जीवन की साथी है,
मेरी शक्ति, मेरा संरक्षक—वो ही घर की परिभाषा है।

मुझे ऊँचा देख वो खिल उठती, मैं गिर जाऊँ तो टूट न जाती,
मेरी हर जीत में उसका अंश, मेरी हर हार में उसकी भक्ति।

वो उपहास का विषय न होगी, वो सम्मान का पर्व है सारी,
वो ही घर का मूल स्तंभ है, वो ही जीवन की उजियारी।

पत्नी केवल शब्द नहीं है—
वो तप, त्याग और प्रेम का सार,
उसके होने से घर की दीवारें
बनती हैं मंदिर की दीवार।

उसके बिना मैं आधा हूँ,
उसके साथ पूर्ण हो जाता हूँ—
सच कहता हूँ, जब वो हँस देती,
मैं फिर से जीवित हो जाता हूँ।



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