फेफड़ों का कैंसर अब सिर्फ स्मोकर्स में नहीं।प्रदूषण = नया साइलेंट किलर।
धूम्रपान न करने वालों में भी बढ़ रहा फेफड़ों का कैंसर
फेफड़ों का कैंसर दुनिया भर में सबसे तेजी से बढ़ने वाले कैंसरों में से एक है। जहाँ पहले इसे केवल धूम्रपान करने वालों का रोग माना जाता था, वहीं अब चिकित्सक और शोधकर्ता इस बात पर सहमत हैं कि नॉन-स्मोकर्स (जो कभी सिगरेट या तंबाकू से जुड़े नहीं) वे भी तेजी से इस बीमारी का शिकार हो रहे हैं। यह परिवर्तन केवल एक चिकित्सा घटना नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और पर्यावरणीय चेतावनी है।
नॉन-स्मोकर्स में तेजी से बढ़ते मामले
मेदांता अस्पताल के वरिष्ठ फेफड़ा रोग विशेषज्ञ डॉ. कुमार बताते हैं कि आज
25-30% फेफड़ों का कैंसर उन व्यक्तियों में पाया जा रहा है, जिन्होंने जीवनभर सिगरेट को हाथ तक नहीं लगाया।
यह आँकड़ा केवल चौंकाने वाला नहीं, बल्कि यह स्पष्ट संकेत है कि रोग के पीछे मुख्य कारक बदल चुके हैं।
आज प्रमुख कारण क्या हैं?
- शहरों के बढ़ते प्रदूषण स्तर
- बेंजीन, रैडॉन, सल्फर ऑक्साइड, NO₂ जैसी जहरीली गैसें
- ट्रैफिक और औद्योगिक धुएं में मौजूद Carcinogens
- वायु में PM 2.5 और PM 10 जैसे महीन कण
- घरों में बनने वाला धुआं / इनडोर एयर प्रदूषण
- कमज़ोर होती फेफड़ों की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता
चिंता की बात यह है कि 50 वर्ष से कम उम्र के युवा, यहाँ तक कि 25–40 आयु वर्ग भी तेजी से प्रभावित हो रहे हैं।
भारत और विश्व के आंकड़े — स्थिति कितनी गंभीर?
| क्षेत्र | हर साल नए केस | हर साल मौतें | स्थिति |
|---|---|---|---|
| विश्व | ≈ 22 लाख | ≈ 18 लाख | फेफड़ों का कैंसर कैंसर से मौत का सबसे बड़ा कारण |
| भारत | ≈ 1.1 - 1.25 लाख नए मरीज प्रति वर्ष | लगभग 1 लाख मौतें/वर्ष | निदान में देरी और प्रदूषण प्रमुख कारण |
| नॉन-स्मोकर्स | 20-25% मरीज | हर साल संख्या बढ़ रही | महिलाओं और युवाओं में वृद्धि |
दुनिया में जहाँ 65-70% मरीज धूम्रपान की वजह से होते हैं, वहीं भारत में लगभग 30% मरीज कभी धूम्रपान नहीं करते — यह बताता है कि:
भारत में प्रदूषण, टी.बी. की गलत दवाइयां और देर से जांच — फेफड़ों के कैंसर के सबसे बड़े कारण हैं।
प्रदूषण अब साइलेंट किलर है
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की 2023 रिपोर्ट कहती है कि:
- एक व्यक्ति दिन में लगभग 25,000 सांसें लेता है।
- भारत के 70% शहरों में PM2.5 स्तर WHO मानक से 8-20 गुना अधिक पाया गया।
- बेंजीन और रैडॉन जैसे तत्त्व डीएनए को क्षतिग्रस्त कर कैंसर कोशिकाओं का निर्माण करते हैं।
सबसे प्रदूषित शहर — सबसे बड़ा खतरा
गाजियाबाद, दिल्ली, नोएडा, कानपुर, पटना, फरीदाबाद और मुरादाबाद
लगातार विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में शामिल रहे हैं।
इन शहरों में रहने वालों को
श्वसन रोग, दमा, COPD और फेफड़ों का कैंसर होने का जोखिम अन्य शहरों से कई गुना अधिक है।
क्यों देर से पहचान होती है?
भारत में फेफड़ों के कैंसर की पहचान अक्सर गलत दिशा में जाती है क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण बहुत साधारण या टी.बी./सर्दी-जुकाम जैसे दिखते हैं:
- लगातार 3 सप्ताह से अधिक खांसी
- खून की उल्टी या बलगम में खून
- एकतरफा सीने में दर्द
- सांस चढ़ना या थकान
- वजन का तेजी से घटना
देश में टीबी के अधिक मामलों की वजह से, लोग (और कई बार डॉक्टर भी) इन लक्षणों को टीबी मानकर इलाज शुरू कर देते हैं, जबकि कैंसर धीरे-धीरे स्टेज 3 या 4 तक बढ़ जाता है।
60-70% भारतीय मरीजों में कैंसर का पता बहुत देर से चलता है।
वास्तविक उदाहरण — गाजियाबाद की 31 वर्षीय महिला
यह महिला ना तंबाकू, ना सिगरेट, ना शराब, एक स्वस्थ और सक्रिय जीवन जी रही थी।
लेकिन कुछ हफ्तों से खांसी और खून की उल्टी की शिकायत शुरू हुई।
जांच में:
- स्टेज 2 फेफड़ों का कैंसर पाया गया
- की-होल सर्जरी की गई
- 6 चक्र की कीमोथेरेपी दी गई
आज यह महिला स्वस्थ होकर अपने काम पर लौट चुकी है।
यह उदाहरण बताता है:
समय पर जांच कराई जाए तो कैंसर का इलाज संभव है और जीवन बचाया जा सकता है।
क्या करें? — बचाव ही सबसे मजबूत इलाज है
| आदत | क्यों ज़रूरी है |
|---|---|
| प्रदूषण में N95 मास्क का प्रयोग | PM2.5 और जहरीली गैसों से सुरक्षा |
| घर और ऑफिस वेंटिलेशन बढ़ाएं | इनडोर एयर भी प्रदूषित हो सकती है |
| लगातार खांसी / सांस में दिक्कत पर चेस्ट X-Ray / HRCT कराएं | शुरुआती जांच से जोखिम कम |
| तंबाकू, धूम्रपान से दूरी | फेफड़ों की सुरक्षा और जीवन प्रत्याशा में वृद्धि |
| रोज़ योग, प्राणायाम और व्यायाम | फेफड़ों की क्षमता और ब्लड ऑक्सीजन बढ़ती है |
निष्कर्ष
फेफड़ों का कैंसर आज सिर्फ स्मोकर्स की समस्या नहीं, बल्कि हमारी हवा, हमारी जीवनशैली, और हमारी जागरूकता से जुड़ा हुआ एक बड़ा वैश्विक स्वास्थ्य संकट है।
भारत जैसे देश में जहाँ प्रदूषण का स्तर खतरनाक, टीबी आम, और लक्षणों को नजरअंदाज करने की आदत भारी है — वहाँ यह बीमारी और तेजी से बढ़ सकती है।
समय रहते कदम उठाना ही जीवन बचा सकता है।
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