सफलता की मिसाल: घर–परिवार, नौकरी और छह बार असफलता… फिर भी 40 वर्ष की उम्र में बनीं IAS
निसा उन्नीराजन की अद्भुत प्रेरक यात्रा
सफलता का रास्ता कभी आसान नहीं होता। और जब जिम्मेदारियाँ सिर पर हों—घर की, बच्चों की, नौकरी की—तब यह रास्ता और भी कठिन हो जाता है। लेकिन कुछ लोग होते हैं, जो मुश्किलों के सामने झुकते नहीं, बल्कि उन्हें सीढ़ी बनाकर अपने सपनों की ओर बढ़ते हैं।
ऐसी ही प्रेरक कहानी है केरल की IAS निसा उन्नीराजन की—एक ऐसी महिला, जिसने 35 वर्ष की उम्र में यूपीएससी की तैयारी शुरू की, छह बार असफल हुईं, स्वास्थ्य चुनौतियों से लड़ीं, नौकरी और घर दोनों संभाले, लेकिन अंत में सातवें प्रयास में IAS बनकर इतिहास रच दिया।
उनकी कहानी सिर्फ परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है—यह विश्वास, साहस, अनुशासन, परिवार, संघर्ष और धैर्य की कहानी है।
1. सपनों की कोई उम्र नहीं होती: 35 की उम्र में शुरुआत
कहते हैं कि यूपीएससी की तैयारी 21–22 साल की उम्र में शुरू करनी चाहिए।
लेकिन निसा की तैयारी शुरू हुई 35 वर्ष की उम्र में, जब अधिकांश लोग अपनी नौकरी और जिंदगी में स्थिरता खोजने लगते हैं।
✔ उस उम्र में जहां कई लोग सपनों को बोझ समझकर पीछे रख देते हैं
✔ जहां जिम्मेदारियाँ प्राथमिकता बन जाती हैं
✔ और जहां असफलता का डर मन में बैठ जाता है
वहीं निसा ने अपने भीतर एक चिंगारी जलाई—
“मैं देर से शुरू कर रही हूँ, लेकिन मैं अपनी मंज़िल तक पहुँच कर ही दम लूँगी।”
2. दो बच्चों की मां, घर की जिम्मेदारी… और फिर भी हिम्मत नहीं हारीं
निसा सिर्फ छात्रा नहीं थीं।
वह दो छोटी बेटियों की मां थीं।
वह एक फुल-टाइम नौकरी करती थीं।
वह एक घर चलाती थीं—खाना, सफाई, बच्चों की पढ़ाई, स्कूल, हर छोटी-बड़ी जिम्मेदारी।
लेकिन उन्होंने एक नियम बनाया:
दिन परिवार का…
रात सपनों की।
सुबह बच्चों को स्कूल भेजना, घर संभालना, नौकरी पर जाना—यह उनकी पहली शिफ्ट थी।
शाम को परिवार को समय देना—दूसरी शिफ्ट।
और रात 10 बजे के बाद…
एक तीसरी शिफ्ट शुरू होती थी—
यूपीएससी की तैयारी की शिफ्ट।
जब पूरी दुनिया सो जाती थी, तब निसा अपनी किताबें खोलती थीं।
नींद से लड़ते हुए, थकान से लड़ते हुए, जिम्मेदारियों से जूझते हुए…
लेकिन सपने से कभी नहीं हटती थीं।
3. सबसे बड़ी चुनौती—कम सुनाई देना
हर इंसान के जीवन में कुछ ऐसी चुनौतियाँ होती हैं जो दिखती नहीं, लेकिन भीतर से थका देती हैं।
निसा की ऐसी चुनौती थी—सुनने की क्षमता कम होना।
यह उनके लिए एक बड़ी बाधा थी:
- क्लास में समझना मुश्किल
- चर्चा में भाग लेना कठिन
- इंटरव्यू की तैयारी चुनौतीपूर्ण
- और आत्मविश्वास में कई बार कमी
लेकिन उन्होंने इसे कमजोरी नहीं बनने दिया।
बल्कि इसे ताकत बनाया।
उन्होंने सोचा—
“अगर रंजीत सर जैसे अधिकारी इस चुनौती के बावजूद उप-कलेक्टर बन सकते हैं,
तो मैं IAS क्यों नहीं बन सकती?”
इस विचार ने उनका आत्मविश्वास कई गुना बढ़ा दिया।
यह सीख हमें भी मिलती है—
“परिस्थितियाँ कठिन हों तो लक्ष्य बड़ा रखो।
लक्ष्य ही ताकत बन जाता है।”
4. परिवार—उनका सबसे बड़ा आधार
कठिन समय में अगर कोई कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो जाए,
तो सपने आधे आसान हो जाते हैं।
निसा के लिए यह आधार थे—
उनके पति अरुण और उनका ससुराल।
उन्होंने न केवल उन्हें मानसिक समर्थन दिया,
बल्कि घर की जिम्मेदारियाँ भी बांटी।
- बच्चों का होमवर्क
- घर का काम
- बाहर के छोटे-बड़े काम
- मानसिक तनाव में साथ रहना
उनके पति ने कहा था—
“तुम पढ़ो… घर हम संभाल लेंगे।
तुम्हारी सफलता हमारी सफलता है।”
ऐसा परिवार हर किसी को नहीं मिलता।
और इस कहानी से हमें सीख मिलती है—
“सफलता अकेले की यात्रा नहीं होती।
सफलता एक टीम वर्क है,
जहां परिवार की भूमिका सबसे बड़ी होती है।”
5. रणनीति जिसने असंभव को संभव बनाया
यूपीएससी का सिलेबस पहाड़ की तरह है।
हजारों पन्ने, सैकड़ों टॉपिक, अनगिनत किताबें।
लेकिन निसा ने इसे एक स्मार्ट तरीके से प्लान किया—
1. बड़े सिलेबस को छोटे हिस्सों में तोड़ा
हर विषय को माइक्रो-टॉपिक में बांटा।
जिसे 30–40 मिनट में भी पढ़ा जा सके।
2. नोट्स छोटे, सरल और याद करने लायक बनाए
परीक्षा से पहले केवल वही नोट्स रिवीजन में काम आते थे।
3. हर असफलता के बाद अपनी रणनीति बदलती रहीं
वह हर बार नया तरीका अपनाती थीं—
- एक बार टेस्ट सीरीज़ बढ़ाई
- दूसरी बार लिखने की प्रैक्टिस बढ़ाई
- तीसरी बार करंट अफेयर्स पर जोर दिया
- चौथी बार इंटरव्यू स्किल्स सुधारीं
4. प्रेरणा के लिए टॉपर्स के वीडियो देखती थीं
हर कहानी में उन्हें एक नया सबक मिलता था।
वह खुद को याद दिलाती थीं—
“अगर ये कर सकते हैं,
तो मैं भी कर सकती हूँ।”
6. छह बार असफलता… लेकिन हार नहीं मानी
यूपीएससी की एक असफलता भी कई लोगों को तोड़ देती है।
लेकिन निसा ने छह बार असफल होने के बाद भी
अपने मन में एक ही बात कही—
“असफलता का मतलब यह नहीं कि मैं सफल नहीं हो सकती।
असफलता का मतलब है—
अभी और बेहतर होना है।”
हर असफलता उन्हें मजबूत बनाती गई।
हर बार उनकी तैयारी और पैनी होती गई।
और सातवीं बार…
परिणाम बदल गया।
7. 40 साल की उम्र में IAS बनकर दिखाई नई राह
वर्ष 2024 की यूपीएससी परीक्षा में
निसा ने ऑल इंडिया 1000वीं रैंक हासिल की।
वह 40 वर्ष की उम्र में
आईएएस अधिकारी बन गईं।
आज वह तिरुवनंतपुरम में सहायक लेखा परीक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं,
और उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा हैं
जो सोचते हैं कि उम्र एक बाधा है।
निसा ने साबित कर दिया—
उम्र नहीं, जुनून मायने रखता है।
परिस्थितियाँ नहीं, दृष्टिकोण मायने रखता है।
समय नहीं, इच्छाशक्ति मायने रखती है।
इस कहानी से क्या सीख मिलती है?
1. सपनों की कोई आयु-सीमा नहीं होती
35, 40 या 50—सपना कभी भी शुरू किया जा सकता है।
2. असफलता अंतिम सत्य नहीं है
6 बार असफल होकर भी सफल होना संभव है—
बस प्रयास ईमानदार होना चाहिए।
3. जिम्मेदारियाँ बाधा नहीं—प्रेरणा हैं
घर, परिवार, बच्चे—ये बोझ नहीं हैं।
ये आपके लिए ऊर्जा का स्रोत बन सकते हैं।
4. स्वास्थ्य समस्या भी आपको रोक नहीं सकती
कम सुनाई देना भी निसा की सफलता के रास्ते को रोक नहीं पाया।
5. परिवार का सहयोग जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है
जब घर वाले साथ हों, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रहता।
6. रणनीति और अनुशासन सफलता का मूल है
बिना रणनीति के बड़ी परीक्षा नहीं जीती जाती।
7. जीत सिर्फ उन्हीं की होती है जो हार मानने से इंकार करते हैं
प्रेरणा क्या मिलती है?
- अपनी जिंदगी की मुश्किलों को बहाना मत बनाइए
- कोशिश करते रहिए
- उम्र, जिम्मेदारियाँ, असफलताएँ—इनमें से कोई भी आपकी मंज़िल का अंत नहीं है
- निरंतरता और विश्वास आपको एक दिन वहाँ ले जाते हैं जहाँ आप जाना चाहते हैं
निसा उन्नीराजन की कहानी हमें यही बताती है—
“अगर मन में आग हो…
तो रास्ते खुद बनते जाते हैं।”
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