वैश्विक शांति अभियानों में भारत की भूमिका: बदलते युद्ध स्वरूप और एकजुटता की दिशा में. ✳️Rakesh Mishra Research Notes
🪷 भूमिका
विश्व राजनीति के इस परिवर्तनशील युग में, जहाँ संघर्षों का स्वरूप पारंपरिक युद्धों से हटकर साइबर युद्ध, आतंकवाद, हाइब्रिड वारफेयर और राजनैतिक-आर्थिक टकरावों में बदल गया है, वहाँ संयुक्त राष्ट्र की शांति सेनाओं की भूमिका अब पहले से कहीं अधिक जटिल और आवश्यक हो गई है।
भारत 1950 से ही संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में योगदान देकर वैश्विक शांति व्यवस्था का अभिन्न अंग रहा है।
आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी का यह कथन कि “युद्ध का स्वरूप बदल गया है और सेनाएँ अब संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुरूप मिलकर काम कर रही हैं” — आज की वैश्विक रणनीतिक हकीकत को दर्शाता है।
भारत न केवल सैनिक दृष्टि से, बल्कि नीतिगत, मानवीय और वैचारिक दृष्टि से भी शांति का अग्रदूत बनकर उभरा है।
🇮🇳 भारत का ऐतिहासिक और वर्तमान योगदान
भारत का शांति अभियानों से जुड़ाव 1950 में कोरिया मिशन से शुरू हुआ था।
तब से लेकर अब तक भारत ने —
- 49 से अधिक शांति अभियानों में सक्रिय भागीदारी की है,
- 2,00,000 से अधिक सैनिकों को तैनात किया है,
- और वर्तमान में 11 संघर्ष क्षेत्रों में से 9 में भारतीय सेना प्रत्यक्ष रूप से योगदान दे रही है।
इन अभियानों में भारत ने न केवल संख्या, बल्कि संवेदना और नैतिकता के बल पर अपनी पहचान बनाई है।
भारतीय सैनिकों ने कांगो, साउथ सूडान, लेबनान, सोमालिया, और हैती जैसे मिशनों में स्थानीय जनता के लिए आशा का प्रतीक बनकर कार्य किया है।
⚔️ युद्ध का बदलता स्वरूप: नई चुनौतियाँ और भारत की तैयारी
आज युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है। यह अब सूचना, ऊर्जा, जल, साइबर क्षेत्र और अर्थव्यवस्था में फैल चुका है।
इन्हीं कारणों से सेनाओं के सामने नई चुनौतियाँ हैं —
- साइबर और सूचना सुरक्षा,
- मानवीय संकट,
- स्थानीय शासन की पुनर्स्थापना,
- और जलवायु-प्रेरित संघर्ष।
भारत इन नई चुनौतियों से निपटने के लिए अपनी सेना को टेक्नोलॉजी आधारित, त्वरित तैनाती योग्य और संयुक्त परिचालन (Interoperable) बनाने की दिशा में काम कर रहा है।
🌐 वैश्विक परिदृश्य: संघर्ष और अस्थिरता का विस्तार
वर्तमान में विश्व के विभिन्न भागों में संघर्ष सक्रिय हैं —
- यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध,
- गाजा और इज़राइल का संघर्ष,
- अफ्रीका के कई देशों में जातीय हिंसा,
- म्यांमार में राजनीतिक संकट,
- तथा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सामरिक तनाव।
ऐसे माहौल में, संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों की प्रासंगिकता बढ़ गई है।
भारत, एक लोकतांत्रिक और शांति-प्रेमी राष्ट्र होने के नाते, अपने सैनिकों के माध्यम से संवाद, सहयोग और स्थायित्व की संस्कृति को स्थापित करने का प्रयास कर रहा है।
🕊️ संयुक्त राष्ट्र चार्टर और भारत की वैचारिक निष्ठा
संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उद्देश्य केवल युद्धविराम नहीं, बल्कि स्थायी शांति और मानवता की रक्षा है।
भारत इस चार्टर के प्रति पूर्ण निष्ठा रखता है और अपने सैनिकों को “Peace Soldiers” के रूप में प्रशिक्षित करता है —
जो बल के साथ-साथ संवेदना से भी शांति स्थापित करते हैं।
भारतीय सैनिक अपनी सांस्कृतिक संवेदनशीलता, अनुशासन और समन्वय क्षमता के कारण स्थानीय समाज में आसानी से घुल-मिल जाते हैं।
संयुक्त राष्ट्र महासचिवों ने कई बार भारत को “Most Reliable Peacekeeping Partner” कहा है।
🔍 भारत की रणनीतिक दृष्टि और प्रभाव
भारत की रणनीति केवल भागीदारी तक सीमित नहीं, बल्कि विश्व शांति व्यवस्था में नेतृत्व स्थापित करने की है।
इस दिशा में भारत की प्रमुख पहलें हैं —
-
मानव-केंद्रित सुरक्षा दृष्टिकोण (Human-Centric Security):
भारत हर मिशन में नागरिक सुरक्षा और मानवाधिकारों को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। -
तकनीकी क्षमता का समावेश:
भारत अपने सैनिकों को AI, Drone Surveillance, और Real-Time Communication Systems से सुसज्जित कर रहा है। -
दक्षिण-दक्षिण सहयोग (South-South Cooperation):
भारत अफ्रीकी देशों को प्रशिक्षण, मेडिकल सहायता और लॉजिस्टिक समर्थन दे रहा है। -
महिला सहभागिता:
भारत ने शांति मिशनों में महिला सैनिकों की तैनाती कर लैंगिक समानता का नया उदाहरण प्रस्तुत किया है।
💡 संरचनात्मक सुधार की आवश्यकता
भारत का योगदान ऐतिहासिक और सम्मानजनक है, परंतु अब समय है कि उसे नीति निर्माण में भी समान भागीदारी मिले।
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की स्थायी सदस्यता भारत के लिए आवश्यक है ताकि उसकी आवाज़ नीति निर्धारण तक पहुँचे।
- शांति अभियानों के लिए अधिक वित्तीय सहायता और संसाधन उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
- भारत को साइबर, अंतरिक्ष और AI आधारित शांति अभियानों में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए।
📘 Rakesh Mishra Research Insights
- भारत की शांति नीति केवल कूटनीतिक नहीं, संस्कार आधारित दर्शन पर टिकी है — “अहिंसा परमो धर्मः”।
- भारतीय सैनिकों ने शांति मिशनों में ‘कर्मयोग’ के आदर्श को जीया है — बिना पुरस्कार की अपेक्षा, मानवता के लिए सेवा।
- भारत अब केवल भागीदार नहीं, बल्कि वैश्विक शांति नीति का निर्माता (Policy Shaper) बनने की दिशा में अग्रसर है।
- भविष्य की दिशा में भारत को अपनी सैन्य तकनीक, प्रशिक्षण और कूटनीतिक क्षमता को जोड़कर “Integrated Peace Leadership Model” बनाना चाहिए।
- भारत की भूमिका केवल सैनिक शक्ति नहीं, बल्कि नैतिक और वैचारिक शक्ति की भी मिसाल है।
🪷 निष्कर्ष: भारत – शांति का प्रहरी और दिशा-सूचक राष्ट्र
भारत की यह नीति कि “जब सेनाएँ साथ आती हैं, तभी एकजुटता की शक्ति दिखती है” — एक गहन संदेश है कि शांति केवल कूटनीति नहीं, बल्कि सभ्यता की आत्मा है।
आज के अस्थिर विश्व में भारत एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उभर रहा है जो न तो युद्धप्रिय है, न निष्क्रिय —
बल्कि वह “संवेदनशील शक्ति” (Sensitive Power) है जो न्याय, संवाद और सहयोग के माध्यम से स्थायी शांति की ओर बढ़ रहा है।
भारत की सैन्य शक्ति उसकी भुजाओं में नहीं, बल्कि उसके मूल्यों और निष्ठा में निहित है।
यही भारत को विश्व शांति का सच्चा प्रहरी बनाता है —
और यही है Rakesh Mishra Research Note का सार:
“भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि शांति की जीवंत परंपरा है — जो आज भी मानवता को एकसूत्र में बाँधने का कार्य कर रही है।”
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