Operation Sindoor: भारत की नीति का विश्लेषण और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर प्रभाव. (Operation Sindoor: Analysis of India’s Policy and Its Impact on International Diplomacy) Rakesh Mishra Reacharch Notes


“Operation Sindoor” पर आधारित भारत की नीति पर एक रिपोर्ट 

प्रस्तावना

  • Operation Sindoor भारत–पाकिस्तान की सीमापार आतंकवाद के खिलाफ भारत की सैन्य कार्रवाई थी, जिसे 7 मई 2025 को आतंकवादी हमला (Pahalgam) के प्रत्युत्तर में लॉन्च किया गया।
  • भारत ने इसे “आतंकवाद के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस” की नीति का अनुपालन बताया, और कहा कि इस तरह की कार्रवाई को आगे भी लिया जाएगा यदि सीमा पार आतंकवाद जारी रहा।
  • इस घटना ने सिर्फ सैन्य आयाम नहीं लिया, बल्कि भारत ने इसके साथ एक सक्रिय कूटनीतिक अभियान भी चलाया, ताकि वैश्विक स्तर पर अपने दृष्टिकोण को स्थापित किया जाए।

संशिष्टात्मक भाग (Descriptive)

घटनाक्रम का सार

  • 22 अप्रैल 2025 को Pahalgam में आतंकवादी हमले में 26 नागरिक मारे गए। भारत ने इसे सीमा पार आतंकवादी नेटवर्क का परिणाम बताया।
  • 7 मई को Operation Sindoor के तहत भारत ने मिसाइल एवं हवाई हमले किए, आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया, और इसे “सुस्पष्ट और रणनीतिक” कार्रवाई बताया।
  • भारत ने यह दावा किया कि इस ऑपरेशन में केवल आतंकवादी बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया, न कि पाकिस्तानी नागरिक या सैन्य संरचनाएँ।
  • हालांकि पाकिस्तानी पक्ष ने भारत पर नागरिक इलाकों को निशाना लगाने का आरोप लगाया, और संघर्ष की तीव्रता बढ़ गई।
  • बाद में एक छूट रेखा (ceasefire) की घोषणा हुई।

भारत की तुरंत-उपाय की नीति (Immediate Policy Measures)

भारत ने कूटनीतिक और अन्य कदम भी उठाए, जैसे:

  1. कुटनीतिक अभियान

    • विदेशों में सांसदों एवं पूर्व राजनयिकों की टीमों को भेजा गया ताकि वे भारत के दृष्टिकोण को पेश करें और पाकिस्तान की “नकली कहानी” (propaganda) को चुनौती दें।
    • भारत के मिशनों ने विदेशों में मीडिया एवं राजनयिकों को प्रस्तुतियाँ दीं।
  2. प्रत्युत्तरकारी नीति (Retaliatory / Deterrent Messaging)

    • भारत ने यह स्पष्ट किया कि यदि सीमा पार आतंकवाद जारी रहेगा, तो भारत उसी प्रकार की या कठोर प्रतिक्रिया देगा।
    • भारत ने घोषित किया कि कुछ वर्तमान संविदाओं या सुविधाओं को निलंबित कर देगा — जैसे, Indus Water Treaty को “abeyance” में रखना, Attari चौकी को बंद करना, पाकिस्तानी राजनयिकों की गतिविधियों को सीमित करना।
  3. शासकीय वक्तव्य और सार्वजनिक संचार

    • भारत सरकार तथा विदेश मंत्रालय ने संसद और सार्वजनिक स्तर पर विशेष चर्चा करके Operation Sindoor की नीति और तर्क प्रस्तुत किए।
    • यह संदेश भी गया कि भारत “शुद्ध सैन्य कार्रवाई + कूटनीति” का संयोजन करेगा।

विश्लेषणात्मक भाग (Analytical / Critical)

यहाँ हम देखते हैं कि भारत की नीति कितनी प्रभावी और सुसंगत रही — विशेषकर अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति की दृष्टि से — तथा जहाँ कमियाँ रही, उन पर विचार करते हैं।

मजबूत पक्ष (Strengths / Positives)

  1. नया प्रतिपुष्टि तंत्र (Deterrent Signaling)
    Operation Sindoor ने यह संकेत दिया कि भारत अब “शत्रुता और आतंकवाद के प्रति उदार दायरे” की नीति नहीं अपनाएगा, बल्कि सीमा पार गतिविधियों पर सक्रिय कार्रवाई करेगा। इस तरह, यह एक “अभिकलनीय जोखीम” का संदेश देता है।
    यह नयी युद्ध-नीति (war doctrine) विकास की दिशा में एक कदम माना गया है।

  2. कूटनीतिक तत्परता (Diplomatic Mobilization)
    भारत ने तेजी से विदेशों में प्रतिनिधिमंडल भेजे, विदेश मंत्रालय और मिशनों को सक्रिय किया, और वैश्विक जनमत (global narrative) को प्रभावित करने की कोशिश की।
    इससे पाकिस्तान के “पीड़ित राज्य” (victim narrative) को चुनौती मिली।

  3. नीति की स्पष्टता (Clarity of Strategic Messaging)
    भारत ने दो प्रमुख संदेश दिए — “जीरो टॉलरेंस आतंकवाद” और “लोकों की रक्षा का अधिकार” — जिन्हें विदेशों में लगातार दोहराया गया।
    इसके अलावा, भारत की नीति को उसी समय सैन्य और कूटनीतिक आयाम में संतुलित रखने की कोशिश हुई — न कि केवल हड़बड़ी में हमला।

  4. क्षेत्रीय तथा वैश्विक स्थान (Regional / Global Positioning)
    भारत ने यह प्रयास किया कि इस ऑपरेशन को “स्थानीय संघर्ष” न कहा जाए, बल्कि वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ एक अभियान दिखाया जाए।
    भारत की राजनीतिक दावा-कुशलता (narrative diplomacy) की भूमिका इस संघर्ष में प्रमुख रही।

चुनौतियाँ, सीमाएँ और आलोचनाएँ (Weaknesses / Criticisms)

  1. नैतिक / व्याख्यात्मक समस्या (Narrative / Perception Deficit)
    — भारत को यह चुनौती रही कि वह अपनी कार्रवाई को पूरी तरह पारदर्शी और विश्वसनीय रूप से पेश करे। कुछ आलोचना यह रही कि भारत ने “नरम मोड” (soft diplomacy) या समय पर स्पष्ट संवाद तंत्र विकसित नहीं किया।
    — पाकिस्तानी पक्ष और समर्थक मीडिया द्वारा भारत के नागरिक हानि के दावों को उठाया जाना, और भारत को उस पर प्रभावी जवाब देने में देरी।
    — कुछ विश्लेषकों ने कहा कि भारत ने अपनी विदेश नीति को “प्रधानमंत्री पुरुषार्थ का प्रचार” (leader-centric projection) के रूप में अधिक चलाया, न कि राजनयिक-सौहार्दपूर्ण रणनीति के रूप में।

  2. मध्यस्थता एवं तीसरे पक्ष की भूमिका (Mediation / Third-Party Pressure)
    — भारत को यह चुनौती रही कि यदि तीसरे पक्ष (यूएन, अन्य देश) मध्यस्थ बनने की पेशकश करें, तो भारत को कैसे संतुलित रूप से प्रतिक्रिया दे। भारत को यह संदेश देना पड़ा कि यह भारत–पाकिस्तान मामला है, जिसमें मध्यस्थता सीमित हो।
    — यदि कोई मध्यस्थ मध्यभागी हो जाए, तो भारत की स्थिति “बराबरी” की स्थिति में आ सकती है, जिसे भारत स्वीकार नहीं करना चाहता।

  3. एस्केलेशन जोखिम (Escalation Risks)
    — कार्रवाई का विस्तार यदि नियंत्रण से बाहर हो जाए, तो इसमें सीमापार युद्ध का रूप ले सकता है।
    — पाकिस्तान द्वारा गतिविधियों के जवाब में भारतीय इलाकों में हमले या ड्रोन हमलों की संभावना।
    — यदि भारत ने अधिक कठोर या बड़े पैमाने पर जवाब दिया, तो अंतर्राष्ट्रीय दबाव और वैश्विक निंदा का सामना करना पड़ सकता था।

  4. दीर्घकालीन स्थायित्व और नीति निरंतरता (Long-Term Sustainability / Strategic Consistency)
    — यदि भारत ऐसे ऑपरेशन को केवल "एक घटना" के रूप में देखा, न कि निरंतर रणनीति के भाग के रूप में, तो उसे आगे बढ़ाना कठिन हो सकता है।
    — कुल सुरक्षा संरचना, खुफिया सूचना तंत्र, सैन्य तैयारी, और कूटनीतिक तंत्र को एक स्थिर संयोजन में विकसित करना आवश्यक है।
    — यदि भारत भविष्य में ऐसे ऑपरेशन बार-बार करता है, तो पाकिस्तान या अन्य देश इससे मुकाबला रणनीति विकसित कर सकते हैं।

  5. नार्म-न्याय और अंतरराष्ट्रीय नियम (Normative / Legal Constraints)
    — अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संदर्भ में देशों की संप्रभुता (sovereignty) और “न्यायसंगत आत्मरक्षा” (jus ad bellum) सिद्धांतों के बीच संतुलन रखना कठिन है। यदि भारत को अंतरराष्ट्रीय न्याय या जनमत से नकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है, तो उसकी नीतिगत विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
    — यदि किसी नागरिक हानि या मानवीय परिणाम उत्पन्न होते हैं, तो वह भारत की छवि को नुकसान पहुंचा सकते हैं, और भारत को अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करना पड़ सकता है।

प्रभाव और परिणाम (Outcomes / Impacts)

  1. डिफ़ेंस / रणनीतिक प्रभाव
    — भारत ने यह दिखाया कि उसने अपनी स्टैंड-ऑफ हथियार, ड्रोन / लूटरिंग म्‍युनिशन, क्रूज़ मिसाइल आदि क्षमताओं को प्रयोग में लाना शुरू किया है।
    — सैन्य कार्रवाई ने पाकिस्तान को “डिफेंस मोड” में ला दिया और सीमापार कार्रवाई की लागत बढ़ाया।
    — भारत ने रणनीतिक “आक्रामक आत्मरक्षा” (offensive defence) की ओर एक कदम बढ़ाया, न कि केवल रक्षात्मक मोड में ही रहे।

  2. कूटनीतिक / अंतरराष्ट्रीय प्रभाव
    — भारत को विश्व समुदाय, विशेषकर मित्र देशों, मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी दलील पेश करने का अवसर मिला।
    — भारत की कहानी अधिक व्यापक रूप से प्रसारित हुई, पाकिस्तान के दावों को चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
    — भारतीय नीति ने “दे-हाइफनेशन” (de-hyphenation) की चुनौती को फिर प्रस्तुत किया — अर्थात्, कि भारत और पाकिस्तान को हमेशा एक साथ जोड़ा जाए यह रुझान भारत को स्वीकार नहीं है।
    — भारत की दाबी रही कि यह ऑपरेशन सीमित था और युद्ध नहीं, जिससे बाहरी हस्तक्षेप या मध्यस्थता की संभावनाएँ सीमित हों।
    — हालांकि, भारत को इस बात की चुनौती भी मिली कि कुछ देश और संगठन निष्पक्ष समीक्षा के तहत भारत की नीतियों पर प्रश्न उठा सकते हैं।

  3. राजनीतिक और आंतरिक प्रभाव
    — भारत सरकार को नागरिक स्तर पर समर्थन मिला, और यह सरकार की छवि को दृढ़ सुरक्षा पक्षधर के रूप में सुदृढ़ करने का अवसर बनी।
    — विपक्ष तथा विश्लेषकों ने सरकार की नीति, कार्रवाई की पारदर्शिता, एवं विदेश नीति समन्वय पर प्रश्न उठाए।
    — भारत को यह अनुभव भी मिला कि भविष्य की कार्रवाइयों को केवल सैन्य दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि समेकित सैन्य-राजनयिक ढाँचा से प्रबंधित करना होगा।


निष्कर्ष एवं सुझाव

निष्कर्ष

Operation Sindoor भारत की सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ अब तक की सबसे साहसिक और रणनीतिक कार्रवाई में से एक माना जाता है। इसमें भारत ने सैन्य और कूटनीतिक दोनों मोर्चों को सक्रिय किया। इसने भारत की “जीरो टॉलरेंस” नीति को व्यवहार में परीक्षण किया, और वैश्विक स्तर पर भारत को एक सक्रिय, निर्णायक सुरक्षा शक्ति के रूप में स्थापित करने का अवसर दिया।

लेकिन, इस नीति के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन और दीर्घकालिक प्रभाव के लिए कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं — विशेष रूप से संवाद और कथा (narrative) नियंत्रण, अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन, मध्यस्थता दबावों का सामना करना, और भविष्य में नीति निरंतरता बनाए रखना।

सुझाव

  1. सतत रणनीति निर्माण
    भारत को ऐसी नीति तैयार करनी चाहिए जिसमें सैन्य कार्रवाई हर बार नवीन न हो, बल्कि एक व्यापक और दीर्घकालीन रणनीति हो, जिसमें खुफिया, कूटनीति, सामरिक क्षमता, मीडिया रणनीति आदि सभी शामिल हों।

  2. संचार व नैरेटिव योजना (Strategic Communication / Narrative Planning)
    विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और मीडिया को संयोजन में काम करना चाहिए ताकि भारत की दलील समय पर, सुसंगत और प्रभावशाली तरीके से अंतरराष्ट्रीय प्लेटफार्मों पर पहुंच सके।
    प्रक्षेपण (projection) और सत्यापन योग्य डेटा (e.g. सैटेलाइट चित्र, खुलासा) का प्रयोग करना चाहिए, ताकि आरोपों और विरोधियों की आलोचनाओं का मुकाबला किया जा सके।

  3. कूटनीतिक तैयारियाँ एवं साझेदारी
    मित्र देशों, गठबंधनों, और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ पहले से संवाद एवं समर्थन तैयार करना चाहिए, ताकि जब ऐसे ऑपरेशन हों, उन्हें एकल घटना न माना जाए बल्कि एक साझा सुरक्षा प्रयास के रूप में दिखाया जाए।
    भारत को मध्यस्थों के प्रस्तावों को नियंत्रित करना चाहिए: यदि कोई देश मध्यस्थता की पेशकश करता है, तो भारत को स्पष्ट दायरे रखना चाहिए।

  4. न्यायसंगत और सीमित कार्रवाई (Proportionate Response Frameworks)
    कार्रवाई करते समय यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह अंतरराष्ट्रीय नियमों के अंतर्गत रहे — नागरिक सुरक्षा, न्यूनतम हानि, सक्रिय चेतावनी, उचित सीमाएँ आदि।
    यदि नागरिक हानि होती है, तो उसका जवाबदारी स्वीकार करना और उसके लिए संवाद करना आवश्यक होगा।

  5. निरंतर तैयारी और प्रतिक्रिया कक्ष (Crisis Preparedness / Response Cells)
    भारत को एक तत्काल “रणनीतिक प्रतिक्रिया कक्ष” (strategic response cell) तैयार रखना चाहिए जिसमें सैन्य, खुफिया, कूटनीतिक और मीडिया विशेषज्ञ एक साथ क्राइसिस की स्थिति में तुरंत निर्णय ले सकें।
    भविष्य में ऐसी घटनाओं के लिए पूर्वानुमान, अभ्यास, और नेतृत्व समन्वय को और भी मजबूत करना चाहिए।



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