हिंदी के प्रति समर्पण: मातृभाषा का गौरव और जिम्मेदारी
भूमिका: हिंदी – केवल भाषा नहीं, जीवन का दर्शन
हिंदी केवल एक भाषा नहीं है; यह हमारी आत्मा का प्रतिबिंब, हमारी संस्कृति की पहचान और हमारे जीवन का दर्शन है। जब हम कहते हैं:
“हिंदी को जानो, हिंदी को पढ़ो, हिंदी को लिखो, हिंदी को बोलो, हिंदी को सुनो, हिंदी को मनो, हिंदी को गाओ।”
तो केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं हो रहा होता, बल्कि हम अपने अतीत, संस्कार और जीवन मूल्यों से जुड़ते हैं। हिंदी में बसती है हमारी सांस्कृतिक धरोहर, हमारे पर्वों की रौनक, हमारी लोककथाएँ और भक्ति की गहराई।
हिंदी की मिठास, उसकी सहजता और उसकी लय में वे सभी रंग और भाव हैं जो भारतीय मानस की गहराई तक पहुँचते हैं। यह भाषा न केवल संवाद का माध्यम है, बल्कि विचारों, चिंतन, भावनाओं और संस्कारों का स्त्रोत भी है।
हिंदी का इतिहास और विकास
हिंदी का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवपूर्ण है। यह भाषा संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश से विकसित हुई और समय के साथ आधुनिक हिंदी का रूप लिया।
- संस्कृत: हिंदी की जड़ें संस्कृत में हैं, जिसने इसे व्याकरण, शब्दावली और साहित्यिक गहराई प्रदान की।
- प्राकृत और अपभ्रंश: सरलता और जनसुलभता का विकास। यही कारण है कि हिंदी गाँव-शहर, अमीर-गरीब, प्रत्येक भारतीय के हृदय में उतर गई।
- सांस्कृतिक महत्ता: हिंदी में लोकगीत, भजन, महाकाव्य, कहानियाँ और नाटक समाहित हैं। यह भाषा हमारी जीवनशैली, त्योहारों, रीति-रिवाज और संस्कारों का भी प्रतीक है।
संत तुलसीदास कहते हैं:
“जो भाषा हृदय से निकले, वही वास्तविक शक्ति है। भाषा केवल शब्द नहीं, भाव और जीवन का माध्यम है।”
हिंदी ने हमें केवल साहित्य नहीं दिया, बल्कि भक्ति, प्रेम, साहस और नैतिकता का संदेश भी प्रदान किया।
हिंदी साहित्य और महान विद्वान
हिंदी साहित्य का इतिहास विविधताओं और युगों से भरा हुआ है। प्रत्येक काल ने अपनी छाप छोड़ी और हिंदी को समृद्ध किया।
1. भक्ति काल (15वीं-17वीं शताब्दी)
भक्ति संतों ने हिंदी को जनभाषा में सरलता और गहराई दी।
- संत तुलसीदास – रामचरितमानस: भक्ति और नैतिक शिक्षा का अमूल्य स्रोत।
- संत सूरदास – कृष्ण भक्ति के मधुर गीत।
- संत कबीर – समाज सुधारक, मानवता और चेतना के संदेश।
कबीर का दोहा:
“कबीरा खड़ा बाजार में, सबकी माँगे खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।”
2. रीतिकाल और छायावाद (17वीं-20वीं शताब्दी)
इस काल ने हिंदी कविता को नई दिशा दी।
- सुमित्रानंदन पंत – प्रकृति प्रेम और मानवीय संवेदना।
- महादेवी वर्मा – ‘कोहबर’ और छायावादी कविताएँ।
- जयशंकर प्रसाद – नाटक और कविताओं में नई सोच।
महादेवी वर्मा कहती हैं:
“कविता केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्मा की आवाज़ है।”
3. आधुनिक और समकालीन हिंदी साहित्य (20वीं शताब्दी से वर्तमान)
- प्रेमचंद – सामाजिक वास्तविकता और मानवता का संदेश।
- अज्ञेय – आधुनिक विचारों और चिंतन का परिचायक।
- अमृता प्रीतम – प्रेम और पीड़ा की अभिव्यक्ति।
- नीलम कुमार, गोपालदास नीरज – मानवीय संवेदनाएँ और संगीतात्मक अभिव्यक्ति।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन कहते हैं:
“हिंदी हमारी संस्कृति और चेतना की भाषा है। इसे अपनाना और संरक्षित करना हमारा धर्म है।”
हिंदी गीतों और संगीत में महत्ता
हिंदी केवल साहित्य में ही नहीं, बल्कि संगीत, भक्ति और लोकगीतों में भी हमारी संस्कृति की आत्मा है।
- “वन्दे मातरम्” – राष्ट्रभक्ति का प्रतीक।
- “सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा” – गर्व और पहचान।
- भक्ति संगीत में सूरदास और तुलसीदास के पद आज भी जीवन में ऊर्जा भरते हैं।
हिंदी गीतों की पंक्तियाँ हमारे मन को छूती हैं, हमारी आत्मा को जागृत करती हैं और संस्कारों की गहराई दिखाती हैं।
2025 में हिंदी और स्थिति
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वैश्विक परिप्रेक्ष्य:
- 2025 में हिंदी दुनिया की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है, मंदारिन और अंग्रेजी के बाद।
- हिंदी-उर्दू की संयुक्त संख्या इसे तीसरी सबसे बोली जाने वाली भाषा बनाती है।
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राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य:
- भारत में हिंदी को संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत आधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त है।
- 2025 में हिंदी भारत की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है, विशेष रूप से उत्तर और मध्य भारत में।
- कुछ राज्यों में विरोध होने के बावजूद, हिंदी का महत्व लगातार बढ़ रहा है।
विश्व स्तर पर हिंदी के आयोजन
- विश्व हिंदी सम्मेलन: अमेरिका, इंग्लैंड, सिंगापुर, मॉरीशस, फिजी आदि देशों में आयोजित।
- विश्व हिंदी दिवस (10 जनवरी) और हिंदी दिवस (14 सितंबर) पर विदेशों और भारत में कवि सम्मेलन, नाट्य प्रदर्शन और सांस्कृतिक कार्यक्रम।
- हिंदी शिक्षा: विश्व के विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा और साहित्य की पढ़ाई।
डॉ. रामचंद्र शुक्ल कहते हैं:
“हिंदी भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि यह संस्कृति, चिंतन और चेतना का प्रतीक है।”
हिंदी बोलने वालों के कर्तव्य (2025 में जिम्मेदारी)
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भाषा का सम्मान और संवर्धन:
- हिंदी बोलने वालों का कर्तव्य है कि वे अपनी भाषा का सम्मान करें और इसे बढ़ावा दें।
- हिंदी दिवस और विश्व हिंदी दिवस पर इसके महत्व को समझें और दूसरों को जागरूक करें।
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बहुभाषिकता का सम्मान:
- भारत एक बहुभाषिक देश है, और हिंदी बोलने वालों को अन्य भाषाओं का भी सम्मान करना चाहिए।
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डिजिटल और शैक्षिक क्षेत्र में सक्रियता:
- डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर हिंदी सामग्री का निर्माण और प्रचार।
- स्कूल और विश्वविद्यालयों में हिंदी शिक्षा को बढ़ावा देना।
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सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण:
- हिंदी साहित्य, कला, संगीत और फिल्मों के माध्यम से संस्कृति का संरक्षण।
महात्मा गांधी कहते हैं:
“भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा और चेतना है।”
निष्कर्ष: हिंदी – हमारी आत्मा और गौरव
हिंदी केवल शब्दों का संग्रह नहीं है; यह हमारी संस्कृति, सोच और पहचान है।
संदेश:
“हिंदी को जानो, हिंदी को अपनाओ, हिंदी को प्यार करो।”
विश्व स्तर पर हिंदी की महिमा बढ़ रही है। यह हमारी संस्कृति, चेतना और पहचान का सबसे सशक्त प्रतीक है। हिंदी हमारे हृदय में बसती है, हमारे जीवन को संवारती है और हमें हमारे अतीत, वर्तमान और भविष्य से जोड़ती है। इसे संरक्षित करना, इसे बढ़ावा देना और इसे सशक्त बनाना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
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