“संघर्ष मिट्टी में उगता है, और सपने आसमान में खिलते हैं” श्यामबाबू की जीवन यात्रा : गरीबी से SDM तक
भारत में आज बेरोज़गारी सिर्फ एक समस्या नहीं, बल्कि लाखों युवाओं की चिंता और संघर्ष का अपरिहार्य हिस्सा है।
सरकारी नौकरी की परीक्षा अब महज़ एक परीक्षा नहीं, बल्कि लाखों युवाओं का स्वाभिमान, सपनों का भविष्य और परिवार की उम्मीदों का पुल है।
जहाँ एक तरफ़ बढ़ती प्रतियोगिता है, वहीँ दूसरी तरफ़ सीमित अवसर।
इस लड़ाई में वही आगे बढ़ता है जिसके भीतर आग जलती है।
एक ऐसी आग, जो परिस्थितियों से नहीं बुझती, बल्कि परिस्थितियों को जलाकर रास्ता बना लेती है।
इसी विशाल भीड़ में एक नाम है —
श्यामबाबू, गाँव इब्राहिमाबाद, जिला बलिया, उत्तर प्रदेश।
🌱 बचपन: मिट्टी, संघर्ष और सपनों की कोपल
बलिया की धरती वैसे भी शौर्य, त्याग और संघर्ष के लिए जानी जाती है।
इस धरती का बच्चा कठिनाइयों से डरता नहीं, बल्कि उन्हें गले लगाकर आगे बढ़ता है।
श्यामबाबू का बचपन इसी मिट्टी में बीता।
लेकिन मिट्टी में खेलने वाला यह बच्चा खिलौनों से कम और संघर्ष से ज्यादा खेला।
घर की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि कभी-कभी
पूरे परिवार के लिए एक वक्त की रोटी तक सवाल बन जाती थी।
उनकी बहनों की पढ़ाई तक रोक दी गई —
मजबूरी ने सपनों को रोक दिया था।
लेकिन एक बच्चा था —
जिसने ज़िंदगी की कठोर दीवारों पर लिखा —
“एक दिन मैं घर को बदलूँगा, समय को बदलूँगा, पहचान को बदलूँगा।”
🎯 दसवीं के बाद पहला मोड़ — सरकारी नौकरी की पहली सीढ़ी
दसवीं पास होते ही श्यामबाबू ने समझ लिया कि
अब वक्त सपने देखने का नहीं, बल्कि उन्हें पूरा करने का है।
उन्होंने सरकारी नौकरी की तैयारी शुरू की —
ऐसे घर में जहाँ
ना उचित किताबों की व्यवस्था थी,
ना कोचिंग की सुविधा,
ना मार्गदर्शन देने वाला कोई गुरु।
लेकिन इंसान के भीतर का शिक्षक सबसे बड़ा होता है।
मेहनत ने दरवाज़ा खोला
और चयन हुआ —
उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही (कांस्टेबल)
यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी।
इसी सफलता ने उनके जीवन की पहली सीढ़ी बनाई।
⏳ नौकरी के साथ पढ़ाई: यह संघर्ष आसान नहीं था
पुलिस की नौकरी में समय व्यक्ति का नहीं होता —
वह ड्यूटी का होता है।
कभी रात की ड्यूटी
कभी त्यौहार की ड्यूटी
कभी अचानक बुलावा
कभी आराम का समय भी उपलब्ध नहीं।
लेकिन श्यामबाबू के लिए यह ड्यूटी
जीवन की बाधा नहीं, बल्कि लक्ष्य की तैयारी थी।
- रात के बाद की रात जागना
- थके हुए शरीर के बावजूद किताब खोलना
- चाय के साथ सपनों के पन्नों को पलटना
- छुट्टी न मिले तो ड्यूटी के बाद पढ़ना
- तन दुखता था, पर मन मजबूत था।
उन्होंने प्राइवेट स्नातक पूरा किया।
फिर पोस्ट ग्रेजुएशन की तैयारी भी शुरू की।
क्योंकि सपना था — सिर्फ नौकरी करना नहीं,
बल्कि फैसले लेने वाली कुर्सी तक पहुँचना।
🔥 2010 — PCS का सपना
2010 में उन्होंने संकल्प लिया —
“अब मैं PCS अधिकारी बनकर दिखाऊँगा।”
लेकिन PCS परीक्षा आसान नहीं।
यह परीक्षा ज्ञान नहीं,
धैर्य, संयम और मानसिक शक्ति की परीक्षा है।
पहला प्रयास — असफल
दूसरा प्रयास — असफल
तीसरा प्रयास — असफल
चौथा प्रयास — असफल
पाँचवा प्रयास — फिर भी असफल
जो लोग हार को अंत समझते हैं,
वे यहीं रुक जाते।
लेकिन जो लोग हार को शुरुआत समझते हैं,
वे इतिहास लिखते हैं।
श्यामबाबू छठे प्रयास में बैठे —
और 2016 में UPPCS परीक्षा में 52वीं रैंक हासिल की।
और वह बन गए —
SDM (Sub Divisional Magistrate)
वह पद…
जिसका सपना लाखों लोग देखते हैं।
☕ एक कप चाय में छुपा इतिहास
यह घटना जीवन का सबसे खूबसूरत दृश्य है।
एक दिन वह पुलिस की ड्यूटी पर थे।
DSP साहब ने चाय लाने को कहा।
श्यामबाबू चाय लेने गए।
इसी दौरान मोबाइल में मैसेज आया —
“Congratulations! You are selected as SDM.”
चाय लेकर वह DSP के पास गए —
चेहरे पर सादगी, पर आँखों में चमक।
धीमे से बोले —
“सर, मैं SDM बन गया हूँ।”
DSP साहब चौंके, फिर मुस्कुराए।
वह कुर्सी से उठे,
श्यामबाबू को सलाम किया,
और बोले —
“आज यह चाय मैं आपके हाथों से पियूँगा,
क्योंकि आज आप सिर्फ कांस्टेबल नहीं — अधिकारी हैं।”
यह सिर्फ एक कप चाय नहीं थी।
यह सम्मान, संघर्ष, जीत और गर्व का चाय था।
💬 IG नवनीत सिकेरा का संदेश
प्रसिद्ध IPS अधिकारी नवनीत सिकेरा ने लिखा —
“हम या तो बहाने खोज सकते हैं,
या सपनों को साकार करने की मेहनत कर सकते हैं।
श्यामबाबू ने प्रूफ कर दिया कि दृढ़ संकल्प वाली आग को कोई बुझा नहीं सकता।”
🌟 इस कहानी की सीख
- गरीबी बाधा नहीं है — अगर इरादा मजबूत हो।
- असफलता अंत नहीं है — यह अगले प्रयास की तैयारी है।
- मंज़िल दूर नहीं होती — कदम थक जाते हैं।
- जो थककर बैठ गया, वह हार गया।
- जो थका, गिरा, फिर उठा — वही जीत गया।
🔥 अंतिम संदेश
अगर आप चलना बंद नहीं करते,
तो दुनिया की कोई ताकत आपको रोक नहीं सकती।चाय पर भेजा जाने वाला हाथ
एक दिन सलाम पाने लायक बन सकता है।बस… सपनों को छोड़ना मत।
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