सेवा और पुरुषार्थ: जीवन का सर्वोच्च आदर्श
भूमिका – सेवा और पुरुषार्थ का महत्व
मानव जीवन केवल सांसारिक सुख, प्रतिष्ठा और स्वार्थ तक सीमित नहीं है। भारतीय संस्कृति ने सदैव यह सिखाया है कि जीवन का वास्तविक मूल्य सेवा और पुरुषार्थ में है। सेवा केवल किसी को देने या कुछ करने तक सीमित नहीं, बल्कि यह जीवन दर्शन है – जिसमें तन, मन, धन, गुण, वचन, भाव, श्रद्धा, प्रेम और कर्तव्य सभी का समर्पण शामिल होता है।
आज की युवा पीढ़ी में सेवा का महत्व समझाना अत्यंत आवश्यक है। अक्सर सेवा को दिखावे और प्रतिष्ठा का साधन बना दिया जाता है। लोग मंदिरों में जाकर सेवा के फोटो अखबारों में छपवाते हैं, समाजसेवा के मंच पर भाषण देते हैं, लेकिन वास्तविक सेवा निस्वार्थ, ईमानदार और पूर्ण पुरुषार्थ से होती है।
संत तुलसीदास ने लिखा –
"सच्ची सेवा केवल वही है जिसमें तन, मन, धन, वचन और भाव का समर्पण हो, और उसमें कोई स्वार्थ न हो।"
सेवा का असली अर्थ यही है कि हम जहाँ रहते हैं, वहाँ स्वच्छता, सौहार्द, सहयोग और प्रेम फैलाएँ। घर को मंदिर मानना, आंगन की सफाई करना, वृक्षों और पक्षियों की देखभाल करना, बुजुर्गों और बच्चों का ध्यान रखना – यह सभी सेवा के स्वरूप हैं।
महापुरुष और संत हमें यह सिखाते हैं कि सेवा केवल बाहरी रूप से नहीं, बल्कि मन, भाव और निष्ठा से होनी चाहिए।
स्वामी विवेकानंद कहते हैं – “सेवा का अर्थ है दूसरों के लिए जीना, और यह जीवन का सर्वोच्च आदर्श है।”
माता-पिता की सेवा – तन से
माता-पिता की सेवा जीवन का पहला और सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य है। वे हमें जन्म देते हैं, पालन-पोषण करते हैं और हमारे जीवन के मार्गदर्शन का स्रोत होते हैं।
शास्त्र/श्लोक
मातृदेवो भवः, पितृदेवो भवः – तैत्तिरीय उपनिषद्
आधुनिक उदाहरण
- आज कई युवा अपने माता-पिता के साथ समय नहीं देते। लेकिन जो लोग रोज़ाना माता-पिता की देखभाल करते हैं, उनके माता-पिता स्वस्थ और खुश रहते हैं।
- वृद्धाश्रम में भेजने की बजाय घर पर देखभाल करना – यह वास्तविक सेवा है।
तन से सेवा के उदाहरण
- घर की सफाई, आंगन और दरवाजों की सफाई करना
- बीमार माता-पिता की देखभाल करना
- भोजन, स्वास्थ्य और आराम का ध्यान रखना
परिवार की सेवा – मन से
परिवार समाज की पहली पाठशाला है। मन से परिवार की सेवा का अर्थ है – प्रेम, समझ, सहयोग और सद्भाव बनाए रखना।
शास्त्र/श्लोक
धर्मो हि कुटुम्बात् – मनुस्मृति 2.226
आधुनिक उदाहरण
- परिवार में भाई-बहन की भावनाओं का सम्मान करना।
- पति-पत्नी के बीच सहयोग और समझ।
- लॉकडाउन में परिवार के साथ समय बिताना और बच्चों के साथ संवाद करना।
मन से सेवा के उदाहरण
- बच्चों और बुजुर्गों के साथ समय बिताना
- घरेलू कामों में हाथ बंटाना
- परिवार के प्रत्येक सदस्य का सम्मान और सहयोग करना
संत कबीर ने कहा – “परिवार का प्रेम और सेवा ही जीवन का असली संस्कार है।”
समाज की सेवा – धन से
धन केवल भोग और विलासिता के लिए नहीं है। इसका वास्तविक उपयोग समाज और परोपकार में होना चाहिए।
शास्त्र/श्लोक
दानेन हि धनसिंचनं भवति लोकहिते – भागवतम्
आधुनिक उदाहरण
- कोरोना महामारी में लोगों ने आर्थिक सहायता, ऑक्सीजन सिलेंडर और भोजन वितरण के माध्यम से सेवा की।
- NGO द्वारा गरीब बच्चों को शिक्षा और भोजन प्रदान करना।
धन से सेवा के उदाहरण
- समाज कल्याण योजनाओं में योगदान
- जरूरतमंद बच्चों और बुजुर्गों की सहायता
- सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए वित्तीय सहयोग
संत रामानंद कहते हैं – “धन का असली मूल्य तब है जब इसे दूसरों के भले में लगाया जाए।”
राष्ट्र की सेवा – गुण से
राष्ट्र की सेवा केवल बल से नहीं, बल्कि गुण और कर्म से होती है। गुण से सेवा का अर्थ है – अपने ज्ञान, योग्यता, कौशल और नेतृत्व का उपयोग राष्ट्रहित में करना।
शास्त्र/श्लोक
स्वधर्मे निधनं श्रेयः – भगवद्गीता 3.35
आधुनिक उदाहरण
- डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी महामारी के दौरान अपने गुण और ज्ञान का प्रयोग करके राष्ट्र की सेवा कर रहे हैं।
- वैज्ञानिक और शोधकर्ता नई तकनीक और दवा के विकास के लिए अपने कौशल का योगदान दे रहे हैं।
गुण से राष्ट्र सेवा
- देशभक्ति और कर्तव्य का पालन
- ज्ञान और शिक्षा से राष्ट्र का विकास
- कौशल और योग्यता से समाज में योगदान
विश्व की सेवा – वचन से
विश्व की सेवा वचन से होती है। सत्यवचन और प्रेरक संदेश विश्व में शांति और स्थायित्व लाते हैं।
शास्त्र/श्लोक
सत्यं वद, धर्मं चर – महाभारत
आधुनिक उदाहरण
- Greta Thunberg और विश्व जलवायु आंदोलन – उनके शब्दों ने विश्व को जागरूक किया।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा लोगों को सचेत और शिक्षित करना।
वचन से सेवा
- सत्य बोलना और अनुचित वचन से बचना
- प्रेरक और शांतिपूर्ण संवाद
- विश्व में विश्वास और सम्मान का निर्माण
ईश्वर की सेवा – निस्वार्थ श्रद्धा भाव से
ईश्वर की सेवा भाव प्रधान होती है।
शास्त्र/श्लोक
यस्मिन्भावे रतं न त्यजेत्, स एव परम भक्तः – भागवत पुराण
आधुनिक उदाहरण
- मंदिर और धार्मिक संस्थानों में स्वयंसेवकों का निस्वार्थ योगदान।
- मदर टेरेसा की सेवा केवल भक्ति और प्रेम से भरी हुई थी।
गुरु की सेवा – समर्पण से
गुरु को ईश्वर का रूप माना जाता है।
शास्त्र/श्लोक
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः – गुरु सूत्र
आधुनिक उदाहरण
- शिक्षक और प्रोफेसर जो विद्यार्थियों के मार्गदर्शन के लिए अतिरिक्त समय देते हैं।
- कोच और मेंटर जो अनुभव और ज्ञान साझा करते हैं।
मानवता की सेवा – प्रेम से
मानवता की सेवा निस्वार्थ प्रेम और करुणा से होती है।
शास्त्र/श्लोक
ममैवम् लोकेषु परं मित्रं भव – महाभारत
आधुनिक उदाहरण
- NGO और स्वयंसेवी संगठन द्वारा प्राकृतिक आपदा में पीड़ितों की मदद।
- समाज में अनाथ और बेसहारा बच्चों के लिए शिक्षा और आश्रय देना।
धर्म की सेवा – कर्तव्य पालन से
धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि कर्तव्य और व्यवहार में है।
शास्त्र/श्लोक
धर्म एव हि पुरुषार्थः – मनुस्मृति
आधुनिक उदाहरण
- चुनाव में ईमानदारी से मतदान करना।
- सरकारी नियमों और सामाजिक नियमों का पालन करना।
प्राकृत सेवा – ज्ञान से
ज्ञान, शिक्षा, संगीत, विज्ञान और संस्कृति के माध्यम से दूसरों का कल्याण करना भी सेवा है।
आधुनिक उदाहरण
- ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से बच्चों को पढ़ाना।
- यूट्यूब और ब्लॉग के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाना।
जीव-जंतुओं की सेवा – व्यवहार से
सभी जीव-जंतुओं के प्रति करुणा और प्रेम दिखाना, उनका पालन-पोषण और संरक्षण करना सेवा है।
शास्त्र/श्लोक
सर्वे जीवाः सुखिनः भवन्तु – यजुर्वेद
आधुनिक उदाहरण
- पालतू जानवरों की देखभाल।
- पक्षियों और सड़क पर भूखे जानवरों के लिए भोजन की व्यवस्था।
साधु-संतों की सेवा – संस्कार से
साधु-संतों का आदर, उनके आदर्शों का पालन और उनके संस्कारों का जीवन में समावेश करना सेवा है।
शास्त्र/श्लोक
संतं श्रद्धया पूजयेत् – तैत्तिरीय उपनिषद्
आधुनिक उदाहरण
- संतों और समाज सुधारकों के संदेश का पालन।
- बच्चों को अच्छे संस्कार और नैतिक शिक्षा देना।
निष्कर्ष – संपूर्ण सेवा का सार
सत्य, प्रेम, निष्ठा और निस्वार्थ भाव से की गई सेवा ही जीवन का सर्वोच्च पुरुषार्थ है। सेवा का सही स्वरूप तभी समझा जा सकता है, जब हम:
- माता-पिता की सेवा – तन से
- परिवार की सेवा – मन से
- समाज की सेवा – धन से
- राष्ट्र की सेवा – गुण से
- विश्व की सेवा – वचन से
- ईश्वर की सेवा – निस्वार्थ श्रद्धा भाव से
- गुरु की सेवा – समर्पण से
- मानवता की सेवा – प्रेम से
- धर्म की सेवा – कर्तव्य पालन से
- प्राकृत सेवा – ज्ञान से
- जीव-जंतुओं की सेवा – व्यवहार से
- साधु-संतों की सेवा – संस्कार से
सच्ची सेवा वही है जिसमें स्वार्थ, दिखावा और अहंकार का स्थान न हो, और यह सेवा हर व्यक्ति के जीवन का सर्वोच्च पुरुषार्थ है।
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