बिना सोचे-समझे किया गया कार्य अनर्थकारी है(एक (दार्शनिक, सामाजिक और व्यावहारिक विवेचन)
1. प्रस्तावना – विचार और विवेक का महत्व
मनुष्य को ईश्वर की सृष्टि में सबसे श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उसमें विवेक, बुद्धि और निर्णय-शक्ति है। यही विवेक उसे पशु से अलग करता है। पशु प्रवृत्ति केवल तात्कालिक इच्छाओं और आवेगों पर चलती है, जबकि मनुष्य अपनी सोच और समझ से सही-गलत का निर्णय कर सकता है।
लेकिन जब मनुष्य अपनी इस शक्ति का उपयोग नहीं करता और बिना सोचे-समझे कोई कार्य कर बैठता है, तो परिणाम प्रायः अनर्थकारी ही होता है। अनर्थकारी अर्थात् ऐसा जो हानि पहुँचाए, दुःख दे, पश्चाताप कराए और जीवन की दिशा को उलट दे।
2. सोच-समझकर कार्य करना क्यों आवश्यक है?
- परिणाम की स्पष्टता – हर कार्य का कोई न कोई परिणाम होता है। यदि हम सोचेंगे नहीं तो परिणाम अप्रत्याशित और अक्सर हानिकारक होगा।
- समय और ऊर्जा की बचत – अनावश्यक कार्य, जो जल्दबाजी में किए जाएँ, बाद में सुधारने में दुगुना समय और ऊर्जा लगती है।
- संबंधों की सुरक्षा – बिना सोचे कहे गए शब्द या किए गए काम रिश्तों को तोड़ सकते हैं।
- सामाजिक जिम्मेदारी – समाज में रहने वाला हर व्यक्ति अपने कार्यों से दूसरों को प्रभावित करता है। इसलिए सोच-समझकर कदम उठाना आवश्यक है।
3. दार्शनिक दृष्टि – विवेक और अविवेक का भेद
भारतीय दर्शन में विवेक को आत्मोन्नति का सबसे बड़ा साधन माना गया है।
- गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं – “विवेक से रहित मनुष्य मोह में पड़कर कर्म करता है और उसका परिणाम दुखदायी होता है।”
- उपनिषदों में कहा गया है – “श्रेयो मार्ग और प्रेय मार्ग दो हैं; जो मनुष्य बिना सोचे प्रेय मार्ग चुनता है, वह अनर्थ को प्राप्त होता है।”
इसका अर्थ स्पष्ट है – विवेक ही वह प्रकाश है जो हमें सही दिशा देता है। अंधेरे में उठाया गया कदम हमें गड्ढे में गिरा सकता है।
4. धार्मिक दृष्टांत – बिना सोचे कर्म के परिणाम
(क) महाभारत का उदाहरण
महाभारत में दुर्योधन ने बिना सोचे-समझे अहंकारवश द्रौपदी का चीरहरण कराया। यह कार्य उसके राजसिंहासन को स्थायी करने के लिए नहीं बल्कि कौरव वंश के विनाश का कारण बन गया।
(ख) रामायण का उदाहरण
कैकेयी ने बिना दूरदर्शिता के केवल मंथरा की बातों में आकर राम को वनवास दिला दिया। परिणामस्वरूप स्वयं को भी पश्चाताप करना पड़ा और अयोध्या को भी कष्ट सहना पड़ा।
(ग) बाइबिल और कुरान के प्रसंग
बाइबिल में भी कई बार चेतावनी दी गई है कि जल्दबाजी में किए गए कार्य से विनाश होता है। कुरान में कहा गया है – “जल्दबाजी शैतान की आदत है, और धैर्य अल्लाह का तोहफा।”
5. ऐतिहासिक उदाहरण
(क) भारत का विभाजन
1947 का विभाजन कई हद तक राजनीतिक जल्दबाजी और बिना सोचे समझे किए गए निर्णयों का परिणाम था। लाखों लोग मारे गए, करोड़ों विस्थापित हुए।
(ख) प्रथम विश्व युद्ध
ऑस्ट्रिया के राजकुमार की हत्या के बाद बिना गहराई से सोचे यूरोप के देशों ने युद्ध की घोषणा कर दी। परिणामस्वरूप लाखों लोग मारे गए और पूरा विश्व आर्थिक संकट में डूब गया।
6. मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण
मनोविज्ञान कहता है कि मानव मस्तिष्क दो स्तरों पर निर्णय लेता है:
- तत्कालिक भावनाओं के आधार पर (आवेग)
- सोच-समझकर विश्लेषण के आधार पर (विवेक)
जब हम केवल भावनाओं के प्रभाव में आकर निर्णय लेते हैं, तो परिणाम प्रायः नकारात्मक होता है। उदाहरण के लिए – गुस्से में की गई बातें, ईर्ष्या में किए गए कार्य, या लालच में उठाए गए कदम।
7. व्यक्तिगत जीवन में उदाहरण
- करियर चयन – बिना सोचे दूसरों को देखकर करियर चुनने वाला युवक जीवनभर पछताता है।
- विवाह निर्णय – जल्दबाजी में लिए गए विवाह के फैसले अक्सर टूटते हैं।
- खर्च और निवेश – लालच या दिखावे में किया गया निवेश आर्थिक संकट ला सकता है।
- दोस्त और संगति – बिना सोचे गलत संगति में पड़ना जीवन बिगाड़ देता है।
8. सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में प्रभाव
- नीतियों की जल्दबाजी – यदि सरकारें बिना गहन अध्ययन के नीतियाँ बनाती हैं, तो जनता को नुकसान उठाना पड़ता है।
- भीड़ का निर्णय – बिना विवेक के भीड़ जो निर्णय लेती है, वह दंगे-फसाद में बदल जाता है।
- सोशल मीडिया युग – बिना सोचे पोस्ट किए गए संदेश समाज में नफरत फैला देते हैं।
9. साहित्यिक दृष्टिकोण
कबीरदास कहते हैं –
"धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।"
यहाँ “धीरे” का अर्थ सोच-समझकर, धैर्य और विवेक से कार्य करना है।
10. उपाय – सोच-समझकर कार्य करने की आदत
- निर्णय से पहले रुकें – 10 सेकंड का ठहराव भी विवेक जगाता है।
- विकल्पों पर विचार करें – हर निर्णय का विकल्प होता है।
- परामर्श लें – अनुभवी लोगों से सलाह लेना बुद्धिमानी है।
- दीर्घकालिक दृष्टि रखें – केवल आज नहीं, भविष्य भी सोचें।
- आत्मनियंत्रण – गुस्सा, लालच और ईर्ष्या पर काबू पाना आवश्यक है।
11. निष्कर्ष
मनुष्य का जीवन कर्म पर आधारित है। लेकिन कर्म तभी सार्थक होते हैं जब वे विवेकपूर्ण, सोच-समझकर और दूरदर्शिता से किए गए हों। बिना सोचे-समझे किए गए कार्य कभी-कभी तुरंत परिणाम दे सकते हैं, लेकिन दीर्घकाल में वे अनर्थकारी ही सिद्ध होते हैं।
इसलिए हर व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने जीवन के प्रत्येक छोटे-बड़े निर्णय में एक क्षण ठहरकर सोचे – “क्या यह कार्य सही है? क्या इसका परिणाम सुखद होगा?” यही विचारशीलता जीवन को सफलता, शांति और समृद्धि की ओर ले जाती है।
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